Sangeeta Agarwal
Literary Brigadier
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प्रेम वो नहीं होता जो बांधता है,जकड़ता है,प्रेम वो है जो स्वतन्त्र कर दे,उन्मुक्त हवा में सांस लेने दे।

स्त्री सम्पूर्ण पृथ्वी होती है ,कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं, जिसपर मालिकाना हक हो आपका।

मैं आज़ादी से सांस लेना चाहती हूं,अपनी यादों की रस्सियां मेरे वजूद से ढीली कर दो।

ये फुर्सत कितनी मंहगी है? एक बेचारा सुकून है वो तो चाय की प्याली में भी मिल जाता है।

आदमी होता तो कब का हार जाता ये उम्मीदों की लड़ाई है जनाब! लम्बी चलेगी...

प्रशंसा के भूखे ये साबित करते हैं कि वो योग्यता के कंगाल हैं।

मर्द ने कहा-मैं बहुत औरतों के साथ सोया हूँ। औरत ने पूछा-कभी जागे भी हो किसी के साथ?


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