Social worker Having my own NGO, Poetry writer , like travelling, music lover, rain lover, motivational speaker
Share with friendsकरती हूँ कबसे तेरा इंतज़ार करके मैं पूरे सोलह श्रृंगार लेकर के आओ सजना बारात ले जाओ मुझे सात फेरों के बाद
मिज़ाज़ मौसम का हुआ आशिक़ाना सजाया है चोटी में बेला का गजरा माथे पे बिंदिया है कानों में झुमका नज़रों से नज़रों की सुनो अब जरा
प्यार में तेरे सुध बुध खोकर, हो गयी मैं बेफिक्र बड़ी अब तू चाहे माने या न माने, मैं तो पिया तेरे गले पड़ी