Jeevan singh Parihar
Literary Colonel
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न बोझ था जिम्मेदारियों का , न डर था रिश्ते नातों का , वह मेरा बचपन था ।

वह बचपन ही था ,जिसमे हमे न कल की चिंता थी , यहाँ हर आदमी को आने वाले कल की चिंता है ।

न मोबाइल थे , न घड़ियाँ थी , फिर भी , सही समय पर सब दोस्त मिलते थे , वह मेरा बचपन था ।

न लेना था , न देना था अपनी मस्ती में मस्त रहना था , वह मेरा बचपन था ।

अपनी तो बढ़ चढ़ कर बाते करते है लोग , और दूसरों की घिस पिट के सुनाते है लोग ।

हो स्वार्थ तो हर हद तक चले जाते है लोग । निःस्वार्थ तो गिरी हुई वस्तु भी नही उठाते है लोग ।।

निःस्वार्थ ,निडर ओर निःसंदेह था । न चिंता थी ,न मतलब था वो मेरा बचपन था । jeevan singh

स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए सब , अपने मे ही मस्त है ।

दुसरो के जले पर नमक छिड़कते है लोग , ओर अपने जले पर मक्खन लगाते है लोग ।


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