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क्यों ना गरूर करू अपने आप पर मुझे उसने चाहा जिसको हर कोई पाना चाहता था जिसने मेरे प्यार के लिए हर दर पर सर झुकाया
दिन भी कितना बेरंग सा लगने लगा अब जो कल तक तुम्हारे रंगीन मिजाज़ का कायल था