ज़िंदगी तेरे आज में हूँ और गुज़रें कल में भी, कभी आसां में हूँ और कभी मुश्किल में भी, मुझे ढूँढो ख़याल के इस बेशकल भीड़ में, मिलूँगा उस “बेकल” में और इस “बेकल” में भी डॉ. संजीव दीक्षित “बेकल” गत ३० सालों से साहित्य सेवा मैं संलगन है और अपनी कविता संग्रहो एवं लघु कथाओं के द्वारा हिंदी पाठक... Read more
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