Writing seems the simplest way to reflect my words that can't be spoken.
Share with friendsतेरी मासूमियत पर फिदा ये नजरे कुछ इस कदर हुई, कि अपनी आंखो को भी शाबाशी हम देने लगे... - सुमित्रा बिस्वाल
तेरा मुस्कुराता चेहरा कुछ इस कदर आंखो को भाया करता है, मेरा तो दिन बन जाता है चेहरा तेरा जब नजर आजाया करता है। - सुमित्रा बिस्वाल
गुस्सैल मिजाज़ था उसका,बस इस बार नहीं मानेगी, कुछ ऐसा विचार था... जनाब ने दिया थोड़ा समय,एक मुस्कुराहट और कुछ प्यारी बातें बस मामला रफा दफा। - सुमित्रा बिस्वाल