Rakhi Prajapati
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अमृत की चाह थी सबको पर काल का घूंट किसी को मंज़ूर नहीं ठीक वैसे ही शिव की चाह है सबको पर पार्वती सा तप मंज़ूर नहीं

जब तुम मेरे थे तब सिर्फ तुम मेरे थे ना किसी की चाह थी ना किसी की कमी सब कुछ खोकर भी मैं पूरी थी


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