मन में कुछ उमड़ता घुमड़ता है तो कलम खुद ब ख़ुद चल पड़ती है
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पल पल हार जीत का मेला है भागता दौड़ता से ये रेला है कौन कहता है ज़िन्दगी खेल नहीं कभी तू भीड़ में कभी अकेला है