Kumar Vikash
Literary Colonel
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लिखने का शौक रखता हूँ ! लिखता हूँ ❤ से कुछ अपने लिए ! कुछ लोगों के लिए !

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ख्वाब नही है जिन्दगी जरा अपनी आँखे खोल कर तो देखिये , माना कि खरगोश तुम नहीं कछुओं में ही शामिल हो लीजिये ।। vikash sharma

उम्मीद तो बहुत थी हसरतों का दरिया पार करने की , हसरतें बढ़ती रहीं और मेरी कश्ती को किनारा भी न मिला ।। kumar vikash

देख कर तो तुम्हे यही लगता है , कि हैं दूरियाँ अब भी हमारे बीच । तुम्ही लहजा गैरों सा लिये फिरते हो , मुस्कुराते क्यों नहीं भरी महफ़िल में बीच ।। kumar vikash

मेरी मोहब्बत का अब और क्या इम्तिहान लोगी तुम , छोड़ दिया मैंने तुम्हे सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत की खातिर ।। ❤❤❤ kumar vikash

परिस्थितियां कैसी भी हों, प्रसन्नता अप्रसन्नता का आधार मन ही है।। kumar vikash

दिल ने तुम्हे ख्वाबों में क्या देखना चाहा , कम्बख्त नींदों ने आँखों से दुश्मनी कर ली ।। kumar vikash

कमियाँ शायद मुझमें ही बहुत थीं, पर मैं हमेशा आइनों में ही देखता रहा ।। kumar vikash story mirror

मेरी वफाओं का सिला तुमने , अपनी चंद मुस्कुराहटों से दिया । मैंने जब भी इजहारे इश्क किया , तो तुमने मुस्कुरा के टाल दिया ।।

तुमने जो खामोशी का लिबास अपने लबों पर डाल रखा है । हमने भी उसी को तुम्हारी मोहब्बत का इजहार मान रखा है ।।


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