deepshikha divakar
Literary Colonel
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किसी का वक्त नहीं गुजर रहा कोई वक्त के साथ गुजर गया

ये कमबख्त गुस्ताखियां भी सिलसिले वार है इन्हीं से बढ़ता अपना प्यार हैं

सपने लिखने बेठू तो अल्फ़ाज़ ही लडख़ड़ाते हैं लिखने से क्या होगा कुछ इस कदर चिड़ाते हैं दीपशिखा

कुछ सपने सोने नहीं देते हमे दुनिया में खोने नहीं देते उन्हें पाने को प्रेरित करते बूंद बूंद मेहनत से ये भरते

तनहाइयां यादें ढूंढ लाती हैं फिर तबीयत से हमे रुलाती हैं

ईश्वर को पाना है तो अहम को त्यागो अहम को पाना है तो ईश्वर को त्यागो त्याग ओर समर्पण ही जीवन का नाम है इसके बिना जीवन गुमनाम है

ईश्वर को पाना है तो अहम को त्यागो अहम को पाना है तो ईश्वर को त्यागो त्याग ओर समर्पण ही जीवन का नाम है इसके बिना जीवन गुमनाम है

जिसे चाहा उसे पाया पर उसने कितना चाहा ये ना समझ पाया


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