कुन्दन प्रीत
Literary Lieutenant
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हार से पहले ही मुझे हार स्वीकार नहीं है बगैर जज़्बे के लड़ूं ऐसा किरदार नहीं है इसी में ता-उम्र का सफ़र करना है मुझे माना मेरे मन के मुताबिक ये संसार नहीं है अल्हड़ ही ठीक हूँ मैं तो, तुम्हारी नज़र में हो सकता है ये शख़्स होशियार नहीं है यहाँ सभी अपना शागिर्द ढूँढते हैं सिर्फ सभी को, सभी के, दिल से प्यार नहीं है अपनो के ही हाथों में खंज़र देखा है तो अब तो किसी पे भी मुझे एतिबार नहीं

आज मेरे वास्ते तो मोहब्बत भी मेहरबाँ है आज मेरे लिए महबूब ही मेरा अब गुमाँ है रूह में एक दूजे के हर पल ही रहने लगे हैं अब दूरियाँ हम दोनों के भले ही दरमियाँ है


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