Poet
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बचपन में जिन खिलौनों से खेला करते थे, आज उन्होंने पूछ ही लिया, कैसे लगता है जब ज़िन्दगी तुम्हारे साथ खेल खेलती है?
कलम की स्याही जैसे रुक सी गई है, शब्दों ने शायद आज हड़ताल की है, हाल-ए-दिल बयाँ करूँ मैं कैसे? दर्द को अपने अलफ़ाज़ दूँ मैं कैसे?
Hope! You can surely cope, If you keep alive the hope, Just like the support of a rope, When you are descending a slope!