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बंटू के कारनामे
बंटू के कारनामे
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© Anshu Tripathi

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बचपन! इस शब्द मात्र में दूध की सोंधी महक बसी होती है| सामाजिक औपचारिकताओं से परे बचपन, नन्हे मस्तिष्क में रिश्तों की अपनी ही परिभाषा गढ़ता भोला बचपन, आसमान में विचरते बादलों में परियों की आकृतियाँ ढूँढता बचपन, बारिश के पानी में कागज की नाव चलाता बचपन| अपनी एक स्वपरिभाषित परिधि के अंदर अपना सम्पूर्ण जीवन जीता हुआ बचपन शायद बुढ़ापे तक हमारी स्मृतियों में एक विशेष ओहदे पर आसीन होता है|
मेरे बचपन की भी ऐसी कई खट्टी-मीठी यादें आज भी जब कभी फुरसत के क्षणों में मेरे मन को गुदगुदाने चली आती हैं तो द्रुत गति से रोटी कमाने की दौड़ में हुई थकान कुछ क्षणों के लिए जैसे मुझसे दूर छिटक जाती है| मैं और मेरे बड़े भाई शुभांक शर्मा, बचपन से ही एक दूसरे के अच्छे मित्र और राजदार रहे हैं| बचपन से किशोर होने तक न जाने कितनी खुराफातों और बदमाशियों में हमने एक-दूसरे का पूरा ईमानदारी से साथ दिया है, भले ही उन घटनाओं में से कुछ में साथ देने में हम दोनों की यह मजबूरी होती थी कि कहीं अगला हमारी पोल मम्मी-पापा या दादी के सामने न खोल दे| कई बार हमारे मतभेद हुए| झगड़े, मार-फुटौव्वल तक की नौबत आ गई लेकिन उन सारे खट्टे-मीठे पलों की यादें अब भी हम दोनों को एक प्यार में बाँध कर रखती हैं| सुबह की नाजुक धूप जैसा बचपन जैसे पंख लगा कर अपने समय से पहले ही उड़ जाता है| दादी-नानी की कहानियाँ, माँ की लोरियाँ, पिता के स्नेह का सुरक्षात्मक कवच, दोस्त-सहेलियाँ, पतंग-गिल्ली-डंडा, कैरियों की छीना-झपटी, स्कूल-होमवर्क, परीक्षा-रिज़ल्ट जैसी छोटी छोटी खुशियों और तनावों को समेटा हुआ बचपन उसके बीत जाते ही याद आने लगता है| खैर! मुद्दा आप सभी को अपने बचपन के उन्ही तनावों से अवगत करने का है| जी हाँ! तनाव तो तनाव ही है| आज भले ही वे तनाव हमें महज बचपना लगते हैं लेकिन उस समय तो लगता था कि ईश्वर ने हमें क्या इन तनावों से संघर्ष करने के लिए ही पैदा किया है?

1)
कटोरी की करामात
**************

अपने माता-पिता की हम दो संततियां थीं| मैं और मेरे भैया शुभांक| बड़े प्यार से दादी ने उसे बंटू कहना शुरू कर दिया और कुछ दिनों में हम सभी को उसका यही नाम स्मरण रह गया| बन्टू भैया मुझसे एक साल बड़े थे लेकिन बाउजी की पोस्टिंग छोटी-छोटी तहसीलों में होने के कारण उनकी शिक्षा में थोड़ा विलम्ब हो गया| शायद ईश्वर ने हमारी किस्मत में शिक्षा का योग अवश्यम्भावी रूप से बनाया ही था इसीलिये बाउजी की पोस्टिंग बैकुंठपुर तहसील में हो गई और किस्मत से उस छोटे से कस्बे में स्कूलों की कमी नही थी(किस्मत या बदकिस्मती; यह तो भैया ही बेहतर बता सकते हैं)| जब वे चार साल के थे तो सीधे हमारा नाम शासकीय अभ्यास शाला में कक्षा दो में लिखवा दिया गया| यह सब इस कारण सम्भव हो पाया क्योंकि बाउजी उस समय तहसीलदार थे| मेरा नाम उनके साथ दादी के कहने पर इसलिए लिखवा दिया गया ताकि भाई-बहन दोनों एक साथ स्कूल जा सकें और एक-दूसरे का ख्याल भी रख सकें यद्यपि भैया का यह मानना था कि मुझे उनके साथ बाउजी ने केवल इसलये भरती करवाया था ताकि मैं उनपर नज़र रख सकूँ और उनकी पूरी रिपोर्ट बाउजी को मिलती रही| रिपोर्ट? जैसे जैसे आप पन्ने-दर-पन्ने आगे बढ़ेंगे, आप खुद ही समझ जाएँगे कि मैं ताबचपन किन दुर्घटनाओं और खुराफातों की रिपोर्ट बाउजी तक पहुँचाने के झूठे आरोप का वहन करती रही|
जब दादी को पता चला कि अभ्यास-शाला में हर कक्षा में फटी हुई टाटपट्टियों पर क्षमता से ज्यादा बच्चों को ठूंस-ठूंस कर बैठाया जाता है तो उन बच्चों के बीच अपने फूल से पोता-पोती के दबने की कल्पना मात्र से वह इतनी आशंकित हो गई कि एडमिशन के अगले ही दिन पाँच रोल टाटपट्टी स्कूल को तहसीलदार साहब की तरफ से दान करवाई गई और स्कूल प्रशासन को यह सख्त हिदायत दी गई कि हम दोनों भाई बहन के बैठने की हर कक्षा में उचित व्यवस्था की जाए| खाने की छुट्टी होने पर जब सारे बच्चे अपने रंग-बिरंगे टिफिन लेकर मैदान की तरफ जाते थे, तब भी हम दोनों भाई-बहन अपनी कक्षा में ही बैठे रहते क्योंकि तब तक हमारा नौकर रामखिलावन अपनी साइकिल दौडाते हुए हमारा लंच ले कर हमारे स्कूल पहुँच चुकता था(हमारा बंगला स्कूल से थोड़ी ही दूरी पर था)| साफ़-सुथरी प्लेटों में खाना लगा कर पहले वह सफ़ेद नैपकिन हमारी गर्दनों में फंसाता और बड़े प्यार से एक-एक कौर बना कर हमारे मुँह में डालता जाता था| साथ-साथ में उजारन-बसावन की कहानी किश्तों में सुनाता जाता था| मुझे अब मालूम हुआ कि सिर्फ हम दोनों को बहला कर खाना खिलाने के लिए वह रोज उजारन-बसावन की कहानी गढ़ता जाता था(अब मुझे महसूस होता है कि उस कहानी का पात्र उजारन बंटू दादा का आदर्श था) और हम कौतूहल में अपने दीदे फाड़े हुए गपर-गपर खाते जाते थे| हमारे मन में कितनी तमन्नाएं रहती थी कि कभी हमारी मम्मी भी कालू की मम्मी की तरह चावल की रोटी बना कर दे तो कभी बलजीत की मम्मी की तरह उबला अंडा खाने दे लेकिन हमारे घर की सात्विक रसोई में तो दादी के रहते लहसुन-प्याज का प्रवेश वर्जित था तो भला अंडे की क्या बिसात थी| मम्मी ने हमें समझाया कि कालू या दूसरे बच्चों से हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी है और इसलिए हमें चावल की सूखी रोटी खाने की ज़रूरत नहीं है| हमें तो घी लगी हुई गुदगुदी रोटियाँ ही खानी चाहिए ताकि हमारा दिमाग और तेज हो जाये लेकिन मुझे कभी घी लगी हुई रोटियाँ उतनी रुचिकर और स्वादिष्ट नहीं जान पड़ीं, जितनी अच्छी मुझे कालू के टिफिन की वे सूखी चावल की रोटियाँ दिखती थी|
हमारे स्कूल के बाहर एक बुढ़िया दाई अपनी दूकान लगाती थी| एक फटे हुए बोरे पर उसका पूरा असबाब सजा रहता और स्कूल के बच्चों के मन का लालच जगा कर अपनी ओर खींचता रहता था| कच्ची-पकी इमलियाँ, सिगरेट जैसी दिखने वाली चॉकलेट की डंडी, स्लेट पर लिखने वाली बत्तियाँ, गटागट (मुझे विश्वास है कि गटागट जैसी विश्वविख्यात चीज को आप लोग इसी नाम से जानते होंगे), फिरकी, प्लास्टिक के छोटे-छोटे खिलौने और सीटियाँ, कैथा, बेर, अमचूर के पैकेट, नारियल की मिठाई, भगवानों और सिनेमा के हीरो-हिरोइन की छोटी-छोटी कागज की तस्वीरें और न जाने क्या-क्या दुर्लभ वस्तुएं उसके पास होती थीं| छुट्टी के बाद सारे बच्चे उस दाई की दूकान पर टूट पड़ते और मुझे तो वहाँ से हमेशा मक्खियों के भिनभिनाने जैसी आवाज़ आती प्रतीत होती थी| सारे बच्चे बोरे पर इस कदर  झुके रहते थे कि दाई और उसकी दूकान दोनों इस भीड़ में गायब से हुए जाते थे और बीच-बीच में सिर्फ गुस्से से चिल्लाती दाई की आवाजें आती थी| उसके मुँह में दाँत नहीं थे इसलिए वह जब पोपले मुँह से बच्चों को बोरे पर फैली चीज़ों से दूर होकर झाँकने के लिए डाँटती तो मुझे सिर्फ अलग अलग सुरों में खनकती उसकी आवाज़ की घटती-बढ़ती लय मात्र समझ में आती थी| भीड़ में गंदे-बदमाश बच्चों के बीच दबने से हमें चोट न लगे और धूल भरे बोरे में फैली चीज़ों को खाकर हम दोनों की तबियत खराब न हो जाए इसलिए दादी ने रामखिलावन भैया को सख्त हिदायत दी थी कि हम दोनों को उस दूकान से दूर ही रखा जाए| फलतः हम दोनों भाई-बहन पॉकेटमनी के व्यसन से भी पूरी तरह अनभिज्ञ रखे गए( हमारे चहुंमुखी विकास में बाधा उत्पन्न होने का यह बहाना मात्र था|)
सिर्फ दाई की दूकान ही नहीं, स्कूल के बाहर और भी कई आकर्षक फ़ूड-पॉइंट थे| छुट्टी की घंटी बजते ही एक रबड़ी-मलाई कुल्फी वाला भैया जी अपनी साइकिल के पीछे एक बड़ा सा मटका फँसा कर स्कूल के दरवाजे पर आ खड़ा होता और दस मिनट में उसकी पूरी मलाई बिक जाती थी| वह भैया जी अपनी जबान को अजीब तरह से तोड़-मरोड़ कर अपनी नाक से आवाज़ निकाल कर बच्चों को हाँक लगाता था और हाँक लगाते समय तल्लीनता के कारण उसकी आँखें लगभग बंद हो जाती थीं| केवल दस मिनट में उसकी सारी मलाई बर्फ बिक कर खत्म हो जाती थी| एक आलू वाला दादू (सारे बच्चे उन्हें इसी नाम से बुलाते थे) मुझे बड़ा लुभाता था| चटपटे आलू की चाट बना कर महुआ के पत्तों में सब बच्चों को देता जाता था और साथ साथ ही उनसे चुहल भी करता जाता था| हमें पढाने वाले आचार्य जी और दीदी जी लोग भी स्कूल के चपरासी को बाहर भेज कर दादू के आलू खरीदवा कर भीतर मंगवाते थे| एक बार बंटू भैया ने मुझसे अकेले में बड़े कौतूहल से यह पूछा था “छोटी! तू ही बता कि यदि आलू गंदी चीज होती और से खाने से सब बीमार पड़ते तो अब तक तो हम दोनों के आलावा सब स्कूल से छुट्टी ले चुके होते न?”
“हाँ बन्टू दादा! कह तो तुम सही रहे हो|”
“तो हमें मम्मी और दादी ये सब मजेदार चीजें क्यों खरीदने और खाने नहीं देतीं?”
“वे कहती हैं कि इन चीजों से हम बीमार पड़ जाएँगे लेकिन पड़ता तो कोई नहीं दादा|”
“तो हम भी इन चीजों को खा सकते हैं न ?”
“मुझे क्या मालूम?”
“मुझे पता है और हम भी चटपटे आलू और रबड़ी बर्फ खा सकते हैं|”
मेरी आँखें खुशी से चमक उठीं|
“सच?”
“लेकिन तुझे मेरा पूरा साथ देना होगा|”
“दूंगी दादा! तुम्हारी छोटी बहन हूँ न|”
“बस तू आज शाम को पेटदर्द का बहाना करके दादी और मम्मी को अपने साथ व्यस्त कर लेना|”
“उससे क्या होगा दादा?”
“उफ़! जितना कहूँ बस उतना तो कर| बाकी मैं सम्भाल लूँगा|”
शाम को बंटू दादा का इशारा पाकर मैंने उचित मौका देख कर झूठे पेटदर्द में लोटना शुरू कर दिया| मैं दादी की लाडली थी| मेरे रोने की आवाज़ से दादी और मम्मी भाग कर मेरे पास मेरे कमरे में गयीं और दादी ने मुझे हींग की घूंटी देकर मेरा पेट गर्म तेल से सहलाना शुरू कर दिया| मम्मी के चेहरे से भी यही लग रहा था कि उन्हें भी मेरी तबियत की चिंता हो रही थी|
“मेरे परी, मेरी लाडो! सुबह तो अच्छी-भली स्कूल गई थी फिर अचानक पेट में निगोड़ा दर्द क्यों हो आया?”
“चिंता मत करो बहू! मैंने छोटी को अभी हींग की घूंटी दी है और गर्म तेल की मालिश से इसके पेट में फँसी हुई हवा अभी थोड़ी सी देर में निकल जायेगी| बच्ची ही तो है| इतना सुंदर भला कोई होगा उस छोटे से स्कूल में? किसी की मरी नजर लग गई होगी| तुम भी तो बिना काजल लगाये बच्चों को भेज देती हो|”
“क्या करूँ अम्मा जी! दोनों में कोई भी तो काजल लगवाना नहीं चाहता और इनके पापा भी मना कर देते हैं और कहते हैं कि आँखों में कोयला भरने से आँखों को नुकसान ही होता है|”
“तुम एक काम करो बहू! थोड़ा सा गोएंठा सुलगा दो| मैं लगे हाथ मिर्चों और राई से अपनी गुड़िया की नजर भी उतार दूँगी| मैंने भरत को पहले ही कहा था कि यह तहसीली स्कूल में मत भेज बच्चों को| न जाने कैसे-कैसे घर के बच्चे आते हैं|”
“नहीं अम्मा जी! ऐसा तो नहीं है| डॉक्टर साहब के दोनों बच्चे भी तो इसी स्कूल में जाते हैं|”
“अरे, तो हरिया धोबी और कल्लू ताम्रकार के लड़के भी तो जाते हैं| इसी कारण तो बलाएँ लग गई हैं छोटी के सर पर| जितना ये सरकारी मास्टर को तनख्वाह मिलती है, अगर उसकी आधी भी ट्यूशन फीस देता तो भी वो तिवारी मास्टर नाक की नोक पर दौड़ कर हमारे बच्चों को घर पर ही पढ़ाने भाग कर आता और मनचाहे नम्बर का रिज़ल्ट बनवा कर हाथ में थमा देता| मेरे बच्चों को इतनी तकलीफ तो न होती|”
“लेकिन अम्मा जी इससे बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं होता और हम यह चाहते थे कि हमारे बच्चे स्कूल में सब बच्चों के साथ आम तरीके से अपनी शिक्षा शुरू करें|”
मुझे अब पेट दर्द का झूठा बहाना  करने का मन नहीं कर रहा था लेकिन अब बीच में यह नाटक बंद भी नहीं कर सकती थी क्योंकि ऐसा करने से मुझे एक तरफ मम्मी और दादी की फटकार पड़ती और दूसरी तरफ प्लान चौपट होने के कारण बंटू दादा मुझे दौड़ा-दौड़ा कर मारता| मैं आँखें मूंदे हुए करंज के तेल की बदबू बर्दाश्त करती रही और मम्मी की सर्वांगीण विकास वाली बात मुझे बहुत अच्छी लगी| मैंने तय किया कि विकास की यह परिभाषा मैं बंटू दादा को जरूर बताउंगी| मम्मी की बात सुन कर एक क्षण को मुझे ऐसा लगा कि दाई के भण्डार से सही वस्तु चुन कर उसमे पैसा खर्च करना भी तो कम अक्ल का काम नहीं हो सकता है क्योंकि न ही रोज़-रोज़ मैं पेट दर्द का बहाना कर सकती हूँ और अगर किया तो रोज़ मम्मी और दादी से बच ही जाऊं, इसका भरोसा मुझे कम ही है, तो हमारा यह प्लान भी एक तरह से हमारे सर्वांगीण विकास का एक चरण है| कम से कम इस विचार के कारण मेरे मन से मम्मी और दादी को कहे गए झूठ के कारण पनपा अपराध-बोध थोड़ा कम हो गया|
जितनी देर दादी और मम्मी मेरे पेट-दर्द से उलझी रहीं, उतनी देर में बन्टू भैया ने दादी के कमरे में उनके मंदिर के गुल्लक  से करीब दस रूपये निकाल लिए| यह घटना उस समय की है जब दूध एक रूपये किलो मिलता था और अब उसकी कीमत तीस रूपये हो चुकी है| इसका मतलब है यदि हम आज की मुद्रा-मूल्यन की दर का अनुसरण करें तो बंटू दादा ने भगवान जी के खाते से करीब तीन सौ रूपए अपने सर्वांगीण विकास के लिए निकाले थे| जब दादा का काम हो गया तो प्लान के मुताबिक़ वह भी कमरे में आकर मेरे सिरहाने बैठ गया और मेरा सर सहलाने लगा| इसका मतलब था कि काम हो गया और अब मेरा दर्द धीरे-धीरे ठीक हो सकता है|
जब मैंने थोड़ी देर बाद मैंने यह घोषणा की कि अब मेरा पेट-दर्द छू हो गया है तो इसका पूरा क्रेडिट दादी ने अपनी हींग की घूँटी और करंज के गर्म तेल की मालिश को दे दिया|
“मैंने कहा था न बहू कि मेरे उपचार से अच्छे-अच्छों की फँसी हुई हवा आराम से निकल जाती है, फिर छोटी तो छोटी बच्ची है|”
माँ ने जरा असंतोष के भाव से साँस छोड़ते हुए लेकिन मन मार कर दादी की हाँ में हाँ मिलाते हुए एक आदर्श बहू होने का परिचय दे ही डाला था|
खैर, मजे की बात यह थी कि दादी भगवान का गुल्लक छः महीने में एक बार ही खोलती थीं और उस वक्त उसमे से निकले हुए पैसों से दान-धर्म करती थीं लेकिन उनका हिसाब थोड़ा कमज़ोर था तो पैसे गिनना या तो पापा का काम होता था या फिर मम्मी का| इसका परिणाम यह होना था कि बंटू दादा की कारगुजारी का पता चलने की कोई गुंजाइश नहीं थी| अब अगला मिशन था कि अगले दिन आधी छुट्टी में रामखिलावन को स्कूल से कैसे भगाया जाए| अरे! वह स्कूल में रहेगा तो हम लोग दाई से कुछ खरीद कहाँ पायेंगे और वह घर आकर दादी को यह भी चुगली लगा देगा कि हम दोनों के पास ढेर सारा पैसा है| पहले बंटू दादा ने रामखिलावन को रिश्वत  देने का आइडिया सोचा जो मुझे पसंद नहीं आया|
“नहीं दादा! जब रिश्वत  का पैसा खत्म हो जायेगा तो पिक्चरों की तरह वह हमें ब्लैकमेल कर सकता है| इससे अच्छा तो यह होगा कि उसे भी पता ही न चलने दिया जाये| तुम चिंता मत करो| यह मैं देख लूँगी|”
रोज़ की मुताबिक रामखिलावन भैया खाना लेकर आये और हम दोनों के गले में नैपकिन फँसा कर उन्होंने रोटी-सब्जी प्लेट में निकाल कर दी| जब वह बन्टू-दादा के मुँह में कौर दे रहे थे, तब मैंने  ज़ोर-ज़ोर से “मिर्ची लगी,मिर्ची लगी” का हल्ला मचा दिया| राम खिलावन भैया हड़बड़ा गए और उनका पूरा ध्यान मुझ पर केंद्रित हो गया|
“अरे बेबी जी! इतनी मिर्ची तो आप लोगों के खाने में मैं डालता ही नहीं|”
“तो क्या झूठ बोल रही हूँ मैं? क्या रोज कहती हूँ कि मिर्ची लगी? अब लग रही है तो क्या न बताऊँ? आज दादी को बताउंगी मैं आपकी यह बात कि आपने मुझे झूठा कहा|”
मैंने झूठा गुस्सा दिखा कर रुंआसा मुँह बना लिया और ज़ोर-ज़ोर से सी-सी करने लगी| बन्टू दादा को खाना खिलाना रोक रामखिलावन मेरे लिए थर्मस से पानी निकालने के लिए नीचे झुक गया और मैंने बंटू दादा को आँख से इशारा कर दिया| इशारा पाते ही बंटू दादा ने पूरा खाना बेंच से नीचे गिरा दिया और ज़ोर से चिल्ला कर बोले|
“अरे भैया, सम्भल कर| देखो,देखो प्लेट को आपका धक्का लग रहा है|”
जब तक रामखिलावन भैया मेरे लिए पानी निकाल कर मुझे थमाते, तब तक पूरी प्लेट ज़मीन पर पहुँच गई और सारे खाने में धूल मिल गई| रामखिलावन भैया का मुँह अफ़सोस के कारण छोटा सा रह गया|
“राम,राम राम! अब क्या होगा| पूरा खाना गंदा हो गया| आप लोग अब क्या खायेंगे बच्चों? अम्मा जी बहुत गुस्सा करेंगी|”
अब बंटू दादा ने मोर्चा सम्भाला|
“जब आप नीचे झुके तो आपको ध्यान रखना चाहिए था न कि आपकी कुहनी प्लेट को लग रही है| अब हमारा क्या होगा| क्या खायेंगे हम?”
रामखिलावन भैया भी परेशान हो गए| तब मैंने उनकी परेशानी कम करने का ढोंग रचाया|
“कोई बात नहीं रामखिलावन! आज हम भूखे रह लेंगे| एक दिन  लंच नहीं करेंगे तो मर थोड़े ही न जाएँगे|”
“लेकिन बेबी जी! अम्मा जी हमें तो ज़िंदा नहीं छोडेंगी न|”
“पर अब किया ही क्या जा सकता है?”
“एक काम कर सकता हूँ बेबी जी! आपके आचार्य जी से विनती करके आप दोनो को फटाक से घर ले जा कर खाना खिलवा कर ला सकता हूँ|”
बंटू दादा को अपना पूरा प्लान चौपट होता दिखाई दिया|
“अरे भैया ऐसा नही हो सकता| कोई बच्चा पूरी छुट्टी की घंटी के पहले घर नहीं जा सकता|”
“बन्टू बाबा! अप लोग तो तहसीलदार साहब के बच्चे हैं, आप लोगों को आचार्य जी थोड़े ही न मना करेंगे| रुकिए आप लोग, मैं तुरंत आचार्य जी से बात करके आता हूँ|”
एक पल को लगा कि हमारा पूरा प्लान चौपट हो गया लेकिन तभी खुराफात-नरेश बंटू दादा की छठी इन्द्रिय ने काम किया|
“अरे रामखिलावन!  इस पूरी दौड़ में आधी छुट्टी खत्म हो जायेगी और हम भूखे रह जाएँगे| तुम खाने का थैला यहीं छोड़ कर दौड़ कर घर जाओ और खाना लेकर तुरंत आओ| रोज हम खाना खाकर दस मिनट खेलते थे तो आज हम अभी खेल लेते हैं और उसके बाद खाना खा लेंगे|”
रामखिलावन भैया फिर शायद घर में जाकर ही रुका होगा|
“क्या हुआ नासपीटे? कुछ बताएगा भी?ये दोबारा खाना क्यों लेने आया है?”
राम खिलावन ने दौड़ते-दौड़ते ही खाना दोबारा पैक किया और हवा की रफ्तार से वापस स्कूल को भागा| घर से अगर रामखिलावन की आज वाली स्पीड से दौड़ा जाए तो सिर्फ साढ़े सात मिनट ही स्कूल पहुँचने में लगते हैं| दौड़ते-दौड़ते ही उन्होंने दादी से चिल्ला कर बात की|
“अम्मा जी! सब बताऊँगा लेकिन स्कूल से लौट कर| अभी मुझे कुछ मत पूछिये| अभी तो मेरे पास मरने की भी फुर्सत नहीं है|”
मैं बाहर खड़ी हुई घर से दौड़ कर आ रहे रामखिलावन भैया पर नज़र रख रही थी और तब तक बंटू दादा ने बूढ़ी दाई से तरह-तरह का सामान खरीद लिया| इसके पहले कि बन्टू दादा सारा खज़ाना सम्भाल कर वापस खाना खाने क्लास में आ पाता, राम-खिलावन भैया स्कूल के गेट पर आ चुके थे| उन्हें देख कर पोल खुलने के डर से मेरा मुँह सफ़ेद हो गया| मुझे लगा कि यदि कहीं राम-खिलावन की नज़र दाई से खरीदी करते बंटू-दादा पर पड़ गई तो आज घर पर हमारी धुनाई पक्की समझो| लेकिन बंटू-दादा बहुत स्मार्ट निकला| उसने वहीं खरीदी करते बच्चों की भीड़ में खुद को छुपा लिया और मुझे रामखिलावन के साथ अंदर क्लास में जाने का इशारा कर दिया|
“अरे बेबी! आप गेट के बाहर क्यों निकल आयीं? मैं तो जल्दी से आ ही रहा था|”
“अरे भूख लगी थी इसलिए आपका ही रास्ता देख रही थी|”
“बंटू बाबा कहाँ है?”
“वो अंदर ही है| आप जल्दी चलिए वरना छुट्टी खत्म हो जायेगी और हमें खाना खाने नहीं मिलेगा|”
अंदर जाकर  जब रामखिलावन को बंटू नहीं दिखा तो वह घबरा गया|
“अरे भैया! आप मुझे सब्जी-रोटी की पोंगी बना कर दोनों हाथों में पकड़ा दीजिए और बंटू दादा के लिए पोंगी बना कर रख दीजिए फिर उन्हें पुकारने जाइए| शायद वह हाथ धोने पानी की टंकी की तरफ चले गए होंगे| इस समय रामखिलावन की अपनी बुद्धि घड़ी की भागती सुइओं के अटक कर कुंद हो गई थी| उन्होंने मेरे कहे अनुसार ही किया| जब तक वह बंटू दादा को ढूँढने पानी टंकी की तरफ गये, क्लास के दूसरे दरवाजे से बंटू-दादा हवा की रफ्तार से अंदर आया और सारा सामान अपने बैग में किसी तरह से ठूँस कर एकदम सामान्य होकर खाना खाने लगे| समय की कमी होने के कारण उन्होंने भी रोटी-सब्जी की पोंगी अपने मुँह में ठूँसना शुरू कर दी, इसलिए उनके गाल फूल गए और आँखें फटी-फटी हो गईं| तभी हैरान-परेशान रामखिलावन क्लास में अंदर आया और बंटू दादा को खाना खाते देख कर उनकी साँसें सामान्य हुई|
“कहाँ चले गए थे बाबा? मैं आपको पूरे स्कूल में ढूँढ आया|”
“गधे हो तुम रामखिलावन| मैं तो तुम दोनों को आता देख कर हाथ धोने गया था|”
खैर खाना छुट्टी खत्म होने के पहले किसी तरह से खत्म हुआ और रामखिलावन को इस बारे में कुछ भी पता नहीं चला| (ऐसा हम दोनों का सोचना था लेकिन असलियत बड़ी ही कुत्सित निकली|) हम दोनों ने आज जिस रफ्तार से खाना खाया था, मुझे लगता है उस दिन के बाद आज तक हमने अपनी क्षमता का उतना बेहतरीन प्रदर्शन दोबारा नहीं किया या कहें कि उसकी नौबत ही नहीं आयी|
हमारा आख़िरी पीरिअड खेल का हुआ करता था| आज आचार्य जी हमें खो-खो खिलवाने वाले थे| मैंने खेल से बचने के लिए पेट-दर्द का बहाना कर दिया और बंटू-दादा ने मेरा ख्याल रखने का| सारे बच्चों के मैदान में जाने के बाद बंटू दादा ने अपना खजाना खोला| हम कितने खुश थे आज| हमने रंगबिरंगी टॉफियाँ खाईं, इमली के चटखारे लिए| दादा ने मुझे प्लास्टिक की अँगूठी और कृष्ण भगवान की फोटो दी और खुद ज़ोर से बजने वाली सीटी और हनुमान जी की फोटो रखी| इसके आलावा प्लास्टिक का एक साँप भी हमारे खजाने में शामिल हो गया और सिगरेट जैसी दिखने वाली चॉकलेट भी हमने खाई| सचमुच बड़ा मज़ा आया| छुट्टी के बाद हम बड़ी खुशी-खुशी घर जाने के लिए तैयार हो कर गेट में आकर रामखिलावन का इंतज़ार करने लगे| आज रामखिलावन के तेवर जरा बदले-बदले से लग रहे थे| हमें लगा कि खाना गिरने के कारण ज़रूर दादी ने इनको ज़ोर की डांट लगाई होगी| तो पड़ा करे डांट| हमें क्या| हम तो बच्चे हैं| हमें अपने स्कूल,पढ़ाई के आलावा इन सब घरेलू मामलों के बारे सोचने की भला ज़रूरत ही क्या है?
जब हम घर पहुँचे तो वहाँ का माहौल देख कर हमें विश्वास हो गया कि हमारे कारनामे के बारे में किसी को पता नही चला है| हँसते-खेलते दादी की संझा-बत्ती का समय हो गया| तब तक पापा भी घर आ चुके थे| उस ज़माने में टी.वी तो होता नहीं था, इसलिए हम दोनों भाई-बहन आँगन में बिछी हुई निवार की खटिया में बैठे लूडो खेल रहे थे| तभी दादी ने अपने कमरे से एक कड़क आवाज़ से मम्मी को आवाज़ लगाई| पूजा की घंटियों की आवाज़ अचानक बंद हो गई और एक सन्नाटा सा छा  गया| हम दोनों भी लूडो खेलते-खेलते अचानक रुक गए| तभी मम्मी दादी के कमरे से आकर रामखिलावन से बोली|
“रामखिलावन! साहब के कमरे में जाकर  उन्हें बोलो कि अम्माजी उन्हें अपने कमरे में बुला रही हैं और उन्हें लेकर तुम भी वहीं हाज़िर हो और साथ में बाकी नौकरों को भी लेकर वहीं आओ| बच्चों! तुम दोनों मेरे साथ चलो|”
मम्मी का चेहरा बड़ा गम्भीर लग रहा था| हम दोनों के यह पूरा मामला अब तक समझ नही आया था|
“क्या हुआ मम्मी?”-बन्टू दादा ने पूछा|
“अरे पूछो क्या नहीं हुआ? अनर्थ हो गया है| घर में चोरी हो गई है| बहुत बड़ा पाप हो गया है| भगवान के गुल्लख से किसी पापी ने पैसे निकाल लिए हैं| अम्मा जी को पता चल गया है| जरूर किसी नौकर का काम होगा| खैर अब कटोरी तो सब के सर पर फिराई जायेगी| मेरे और तुम्हारे पापा के सर पर भी|”
“कटोरी? कैसी कटोरी मम्मी?”-बंटू दादा ने बड़े ही कौतूहल से पूछा|
“दादी के गुरुमहाराज ने उन्हें चोर पकड़ने का एक मंत्र सिखलाया है| दादी वह मन्त्र पढ़ कर गोपाल जी के भोग लगाने की चांदी की कटोरी सब के सर पर औंधा कर रखेंगी| जो भी चोर होगा, उसके सर पर वह कटोरी चिपक जायेगी और चोर पकड़ लिया जायेगा|”
यह सुन कर हम दोनों के प्राण सूख गए| बन्टू दादा तो रुंआसा हो गया|
“हे राम! मम्मी फिर वह कटोरी सर से निकलेगी कैसे?”
“जब तक चोर अपनी चोरी स्वीकार नहीं करेगा, वह कटोरी सर से नहीं छूटेगी|”
“अगर चोर ने कभी न बताया तो?”
“तो कभी नहीं?”
अब तो हम दोनों के पसीने,आँसू और सुसु सब छूटने पर आमादा हो गए| मैंने बड़े धीमे से मम्मी का पल्लू पकड़ कर पूछा|
“मम्मी! क्या चोरी के प्लान में चुपचाप साथ देने वाले के सर पर भी कटोरी चिपक सकती है?”
“अब ये तो तुम्हारी दादी ही बेहतर जानती हैं| चलो,चलो जल्दी| तुम्हारे पापा और घर के सारे लोग वहाँ पहुँच गए हैं और हमें देर हुई तो दादी गुस्सा करेंगी|”
अपनी-अपनी साँस रोके हुए हम दादी के कमरे में पहुँचे| सारे नौकरचाकर वहाँ एक लाइन में खड़े हुए थे और पापा दादी के पलंग में गावतकिये के सहारे अधलेटे थे| हम पापा के पीछे खड़े होकर यह चोर पकड़ो तमाशा देखने लगे| दादी ने एक-एक करके सारे नौकरों के सर पर कटोरी उलट कर अपनी आँखें मूँद कर कुछ मंत्र बुदबुदाए और फिर कटोरी की छानबीन की| किसी भी नौकर के सर पर कटोरी नहीं चिपकी और दादी ने सबको कमरे से बाहर जाने की इजाज़त दे दी|
इसके बाद पापा की बारी थी| मुझे एक पल को आश्चर्य हुआ कि पापा पर भी दादी शक कर रही हैं| यह तो हद ही हो गई| तब तो यह पक्का है कि हम दोनों के सर पर भी कटोरी उल्टी जायेगी| पापा दादी के सामने गिडगिडाने लगे|
“अम्मा! मैंने आपके पैसे तो चुराए नहीं हैं लेकिन परसों आरती की आलमारी से सौ का नोट निकाल कर ऑफिस जाने की हड़बड़ी में उन्हें बताना भूल गया था| एक बार बचपन में जैसे मैने लड्डू खाकर आपको नहीं बताया था और कटोरी मेरे सर पर एक महीने चिपकी रही थी, जबकि मैंने चोरी नही की थी, बस आपको बताना भूल गया था| इस बार भी कहीं ऐसा तो नहीं होगा?”
“बिलकुल होगा, फिर कटोरी तुम्हारे सर पर चिपकेगी भरत, लेकिन अब तुम्हे यह याद आ ही गया है कि बहू की आलमारी से पैसे निकाल कर तुम उसे कहना भूल गए थे तो फ़ौरन यहीं ठाकुर जी के सामने अपनी गलती स्वीकार कर लो वरना कल कलेक्टर साहब के घर तुम्हे सर पर चिपकी कटोरी के साथ ही जाना पड़ेगा| मुझे तो कटोरी तुरंत छुड़ाने का मन्त्र बुढ़ापे की वजह से भूल गया है| अब तो एक महीने मन्त्र का असर खत्म होने तक कटोरी छूटने का इंतज़ार करना ही पड़ेगा|
“लेकिन अम्मा जी! अभी तो समस्या यह है कि भगवान जी के पैसे किसने चुराए हैं?”
अबकी बार मम्मी बोल पड़ीं|
“अम्मा जी मेरे फूल से दोनों बच्चे तो चोरी करने से रहे| ज़रूर इस रामखिलावन ने ही पैसे निकाले होंगे|”
सारी बातें सुनते-सुनते डर के मारे हम दोनों की साँस धोंकनी की तरह चलने लगी| रामखिलावन भी आराम से पाक साफ छूट जाने वाला था, यह तो पक्का ही था| मेरी बर्दाश्त अब खत्म हो गई थी और मैं दहाड़ें मार कर रोने लगी|
“नहीं दादी! मैं सर पर कटोरी सजा कर स्कूल नहीं जा सकती| सारे बच्चे मेरा मजाक उड़ायेंगे|”
दादी,मम्मी और पापा ने मुझे बड़े आश्चर्य से देखना शुरू कर दिया|
मम्मी ने नाराज़गी दखा कर मुझसे पूछा|
“तुमने क्यों निकाले गुल्लख से पैसे?”
“अरे मैंने नहीं निकाले हैं मम्मी|”
मम्मी,पापा और दादी सबने मुझसे एक साथ पूछा|
“तो किसने निकाले?”
मैंने बंटू दादा के प्रति अपनी वफादारी इतनी मुश्किल घड़ियों में भी निभाई और उसका नाम अपने जुबान पर नहीं लाई| सिर्फ अपनी नज़रें घुमा कर उनकी तरफ देखा और सबको समझ में आ गया कि बंटू दादा ही चोर हैं|
सबको अपनी तरफ घूरते देख कर बंटू दादा के पैंट गीली होने लगी और इसके पहले कि घर का कोई बड़ा उनसे कोई सवाल पूछता,ठाकुर जी के मंदिर के सामने वे साष्टांग दंडवत प्रणाम करते बरामद हुए|
“दादी के ठाकुर जी! माफ कर दीजिए मुझे| अब चोरी नहीं करूँगा, बस अब की बार इस चिपकने वाली कटोरी से बचा लो|”
मैंने गौर किया कि रामखिलावन भैया सहित घर के सभी बड़े अपनी हँसी दबाने की कोशिश में लगे थे| दादी ने प्यार से बंटू दादा को उठाया और उसके आँसू पोंछ कर पैंट बदल कर आने के लिए कहा|
उसके आने तक मैंने हिचकते-हिचकते, पेट-दर्द से लेकर खाना गिरने और दाई से अल्लम-गल्लम खरीदने की सारी बातें सच-सच मम्मी-पापा और दादी को बता डालीं| अरे! यह तो गजब ही हो गया| हमें डाँटने की जगह सब ठहाके मार कर हँस रहे थे| सबको हँसता देख कर बंटू दादा भी हँसते हुए अपना सर खुजा कर अपने झेंप मिटाने लगा| थोड़ी देर में जब सब कुछ समान्य हो गया तो दादी की गोद में छुपे-छुपे ही बन्टू दादा ने उनसे पूछा|
“दादी! आपको पता कैसे चला?”
बंटू दादा को दुलार करते करते दादी ने कहा|
“तूने उस दाई से केवल दो रूपये का सामान खरीदा था और शायद जल्दबाजी में बचे हुए आठ रुपये लेना भूल गया था| तुमको खाना खिला कर जब रामखिलावन घर को लौट रहा था, तब उस दाई ने उसे पहचान कर बचे हुए छुट्टे पैसे रामखिलावन को ईमानदारी से लौटा दिए थे| उसके घर आने पर हमें सारी बात का पता चला| फिर मैंने यह अंदाज़ लगाया कि तुमने पैसे आखिर निकाले कहाँ से होंगे? मैंने देखा कि भगवान के आसन टेढ़े-मेढ़े हो गए थे और उनका गुल्लख भी अपनी जगह से हिला हुआ था| अब इतनी उम्र में ये सब देख कर मुझे अंदाजा हो ही जाना चाहिए न बंटू  कि तुम दोनों ने पैसे कहाँ से निकाले होंगे?”
“लेकिन दादी! मुझे तो यह पता ही नहीं था कि हमने जो सामान दाई से खरीदा था, वह केवल दो रूपये का था|”
“मतलब तेरे स्कूल में हिसाब के मास्टर बच्चों को ढंग से हिसाब नहीं सिखाते वरना तू दस में दो घटा कर बचे पैसों का हिसाब न कर लेता| तभी मैं तेरे पापा को कहती हूँ कि उस तहसीली स्कूल से बच्चों को निकाल कर घर में पढ़ाई की व्यवस्था करवाओ लेकिन मेरी सुनता ही कौन है|”
“हूँ”-हम दोनो दादी की बात यूँ सुन रहे थे जैसे वह हमें कोई किस्सा सुना रही हो और सबसे मज़े की बात तो यह है कि हमारे चेहरे अपर कोई अपराधबोध नहीं था बल्कि एक तूफ़ान के गुजर जाने के बाद कि शान्ति थी|
अपने पूरे बचपन के गुजरने तक हम भाईबहन को इस तथ्य पर अटूट विश्वास बना रहा कि चोरी करने पर कटोरी का सर पर चिपकना अवश्यमभावी है|
दादी की बात सुन कर बंटू दादा बोल पड़ा-
“दादी! दाई गरीब होकर भी कितनी ईमानदार निकली न? हमसे भी ज्यादा|”
दादी ने हम दोनों को प्यार से अपने आँचल में छुपा लिया|
“तुम्हारी मम्मी को कहूंगी कि हर हफ्ते तुम दोंनो को चार-चार आने दिया करे और उस दाई को यहाँ घर में बुलवा ले ताकि तुम दोनों अपने मन के खेलखिलौने खरीद सको|”
हम उस रात दादी से चिपके-चिपके ही सो गए|
 

 

 

2)
लड्डू-भोज
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दादी के बड़े-भाई गाँव में रहते थे| इस साल गर्मी की छुट्टियों में उनके सबसे छोटे बेटे भास्कर की शादी और नवासे दिनकर की यज्ञोपवीत संस्कार यानि जनेऊ संस्कार में हमारे पूरे परिवार का आमंत्रण था| भास्कर चाचा की शादी में जाने के उत्साह में हम दोनों भाई-बहन एक-एक दिन उँगलियों पर गिन-गिन कर काटने लगे| मायके जाने का उल्लास इस उम्र में भी दादी के चेहरे पर एक चमक बिखेर रहा था| पापा के साथ जाकर दादी खुद बैंक से पैसे निकाल कर लाई और शादी और जनेऊ में अपने रिश्तेदारों को भेंट देने के लिए मम्मी के साथ न जाने कितनी खेप बाजार जाकर तरह-तरह के उपहार खरीद कर लाईं| दोपहर को जैसे ही भोजन का कार्यक्रम खत्म करने के बाद मम्मी और रामखिलावन भैया थोड़ी देर के लिए कम सीधी करने को अपने-अपने कमरों का रुख करते थे, दादी का उपहारों का पुलिंदा खुल जाता और वह एक-एक उपहार की गुणवत्ता और दाम परख कर फिर अपना साजो-सामान जमाने लगतीं थीं| गाँव जाने तक कम-से कम बीस बार दादी का सामान जमा और व्यवस्थित हुआ था, फिर भी वहाँ पहुँचने पर पता चला कि अपना चश्मा तो दादी पूजा के आले में रामायण के गुटके पर ही भूल आयीं थीं| जब दादी दोपहर को अपने कमरे में चुपचाप सारा समान बार-बार जमाती रहती थीं, रामखिलावन भैया और और मम्मी दरवाजे की ओट से उन्हें देख कर मन ही मन में हँसते रहते थे| एक दिन रामखिलावन भैया दादी को शाम की चाय देने के बहाने ठीक उसी वक्त उनके कमरे में गए, जब वह नयी बहु को देने वाले कंगन से अपने हाथों के कंगन की डिजाइन की बारीकी की तुलना कर रही थीं| रामखिलावन को देख कर वह थोड़ी झेंप गईं|
“यह रोज-रोज आप पूरा बक्सा जमाती हैं और अगले दिन पूरा सामान उलीच कर उनको परखती हैं| थक जाती होंगी न अम्मा जी?”
“तुझे क्या करना है रे बौडम? इतने दिनों में भाई के घर पूरे परिवार के साथ जा रही हूँ और वह भतीजे की शादी और नाती के जनेऊ में| हमारे परिवार में तेरे साहब यानि बन्टू के पापा अकेले अफसर निकले हैं तो लेन-देन भी तो उनके रुतबे के हिसाब से होना चाहिए न? कहीं कोई कमी रही तो लोग नाम तो मेरा ही बदनाम करेंगे न कि बेटा इतना कमा रहा है और कुनबा-व्यवहार में हमने कंजूसी कर दी|”
“बात  तो सही है अम्मा जी! हमारे साहब का रौब वहाँ भी कम नहीं होना चाहिए इसीलिये आपने वहाँ लेन देन से लेकर यहाँ सभी के लिए बढ़िया-बढ़िया कपड़े खरीद लिए हैं| हैं न?”
“हाँ रे! एक ही तो बहु है मेरी और वह भी इतनी सुशील और अन्नपूर्णा| मैं चाहती हूँ कि मेरी बहु पूरे कुनबे में सबसे सुंदर और गहनों से लदी-फदी दिखे| गुण तो उसमे पहले ही इतने हैं कि वहाँ सब बस तेरी बहु जी के गुण ही गाते रह जाएँगे और बंटू और छोटी भी राजकुँअर और परी से कम नहीं लगेंगे|”
दादी अपने परिवार के रौब की कल्पना में खो गई| वह बहुत प्रसन्न थीं और मम्मी का इशारा पा कर राम-खिलावन भैया ने अपना उल्लू भी सीधा कर ही लिया|
“अम्मा जी! मैं तो न जाने कब अपनी माई को गाँव में छोड़ कर शहर नौकरी करने चला आया और जब से आप लोगों के साथ हूँ, आप सब ही मेरा परिवार हैं| आप लोगों की खुशी में खुश हो लेता हूँ तो आप लोगों के सुख के लिए ईश्वर से रोज़ प्रार्थना करता हूँ| मैं तो धन्य हो गया आप लोगों के साथ रहकर|”
“तू भी तो परिवार का हिस्सा ही है बौडम! तभी तो भरत तुझे बहे अपने साथ शादी में ले जा रहे हैं| वहाँ रहेगा तो काम-धाम में सबका थोड़ा हाथ ही बँटाएगा, लेकिन सुन ले मेरी चाय वहाँ पर अलग ही बनईय्यो ज्यादा दूध और अदरक की| जब तक मुझे अपने स्वाद की चाय नहीं मिलती, पूजा में मन ही नहीं लगता|”
“एक शर्त पर अम्मा जी|”
“लो! अब कौआ भी खिजाब लगाने लगा| तू अब मुझसे शर्तें लगायेगा रे रमुआ?”
“शर्त तो बनती है अम्मा जी| बेटे जैसा हूँ न आपका?”            
“अब सीधी बात भी करेगा नासपीटे?”
“मुझे भी दो जोड़ी नए कपड़े बनवा दीजिए अम्मा जी! एक बारात में पहन कर जाऊँगा और एक रिपेस्पन पाल्टी में पहनूँगा| अच्छे से तैयार होऊँगा और सबको बताउंगा कि हमारी अम्माजी तो घर के नौकरों को भी कितनी सानोसौकत से रखती हैं|”
“अच्छा-अच्छा अब खुशामद रहने दे और कल जाकर दौलतराम की दूकान पर जाकर उससे मेरी बात करवा दीयों फोन से तो मैं उसे समझा दूँगी और वह तुझे कपड़े काट कर सीमने के लिए दे देगा और उसी के दूकान के बाहर जो उसका दर्जी बैठता है उसे अपने इस तम्बू का नाप दे कर आ जइयो|”
“मेरे तो भाग ही खुल गए कि अम्मा जी आप के पैरों की धूल मेरे नसीब में है| मैं तो धन्य ही हो गया|”
“अब बस कर! बहुत हो गई खुशामद और जल्दी लहसुन डाल कर मेरे लिए कड़ुआ तेल गर्म कर| सुबह जब से नहा कर निकली हूँ, तब से कान बजबजा रहा है|”
“यूँ गया और यूँ लाया अम्मा जी|”
आखिरकार गाँव जाने का दिन आ ही गया औ हम सभी पापा की जीप में सवार होकर रवाना हो गए| दादी ने चलते वक्त एक कनस्तर में ढेरसारी खाने की चीजें बनवा कर रख ली थीं| गाँव की ओर जा रहे मनोहारी रास्ते और प्राकृतिक सुंदरता और स्वादिष्ट नाश्ते ने थकान होने ही नहीं दी और शाम होते-होते हम दादी के गाँव भास्कर चाचा के घर पहुँच गए| जैसे ही पापा की गाड़ी घर की ओर जाने वाले रास्ते पर मुड़ी, दादी ने मम्मी को इशारा किया और मम्मी ने उसे समझ कर अपना पूरा चेहरा घूँघट में छुपा लिया| बन्टू भैया को अपनी माँ का यह दोहन स्वीकार नही था, तो वह फ़ौरन तपाक से दादी से बोल पड़े|
“यह क्या दादी? मम्मी को इतना बड़ा सा घूँघट करवा दिया है आपने, अब कहीं जीप से उतरते समय उनका पैर कहीं फंस गया और वह मुँह के बल धड़ाम से गिर पड़ीं तो?”
“चुप कर तू! तेरी मम्मी को घूँघट में रहने और काम करने का अभ्यास है|”
पापा ने डरते-डरते दादी को टोक ही दिया|
“वैसे अम्मा! अब आजकल इस घूँघट वगैरह की जरूरत नहीं है|”
“अरे भरत! मुझे मालूम है कि हमारे आने की खबर भाभी ने पूरे गाँव में फैला दी होगी और गाँव की कई औरतें घर में ही हमारे पहुँचने का इंतज़ार कर रही होंगी| न जाने किस-किस परिवार से लोग होंगे वहाँ| मैं भले ही घूँघट पर प्रश्न न उठाऊं, लेकिन वहाँ कई ऐसी होंगीं, जो बहु के घूँघट ने करने पर पूरे गाँव में इसे निर्लज्ज या संस्कारविहीन का खिताब देकर डोलती फिरेंगी|”
मम्मी-”आप चिंता न कीजिये अम्मा जी! मैं पूरे समय आपके साथ ही रहूँगी और देहात के सारे कायदों को मानने की कोशिश भी करूँगी| आपके मायके में आपकी नाक कम से कम मेरी वजह से तो नहीं कटनी चाहिए|”
घर के दरवाजे पर छोटी दादी और छोटे दादा के साथ उनका पूरा परिवार आरती की थाल लेकर हमारे स्वागत को खड़ा था और जैसे दादी ने कहा था, उनके पीछे कई दर्जन औरतें घूँघट से ही सारी घटना देखते हुए खुसुर-फुसुर में व्यस्त थीं|
खैर! स्वागत सत्कार के बाद हम सभी अंदर गए| दादी और पापा छोटे दादा और कई सारे चाचा लोगों के साथ बाहरी कमरे में बैठ गए, औरतन के साथ मम्मी भीतर चली गईं और हम दोनों को दिनकर चाचा आँगन में ले गए, जहाँ कई बच्चे पहले से ही धमाचौकड़ी मचा रहे थे|
भीड़भाड़ और परिवारिक संस्कारों के बीच शादी और जनेऊ का उत्सव अपने पूरे खुमार पर था| अपने भाइयों-बहनों से घिरे पापा तो जैसे पहले वाले पापा थे ही नही| अपने घर में जो पापा एक अफसरी आभिजात्य से लिपटे हुए होते थे, वही धोती-कुर्ता पहने हुए नंगे पैर ही पूजा की व्यवस्था में इधर-उधर दौड़ रहे थे| मम्मी रसोई में कई और चाचियों-दादियों के साथ सुबह होने से सूर्यास्त तक घूँघट में छुपी हुई काम करती रहती थीं| राम-खिलावन भैया को देख कर तो ऐसा लग रहा था कि इस शादी की व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ उनके ही सर पर डाल दी गई हो| दादी कभी अपने उम्र की और महिलाओं के साथ आँगन में बैठी हुई बारात के साथ बहु के लिए भेजे जाने वाले उपहारों की जाँच-परख कर रही होतीं तो कभी हलवाई को की रसद देते समय कचौरी में डाले जाने मोयन को लेकर तो कभी लड्डुओं में डालने वाले मेवों को लेकर उनसे भिड़ रही होतीं|  मैं कभी अपनी चचेरी दीदियों के साथ ढोलक पर गायए जाने वाले गानों पर नाचने का अभ्यास कर रही होती, कभी मेहंदी लगा रही होती तो कभी शादी में पहने जाने वाले कपड़ों पर परिचर्चा में गम्भीर वार्ता कर रही होती|
शादी की इस पूरी गहमा-गहमी में बंटू भैया दिनकर भैया के साथ पूरे दिन मस्ती करने के लिए आज़ाद थे| किसी को भी यह देखने की फुर्सत नहीं थी कि भैया और उधमी लड़कों के साथ पूरे दिन गाँव भर में क्या करते घूमते रहते हैं|
दिनकर भैया के जनेऊ संस्कार के बाद जब खाने-पीने का कार्यक्रम अपने पूरे जोरों पर था, परिवार के सभी लड़कों की टोली रात को अंधियारी लुका-छिपी खेलने का प्लान बना रही थी| अंधियारी लुका-छिपी रात को घर की सारी बत्तियाँ गुल करके अँधेरे में खेले जाने वाला खेल है और इसमें हम सभी लड़कियों को भी लड़कों ने बड़ी खुशी से शामिल कर लिया क्योंकि खिलाड़ी जितने ज्यादा होंगे, खेल में रोमाँच उतना ज्यादा होगा|
छोटे दादा जी को डायबिटीज़ की शिकायत होने के कारण, उन्हें मीठा खाने पर सख्त पाबंदी लगाई गई थी| शादी के घर में तरह-तरह के मीठे पकवानों की खुशबू से दिन भर उनके नथुने फड़कते रहते थे, लेकिन छोटी दादी और भास्कर चाचा के के डर से वह कुछ भी खा नही पाते थे| बेचारे रात को अपनी चारपाई छत पर बने हुए दालान में चारपाई पर लेटे हुए रेडियो में विविध भारती सुनते रहते थे|
रात को रसोई के सिमटने के बाद सारी महिलाएँ भीतरी बरामदे में बिस्तर लगाकर लेटी हुई कल बारात जाने के कार्यक्रम पर परिचर्चा कर रही थी| बाहर के आँगन में घर के सारे जवान बैठ कर हँसी-ठिठोली में व्यस्त थे और हम सभी बच्चे अंधियारी लुका-छिपी में व्यस्त थे| दिनकर भैया और बंटू भैया को एक खुराफ़ात सूझी| छत के कोने पर एक कबाड़ घर बना हुआ था| दिनकर भैया ने वहाँ से एक पुरानी फटी हुई मच्छरदानी निकाली जो धूल से अटी हुई थी| छोटे दादा जी के पलंग के बगल में हमेशा एक छोटी सी स्टूल रखी रहती थी, जिसपर उनके जरूरत की छोटी-छोटी चीजों का अम्बार होता था| दिनकर भैया ने चुपचाप छोटे दादाजी की उस स्टूल पर से इनका छोटा पॉकेट टॉर्च उठा लिया और बंटू दादा से हाथ मिला कर अपनी किसी गुप्त योजना के कार्यान्वयन की सफलता पर खुशी जताई| जिसे दादाजी रात को उठते वक्त हमेशा अपने साथ रखते थे| दिनकर भैया के मामा के लड़के थे-महेश भैया| इस बार दाम देने की बारी उनकी थी| हम सभी अपने अपने हिसाब से अंधेरी जगहों में इस तरह छुपे हुए थे कि आसानी से कोई हमें ढूँढ न पाए| मैं अपनी एक चचेरे बहन चुनिया के साथ उस कमरे में छुपी हुई थी, जहाँ शादी के लिए बने सारे व्यंजन और मिठाइयाँ रखी हुई थी| बंटू भैया और दिनकर भैया ने यह योजना बनायी कि जैसे ही महेश भैया ऊपर छत की तरफ उन्हें ढूँढने आयेंगे, वे दोनों अपने हाथ में छोटे दादा की टॉर्च जलाकर और सर से पैर तक पुरानी फटी मच्छरदानी ओढ़ कर नीचे सीढियाँ उतरने लगेंगे तो महेश भैया डर के मार भाग जाएँगे और उन दोनों कोई ढूँढ नहीं पायेगा| हम दोनों बहने दम साढ़े हुए मिठाई-भण्डार में छुपी हुई थीं| तभी धीरे से भण्डार का दरवाजा खुला| घर के भीतर अब किसी भी सदस्य की तेज आवाज़ नहीं आ रही थी| औरतें अपने-अपने बिस्तर में घुसी हुई खुसुर-फुसुर कर रही थीं और पुरूष घर के बाहर बैठे गप्पें हाँक रहे थे| इस तरह किसी के चुपचाप भण्डार में घुसने से हम दोनों बहनें बुरी तरह डर गईं लेकिन लुकाछिपी का दाम कहें हमारे ऊपर न आ जाए, हम दोनों चुपचाप बैठी रहीं और घुसने वाले उस इंसान की कारगुजारियाँ आलमारी के पीछे खड़ी खड़ी देखती रहीं|
उस इंसान ने लड्डुओं के भरे टोकरे से उठा कर पहले दो-तीन लड्डू बिना साँस लिए हुए गपागप खा लिए| उसके बाद दो-तीन लड्डू फिर से मुँह में ठूँस लिए और दोनों हाथों में जितने लड्डू पकड़ पाना उनके लिए सम्भव था, उन्हें लेकर भण्डार से दबे पाँव इधर-उधर सावधानी से देखते हुए सीढ़ियों पर बढ़ गए और आश्वस्त हो गए कि उन्हें लड्डू-चोरी करते हुए किसी ने भी देखा नहीं है|
हम दोनों को यह समझ में आ गया कि कोई न कोई लड्डू चोरी कर के भाग रहा है, जबकि दादी की पूरे परिवार को सख्त हिदायत थी कि बिना उनकी अनुमति के कोई भी मिठाईयाँ जूठी न करे| वह चोर अब धीरे-धीरे दबे पाँव सीढ़ियों से ऊपर जा रहा  था और हम दोनों बहनें भी डर के मारे भण्डार से यह सोच कर निकल आयीं कि कहीं लड्डू-चोरी का इलज़ाम हम दोनों पर न आ जाये| कल सुबह पूरे परिवार के सामने लड्डू-चोरी के झूठे इलज़ाम से अपमानित होने से अच्छा था कि हम लुका-छिपी का दाम ही दे लें|
हमने तय किया कि हम उस चोर की पूरी शिनाख्त करके दादी को पूरे सबूत के साथ इस घटना की जानकारी देकर कल उनकी प्रशंसा और इनाम दोनों हासिल करेंगे| हम दोनों ने अपने मुँह सिले हुए ही इशारों में एक दूसरे को अपने इस मिशन में साथ देने का वादा किया और उस चोर के पीछे-पीछे दबे पाँव निकल गए| जब वह चोर सीढ़ियों पर था, ऊपर से नीचे एक चमकीली आँखों वाला खूब मोटा सा भूत घुंघरुओं की छुनछुन के साथ नीचे उतर रहा था| भूत बिलकुल सफ़ेद कपड़े पहना हुआ था और उसकी केवल एक चमकीली आँख उसके माथे के बीचोंबीच थी| सबसे ऊपर एक आँख का भूत, बीच में लड्डू-चोर और नीचे हम दोनों बहनें| उस भूत पर नजर पड़ते ही चुनिया के होश उड़ गए और आँख बंद करके वह पूरी ताकत से भूत-भूत चिल्ला पड़ी| होहल्ला होते ही भूत खुद भी हडबडा गया और डर के मारे भूत-भूत चिल्लाने लगा|
चुनिया-”अरे ! यह तो बंटू भैया और दिनकर भैया की आवाज़ है|”
इस पूरे होहल्ले से लड्डू-चोर के पैरों के बीच उनकी धोती का छोर दब गया और धोती खुल गई| धोती में पैर फँसने के कारण लड्डू चोर सीढ़ियों में गिर पड़े और उनके मुँह और दोनों हाथों से छूट कर सारे लड्डू सीढ़ियों में फ़ैल गए|
चमकीली आँख वाले भूत ने अब तक दहशत में आकर अपना चोला उतार फेंका| यह तो सच में बंटू भैया और दिनकर भैया ही निकले| दिनकर भैया के कंधे में बंटू भैया बैठे थे और हाथों में छोटे दादा जी की टॉर्च जलाकर पकड़े हुए थे| यही थी उस भूत की चमकीली आँख| ऊपर से दोनों ने पुरानी फटी हुई मच्छरदानी का चिथड़ा ओढ़ लिया था, जो भूत की सफ़ेद खाल बन गई थी|
इस चिल्लपों को सुनकर पूरा परिवार वहाँ इकट्ठा हो गया और पूरे गलियारे की बत्तियाँ खटाखट जल उठीं| ऊपर बंटू भैया और दिनकर भैया धूल से सनी मच्छरदानी ओढ़े हुए बड़ी जोर से आँखें मींचे हुए  दादी का डंडा खाने के लिए हिम्मत जुटा रहे थे और नीचे हम दोनों दादी से पूरी घटना इस तरह बता रहे थे जैसे हमने कोई आतंकवादी पकड़ लिया हो और बीच सीढ़ियों पर खुली धोती से फँस कर गिरे हुए कच्छाधारी लड्डू-चोर अपनी इस कारगुजारी के कारण सारे परिवार के सामने शर्मिंदा से खड़े हुए थे| अरे! यह लड्डू-चोर छोटे-दादा जी ही तो थे| सारी औरतें नीचे घूँघट में मुँह छुपा कर अपने मुँह में आँचल ठूँस कर अपनी हँसी रोकने की कोशिश कर रही थीं तो सारे पुरूष खुले आम हँस रहे थे|
“वैसे कक्का जो थोड़ा कम लालच किया होता और कम से कम अपना एक हाथ खाली रखते तो खुल रही धोती सम्भालना आपके लिए आसान हो जाता|”
पापा जल्दी छोटे दादाजी की तरफ दौड़े और उन्हें सहारा देकर उठाने लगे| शायद उनकी टांग में मोच आ गई थी इसलिए वो थोड़ा लंगड़ा कर चल रहे थे लेकिन टांग में मोच कोई बहादुरी भरे काम से तो आयी नहीं थी कि छोटे-दादा जी अपनी पीड़ा का खुल कर इजहार करते| बेचारे कराहते हुए पापा के कंधे का सहारा लेकर ऊपर अपने पलंग तक पहुँचने की कोशिश करने लगे लेकिन  मोच के कारण पैर ने उठने से जैसे मना कर दिया| उन्हें मन मार कार आज रात नीचे औरतों के कमरे में शरण लेनी पड़ी| काफी देर तक सभी उनके पास रहे|
इसके बाद दादी ने यह निष्कर्ष निकाला कि न ही दिनकर भैया ने अंधियारी लुकाछिपी खेलने का प्लान बनाया होता, न ही बंटू भैया और वह मच्छरदानी वाला भूत बने होटर और न ही उन्हें देखकर यूँ चौंकने से छोटे दादा जी का संतुलन सीढ़ियों पर बिगड़ा होता| बहुत होता तो कल दोपहर तक उनकी डायबिटीज़ थोड़ी बढ़ जाती लेकिन कम से कम इस उम्र में बहु-बेटों और रिश्तेदारों के सामने चोरी के लांछन से तो बच जाते| मोच के कारण उनका बारात में जाना भी रद्द होगया| अब उन्हें घर पर औरतों के साथ ही बहु के गृहप्रवेश तक रहना पड़ेगा और सारे पुरूष बारात में जाएँगे| यहाँ तक कि रामखिलावन भैया ने भी यहाँ दादाजी की सेवा के लिए रुकने का प्रस्ताव सबके सामने नहीं रखा|
तो दादी ने यह निष्कर्ष निकाला कि सारी समस्या की जड़ बंटू भैया और दिनकर भैया के उटपटांग खेल ही हैं और उन्हें इसके सजा जरूर मिलनी चाहिए|
दादी ने चाची जी यानि छुनिया के मम्मी को सबके सामने एक आदेश दिया|
“छुटकी बहुरिया! इन दोनों बच्चों का बिस्तर आज मिठाई के भण्डार के अंदर लगा दो और कल पूरे परिवार का नाश्ता होने तक इन्हें अंदर ही रहने दिया जाए|”
बन्टू भैया- दादी यह तो हमारे साथ अन्याय है| चोरी छोटे दादाजी ने की और सजा हमको| अब हम खेलना भी छोड़ दें क्या?”
“तो भुतहा भेस धरने की क्या जरूरत थी तुम दोनों को? समस्या तो तुम्हारे उसी फितूर से हुई न|”
“पर दादाजी को भी सजा मिलनी चाहिए क्योंकि न्याय किसी के उम्र नहीं देखता|”
“चुप कर| उनको तो सजा मिल गई न| अब पैर की मोच के कारण वह कल बारात में नहीं जा पायेंगे| न जाने कब से इस दिन के लिए तैयारी कर रहे थे लेकिन हद हैं भाई जी भी| इस उम्र में इस तरह लड्डू चुराना वह भी डायबिटीज होने के बावजूद? चलो अब दोनों अंदर जाकर सो जाओ|”
छोटे दादा-”सही कह रहे हैं बच्चे बहिनी! मुझे भी सजा दो| मेरी खटिया भी अंदर लगवा दो|”
“ताकि रात भर आपकी चांदी हो जाए और आप गपागप मिठाई सोंटे? नहीं आप आज बहुओं के साथ ही सोयेंगे और वह भी धोती पहन कर|”
बंटू भैया बड़े दुःख के साथ बड़ी देर तक भण्डार घर के दरवाजे पर खड़े होकर मम्मी को निहारते रहे कि शायद मम्मी का ममता भरा दिल पसीजे और वही दादी को उन दोनों को कमरे में बंद होने से बचा लें| बंटू भैया की नजर जैसे ही मुझ पर पड़ी, उनकी आँखों में खून उतर आया| मैं डर के मारे दादी के पीछे छुप कर उन्हें देखने लगी|
“छोटी! तू तो पक्का पिछले जन्म में मेरी दुश्मन ही रही होगी| तुझे तो यहाँ से निकल कर देखूंगा| फ़िलहाल दादी आप जरा राम खिलावन भैया से कहिये कि अंदर एक जग पानी का रख दें|”
“वो क्यों?”
“अरे दादी, भूख लगेगी तो मिठाई खा कर काम चला लेंगे और उसके बाद पानी भी तो पीना पड़ेगा न|”
वहाँ खड़े सभी लोग बंटू भैया के इस कार्यक्रम पर  ठहाके मार कर हँस पड़े और दादी ने अपना माथा ठोंक लिया|
 

 

 

3)
खेल-भावना
**********
दादी और मम्मी के पोषण के सिद्धांत के शिकार बंटू दादा दिनोंदिन अपनी फुटबॉल के जैसे ही दिखने लगे थे| एकदम गोलमटोल| खानदान का वारिस होने के कारण दादी की विशेष ममता का शिकार बंटू दादा जब कभी दौड़ते थे, तो ऐसा लगता था जैसे कोई बड़ा सा गैस का गुब्बारा हाथ से छूट कर उड़ा जा रहा है|
“दादी! मम्मी से कहो न! स्कूल के लिए मेरी नयी पैंट बनवा दें|”
“क्यों भला?”
“अरे! टाईट हो गई है न पेट में| दुखता है मुझको|”
“तेरी माँ भी न, सारी कंजूसी बस बच्चों के आराम और खाने में ही करती है| चिंता मत कर मेरे लड्डू! आज यही पैंट पहन जा| तेरी पैंट का कुछ करती हूँ|”
बंटू दादा पैर पटकते और ठुनकते हुए, बेमन से वह पुरानी यूनिफॉर्म पैंट पहन कर स्कूल चले गए| घर के काम खत्म होने के बाद जब दादी और मम्मी साथ बैठ कर रेडियो सुन रही थीं तब दादी ने मम्मी से इस मुद्दे पर बात की|
“बंटू के लिए नयी यूनिफॉर्म पैंट क्यों नहीं ला देती बहू? कह रहा था कि उस पैंट में उसका पेट दबता है|”
“अम्मा जी! वह पैंट तो नयी ही है| अभी पिछले महीने तो लाकर दी थी| सात साल के बच्चे की नाप से दो नाप बड़ी ही लाई थी लेकिन बंटू की तोंद में कुछ सही नहीं अटता| अब उससे बड़ी लाऊंगी तो वह घुटनों से नीचे चला जाएगा, वह भी तो अजीब लगेगा न|”
“हाय,हाय! कैसी माँ हो तुम भी बहू| अपने बच्चे की तंदुरुस्ती को खुद ही नज़र लगा रही है| खायेगा पिएगा नहीं तो आगे चल कर जिंदगी की दौड़ के लिए ताकत कैसे जुटा पायेगा|”
दादी मम्मी पर गुस्सा हो रही थीं|
“आप ही बता दीजिए अम्मा जी! मुझे क्या करना है?”
“एक काम करो बहू| पैंट की पिछली कपड़े की पट्टी हटा कर वहाँ इलास्टिक लगा दो| जितना बच्चे के पेट की ज़रूरत होगी होगी, पैंट उतना फैल जायेगा|”
मम्मी को एक आदर्श बहू की तरह बहुत ज्यादा सिलाई-कढ़ाई का हुनर तो नहीं आता था लेकिन दादी के आतंक के कारण थोड़ा बहुत सिलाई-सुधार का काम घर पर ही निबटाना मजबूरी थी| आज बंटू के आने के पहले उसकी स्कूल की एक पैंट की कमर में इलास्टिक लगा दी गई| शाम को स्कूल से आने के बाद दादी ने सबसे पहले बंटू को पैंट पहना कर उसकी कमर की सिलाई की पड़ताल की|
“देख ले मेरे बच्चे! अब तुझे पेट पर पैंट कड़क ना लगेगी|”
बंटू दादा अब भी असंतुष्ट से लगे|
“दादी! यह तो अब थोड़ी ढीली हो गई है|”
“अरे तो ठीक है बेटा! तेरा पेट नहीं दबेगा अब|
बंटू दादा बहुत खुश तो नहीं थे, लेकिन मना करने का सीधा मतलब अगले दिन स्कूल से छुट्टी करके मम्मी के साथ बाज़ार जाकर नया पैंट खरीदने का बोरिंग काम करना था| उन्होंने फिर समझौता करके वही पुराना पैंट नयी इलास्टिक के साथ पहनना मंजूर कर लिया|
शाम को पापा जब ऑफिस से लौट कर सबके साथ बैठे चाय पी रहे थे, तब उन्होंने दादी और मम्मी से दुनिया की सारे खबरें सुनाने के बाद आज की सबसे महत्वपूर्ण खबर सुनाई|
“तहसील स्कूल में अगले हफ्ते वार्षिक खेल-दिवस का आयोजन है और उसमे मुझे चीफ-गेस्ट बनाया गया है| आप दोनों का भी निमंत्रण है| चलिएगा आप भी|”
दादी- “वाह! यह भी खूब रहेगी| हम ज़रूर जाएँगे|”
मैं वहीं ज़मीन पर पसर कर ड्राइंग कर रही थी|
दादी-”छोटी! तूने किस खेल में हिस्सा लिया है?”
“दादी मैं किसी खेल में नहीं हूँ| खेल शुरू होने के पहले स्वागत समारोह में मुझे देशभक्ति का गाना गाना है|”
मम्मी-”अरे वाह मेरी लाडो! कौन सा गाना गायेगी?”
“चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है|
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा बच्चा राम है|”
मैंने बाकायदा खड़े होकर पूरा गाना, पापा,मम्मी, दादी और रामखिलावन भैया को सुना दिया और सबने तालियाँ भी बजाईं| अपनी आदत के अनुसार दादी ममता से सराबोर होकर अपनी नाक और आँख दोनों ही अपने आँचल से पोंछने लगीं| समझ में नहीं आता कि ममता की आवाज़ इतनी हास्यास्पद क्यों होती है|
“मेरी नवासी एक दिन हम सब का नाम पूरे समाज में रोशन करेगी| बहू गोयेंठा सुलगाओ|”
पापा की नज़रें बंटू दादा को ढूँढने लगीं|
“बंटू कहाँ है छोटी?”
““पापा! दादा अपनी गुलेल में फँसा कर कैरी तोड़ने के लिए मिट्टी की गोलियाँ बनाकर उन्हें धूप में सुखा रहे हैं|”
“उसको भी न जाने कैसी-कैसी फितूर सूझती रहती है| अब उसे यह आइडिया किसने दे दिया भला?”
“रामखिलावन भैया ने पापा|”
मैंने अपना काम तल्लीनता से करते-करते अनजाने में ही रामखिलावन की चुगली पापा से लगा दी| पापा ने गुस्से से रामखिलावन भैया को घूरा और उन्हें चूंदी से पैर तक पसीना छूट गया|”
“एक तो वैसे ही पढ़ाई-लिखाई में उसका मन नहीं लगता, स्कूल से उसकी बदमाशियों की इतनी शिकायतें आती हैं और तुम उसे और उलटे-सीधे काम सिखा रहे हो? जाओ,उसे बुला कर लाओ ज़रा|”
रामखिलावन भैया ने पापा की डाँट से बचने के लिए वहाँ से पूरी रफ्तार से हमारे कमरे की तरफ दौड़ लगा दी|
“बंटू बाबा! न आपने मुझसे गुलेल की गोटी के बारे में पूछा होता और न ही साहब जी से मुझे डांट पड़ती| जाइए बाहर बैठक में साहब जी आपको पुकार रहे हैं|”
बंटू दादा के चेहरे पर एक दहशत का भाव आ गया था|
“क्यों? क्या पापा को पता चल गया कि गुलेल की गोटी बनाने के लिए मैंने सारी कच्ची बेरें तोड़ ली थीं|”
“अरे नहीं बाबा! अभी तो उस कारगुजारी का भाँडा बाद में फूटेगा| अब भागिए आप वरना साहब की दूसरी आवाज़ के साथ मेरी नौकरी पर शामत आ जायेगी|”
बंटू दादा दौड़ते-हाँफते बैठक में आ कर खड़े हो गए|
“हाँ पापा! आपने क्यों बुलाया मुझे?”
“क्या कर रहे थे अंदर?”-पापा ने कड़क आवाज़ में बंटू दादा से पूछा|
“वो पापा मैं  गुलेल में फँसाने के लिए कच्ची मिट्टी की गोलियाँ बना कर सूखने रख रहा था| आपको कुछ काम था क्या?”
पापा ने बंटू दादा को ऊपर से नीचे तक घूरा| उनके हाथ, बाल, चेहरा और कपड़े मिट्टी में सने हुए थे| पापा को अपनी तरफ घूरते हुए वह झेंप मिटाने के लिए हँस पड़े|
“ही ही ही ही|”
“दिन भर उल्टी-सीधी शरारतें करते रहते हो| अगले हफ्ते  तुम्हारे स्कूल में खेल दिवस मनाया जा रहा है तो तुमने भी किसी खेल में भाग लिया है कि नहीं?”
“नहीं पापा! मैंने तो किसी खेल में भाग नहीं लिया|”
“क्यों?”-पापा के चेहरे पर गुस्सा झलक आया|
“पापा न ही गुलेल से निशानेबाजी की प्रतियोगिता रखी गई है और न ही कैरम या चेस की| मैं क्या करता? मेरे पसंदीदा कोई खेल हैं ही नहीं|”
“अरे! ये कोई दौड़-भाग के खेल हैं क्या? मुझे प्रतियोगिताओं की लिस्ट मिली है| अलग-अलग कई प्रकार की रेस होने वाली है| उनमे से ही किसी रेस में भाग लो|”
बंटू दादा का किसी भी रेस में भाग लेने का मन तो नहीं था लेकिन पापा के डर से उन्होने ऐसी रेस का चयन किया, जिसमे उसे कम दौड़ना पड़े| मोटू थे न इसलिए| अगले एक घण्टे तक इस मुद्दे पर काफी बहस हुई और अंत में यह तय हुआ कि बंटू दादा सुई-धागा दौड़ में भाग लेगा| रात को खाना खाने के बाद रामखिलावन बच्चों के कमरे में बैठ कर अगली सुबह के नाश्ते के लिए सब्जी साफ़ कर रहा था| मैं खेल दिवस में गाये जाने वाले गाने का अभ्यास कर रही थी लेकिन बंटू दादा राम-खिलावन भैया के साथ चिंता में बैठे कच्ची भिन्डी चबा रहे थे और रामखिलावन उसके चेहरे पर दौड़ रही चिंता के रेस को देख रहा था|
“जैसे आप भिन्डी चबा रहे हैं,उससे तो लग रहा है आप घोर चिंता में हैं बाबा| का बात है? हमको बताइए|”
“घर में किसी से बताओगे तो नहीं भैया? तो बताऊँ|”
“आपने बाड़ी में लगी फूल-गोभियों को पौधों में लगे लगे ही पनपने के पहले ही छुरुर के खा लिया, तो क्या मैंने किसी को बताया?अम्मा जी को यही अब भी यही पता है कि बंदर ने यह करामात दिखाई है और कच्ची बेर......”
“बस बस रहने दीजिए| मेरे कारनामों की लिस्ट मत गिनाइये| आखिर बाड़ी में ताजी सब्जियाँ दादी लगवाती तो  हम बच्चों के लिए ही हैं न? कि मेरे बच्चे ताजी सब्जियाँ खायेंगे और हष्ट-पुष्ट रहेंगे? इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि वह सब्जी मैं प्लेट में रख कर खाऊँ या पेड़ से सीधे तोड़ कर?”
राम खिलावन भैया बंटू दादा के तर्क से हार मान गए|
“अच्छा बाबा जी! बताइए आपको अभी कौन सी चिंता खा रही है?”
“चिंता यह है भैया कि मुझे तो सुई में ठीक से धागा डालना आता ही नहीं है| वहाँ मैदान में क्या करूँगा और अब पापा ने अगर कह दिया है कि भाग लेना है मुझे लेना ही पड़ेगा|”
मैं बोल पड़ी|
“दादा! अभी तो तीन दिन हैं न ! आप और कुछ काम मत कीजिये और मम्मी से एक सुई लेकर उसमें धागा डालने की प्रैक्टिस कीजिए|”
“धत तेरे की! अगर एक यह रेस मैं जीत भी गया तो क्या इस मैडल के बूते पर मुझे कोई सेना में निशानेबाज बना देगा या जब फिजिकल टेस्ट होगा तो मुझे सेना के कमांडर सुई में धागा डालने का टेस्ट लेंगे? नहीं न? तो ऐसे बेकार के काम में मैं अपने पूरे दिन  बर्बाद कर दूँ? दो दिन? जीवन का एक-एक दिन मेरे लिए कितना कीमती है छोटी, तुझे इसका अंदाजा है?तुझे क्या लगता है कि गुलेल से निशाना क्या मैं पड़ोस वाले राजू को हराने के लिए लगाता हूँ? कल को बड़ा होकर जब सेना में निशानेबाज़ बनूँगा तो मेरा यही गुलेल-अभ्यास मुझे दुश्मनों को मार गिराने में मेरी सहायता करेगा|”
रामखिलावन भैया अब बंटू दादा की डायलॉगबाज़ी से प्रभावित होते से लग रहे थे| वह सब्जी काटना छोड़ कर अपना मुँह फाड़े-फाड़े बंटू दादा की बातें सुन रहे थे|( जब रामखिलावन भैया किसी बात में खो जाते थे तो उनके मुँह की गुफा घंटों खुली रहती थी|) मुझे अब बंटू दादा की बातों से बगावत और खुराफात की बू आने लगी थी|
“देखिये दादा! मन हो न हो, अब आपको भाग तो लेना ही पड़ेगा वरना आपको पता है कि पापा की सजाएं बड़ी सस्पेंस होती हैं|”
बंटू दादा अब रामखिलावन भैया को पटाने में व्यस्त हो गए|
“भैया! मेरे भविष्य को अँधेरे में जाने से बचाने के लिए अब आप ही कुछ कर सकते हैं|”
रामखिलावन भैया हड़बड़ा गए|”
“अरे क्या मैं सेना के किसी कमांडर को जानता हूँ जो मैं आपकी सिफारिश करूँगा?”
“नहीं भैया, आपको बहुत छोटा सा काम करना होगा वरना दादी को यह बताने में मुझे दो मिनट लगेगा कि परसों उनके ठाकुर जी का लोटा आपने गंगा जल की जगह नल के पानी से धो दिया था|”
दादी का नाम सुनते ही रामखिलावन भैया ने हथियार डाल दिए|
“अरे बंटू बाबा! काहे हमें जीते जी मरवाने की पिलानिंग करते रहते हो| बताओ हमें क्या करना है?”
“आपको मम्मी के सुई-धागे के डिब्बे से एक सुई लेकर उसमे धागा डाल कर मुझे चुपके से लाकर देना है और फिर इस बात को अपने जीते-जी किसी को न बताने की कसम खानी है, वरना दादी ही आपसे जवाब माँगेंगी कि गंगा जल......|”
“बार-बार अम्माजी का नाम मत लीजिए भैया! बहुत डर लगता है| ठीक है| कल सुबह आपका काम  करूँगा| लेकिन आप दोनों इस बात का वादा कीजिये कि मेरा नाम न फँसे|”
अब बंटू दादा खुश और बेफ़िक्र हो गए|
“अरे, उसकी ज़रूरत ही क्या होगी| मैं जब मैडल लेकर घर आ जाऊँगा तो पापा या कोई और खुशी के मारे और कुछ सोचेगा ही नहीं|”
अगले दिन दोपहर को हमारे स्कूल से लौटने के बाद, जब मम्मी और दादी आँगन में पापड़ सुखाने में व्यस्त थीं, रामखिलावन ने डरते-डरते मम्मी की सिलाई-मशीन में रखे सुई-धागे के डब्बे से एक सुई में धागा पिरो कर बंटू-दादा को लाकर दे दिया| डर के मारे राम-खिलावन भैया की साँस धोंकनी की तरह चल रही थी और मुझे भी ऐसे डर लग रहा था जैसे मैंने रंगे हाथों पकड़ी गई हूँ लेकिन बंटू दादा बड़े आराम से अपने कमरे में बैठा पिंकी की कॉमिक-बुक पढ़ रहा था| सुईधागा लेकर रामखिलावन भैया दौड़ते हुए हमारे कमरे में आये और धीरे से फुसफुसा कर बोले|
“बंटू-बाबा! यह लीजिए अपना सुई-धागा! अब मैं चला आँगन में वरना इतनी देर तक मुझे गायब पाकर अम्मा जी को जरूर शक हो जायेगा|”
रामखिलावन भैया ने फिर पलट कर पीछे नही देखा और दादी से नज़रे चुरा कर पापड़ सुखाने लगे|  
मुझे स्कूल में यह बताया गया था कि खेल-दिवस के आयोजन में सबसे पहले परेड होगी और एक सुसज्जित रथ पर राम, कृष्ण, झाँसी की रानी, गाँधी बापू और ऐसे कई महापुरुषों का वेश धारण किये हुए बच्चों के साथ मैं भी बैठूंगी और माइक से अपना गाना गाऊँगी| एक रथ पर सवार होकर गाना गाने की कल्पना से मैं खुद को बंटू दादा से थोड़ा बेहतर महसूस कर रही थी| मैं कितना सम्मानजनक और जिम्मेदारी का काम करने जा रही थी और बंटू दादा को देखो, सुई में धागा भी घर से डाल कर ले जाएँगे| पापा,दादी,मम्मी और न जाने कितने अंकल-आंटी तम्बू के नीचे बैठ कर मुझे रथ पर सवार गाते हुए देखेंगे| अपने आपको मैं बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थी|
फिर खेल-दिवस वाला दिन आ ही गया|
आज हम दोनों बड़ी सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार हो गए थे| मैं जितनी उत्साहित थी, बंटू दादा उतने ही अपसेट थे| तैयार होने के बाद उन्होंने बड़ी सफाई से पहले से धागा डली हुई सुई को अपनी हाफ-पैंट की निचली तुरपन के भीतर छुपा लिया| उनको तैयार करते-करते रामखिलावन भैया बार-बार उनके कान में फुसफुसा रहे थे|
“बंटू बाबा! अभी भी मान जाइए! खेल में बईमानी करना भी पाप होता है|”
“और एक नन्हे से बेटे को उसका मन  न होने पर भी लड़कियों की प्रतियोगिता में झोंकने का जो कांड पापा ने किया है, क्या वह पाप नहीं है?”
रामखिलावन भैया समझ गए कि अब बंटू दादा को समझाना नामुमकिन है|
खैर साफ-सुथरे यूनिफॉर्म पहन कर हम दोनों स्कूल पहुँचे| आज तो पापा ने अपने ड्राइवर से कह कर अपने ऑफिस की जीप से हम दोनों को स्कूल छुड़वाया| एक क्लास की सारी टाट-पट्टियाँ समेट कर वहाँ दरी बिछा कर उसे ड्रेसिंग-रूम में तब्दील कर दिया गया था और उस पर जगह-जगह बच्चों के उतारे हुए कपड़े बिखरे हुए थे| ड्रेसिंग-रूम में राम,कृष्ण,झाँसी की रानी,भारत-माता,बापू जी,नेहरु जी तैयार हो रहे थे| तहसील की रामलीला-मंडली का कॉस्ट्यूम-डिज़ाइनर बड़बोले मियाँ,अपनी निगरानी में सारी साज-सजावट करवा रहे थे| एक मेकअप-मैन भी आया हुआ था, जो भारत की इन शानों का मुँह जरूरत से ज्यादा गोरा बनाने में लगे थे|
चतुर्वेदी आचार्य जी- “गुप्ता जी! आपको नहीं लग रहा हाकी आपने बच्चों के मुंह में थोड़ा ज्यादा जिंक पोत दिया है| सफ़ेद मुँह के भूत तो नहीं लगेंगे सब? कलेक्टर साहब,तहसीलदार साहब और विधायक महोदय भी आ रहे हैं, हमारा आयोजन देखने के लिए| ध्यान रखियेगा कि हमारे स्कूल की नाक न कटे|”
गुप्ता जी-”अरे माट साब! आपकी नाक, हमारी नाक| अगर काम खराब हुआ तो अगले खेल दिवस का काम प्रिंसिपल साहब रमाकान्त नाट्यमंच वालों को न दे देंगे?”
चपरासी दौड़ते हुए ड्रेसिंग-रूम में आया|
चपरासी-”आचार्य जी! आचार्य जी! गजब हो गया| वह बग्घी-वाला दरबारी पंडित नहीं आएगा| उसकी बीवी को चौथा बेटा हुआ है सो मन्नत पूरी करने खातिर अखंड रामायण में बैठ गया है|”
आचार्य जी-”बस? और बड़ी मनहूस खबर नहीं सुना सकता था बे तू? हे भगवान! अब क्या होगा? ये सारे देवी-देवता,महापुरुष और ये गायिका, क्या अब मेरे सर पर बैठ कर शोभायात्रा में निकलेंगे? हो गया न बंटाधार?”
आचार्य जी सर पकड़ कर दरी में बैठ गए| उन्हें इस तरह बैठा देख कमरे में सन्नाटा दौड़ गया| तभी बडबोले मियाँ उनके बगल में जा बैठे और उनके कान के पास मुँह लेजाकर बोले|
“आप अगर मुझे गाली न दें तो एक सलाह मुफ्त में दूँ?”
“अरे बिलकुल बड़बोले! आप ही पीछे क्यों रहें? मेरा जुलूस निकालने में यदि कुछ कमी रह गई हो तो आप पूरी करें| मेरी नौकरी तो गई समझो अब| फिर ट्यूशन के लिए दरवाजे-दरवाजे खटना पड़ेगा|”
“मेरी मानें तो मैं जिस ठेले में यह सारी ड्रेस और सजावटी सामान ले कर स्कूल लाया हूँ, उसी ठेले का रथ बना लीजिए| मैं एक ज़रीदार चादर उसमें बिछा दूंगा और खुद उसे ठेलूँगा,ताकि अबकी किसी गलती कि गुंजाइश न रहे|”
बड़बोले मियाँ की यह सलाह मानने  के अलावा ऐन वक्त पर आयी इस समस्या से निपटने का आचार्य जी के पास और कोई चारा नहीं था|
सारा स्वागत समारोह पूर्वनियोजित तरीके से संचालित हुआ| बस मैं, स्कूल की सम्मानित गायिका और देश की ऐतिहासिक धरोहर बने बच्चे बड़बोले मियाँ के खस्ता-हाल ठेले पर सवार कर दिए गए| ठेला छोटा था और उस पर बैठने वाले उम्मीदवार ज्यादा, साथ ही दो लाउडस्पीकर भी अब उसी ठेले में सेट करना था| इन सब की भीड़ में मैं और मेरा सुर, दोनों का मूड खराब हो गया| जब हमारा ठेला स्वागत मंच के ठीक सामने पहुँचा, तो मेरी नज़र दादी, मम्मी और पापा पर पड़ी| मन में ख्याल आया कि काश यह धरती यहीं फट जाए और मैं इस सड़े-टूटे ठेले में बैठ-बैठे ही अंदर चली जाऊं| कितना बुरा लग रहा था मुझे| दादी को मैंने इस एक हफ्ते में न जाने कितनी बार अपनी भावी रथ-यात्रा के बारे में बताया था| दादी के मुँह पर मेरी नज़र पड़ी तो समझ में आया कि वो भी मेरे इस रथ को देख कर बहुत खुश नहीं हुई थीं| अपमान के मारे मैं गाने के बोल भूल गई| माइक ठीक मेरे मुँह के सामने फिट किया गया था| गाने की जगह उसमे से दूसरे राग वायु में विस्तृत होने लगे| मैं फिर से हमेशा की तरह दहाडें मार कर रो रही थी| सारे अतिथि अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो गये| आचार्य जी न तुरंत माइक का बटन बंद किया और ठेले को जल्दी-जल्दी ठेलते हुए स्वागत मंच के सामने से दूर ले जाने के लिए, बड़बोले मिया को इशारा किया| मेरी पूरी शान फुस्स हो चुकी थी और अब बंटू दादा को अपनी काबलियत दिखाने की बारी थी|
दो-तीन प्रतियोगिताओं के बाद सुई-धागा दौड़ की घोषणा हुई और बंटू-दादा पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी जगह पर जम गए| मम्मी,पापा और दादी अब बड़ी आशा से बंटू-दादा को देख रहे थे| अब खानदान की इज्ज़त का पूरा दारोमदार बन्टू-दादा की सुई-धागा दौड़ पर टिका था|
जैसे ही रेस की शुरुआती घंटी बजी,बंटू-दादा सारे बच्चों के साथ पूरे जोश के साथ सुई धागे की तरफ दौड़ा| मम्मी को तो इतना जोश आया कि खड़ी होकर तालियाँ बजाने लगीं और दादी की ममता फिर उनके पल्लू में आवाज़ करने लगी|
दौड़ के दूसरे कोने पर एक टेबल में कई जोड़े सुई और धागे के टुकड़े रखे थे| बंटू-दादा ने वहाँ पहुँच कर एक हाथ से टेबल पर रखा हुआ सुई-धागा  उठाया और दूसरे हाथ से बड़ी सफाई से अपने पैंट की तुरपन में छिपाई हुई  वह सुई निकाल ली, जिसमे रामखिलावन भैया ने घर से ही धागा डाल कर दिया था|
बंटू-दादा के होश फाख्ता हो गए|
“हे भगवान! मैंने घर में क्यों ध्यान नहीं दिया| रामखिलावन भैया कितने बड़े ढेंचू हैं| उतने इतना भीं नही पता है कि प्रतियोगिता में सुई में हमेशा सफ़ेद धागा डाला जाता है| इन्होने तो लाल धागा डाल कर दे दिया| अब तो मुझे सुई में खुद ही धागा पिरोना पड़ेगा|”
बंटू-दादा ने घर से लाई सुई को सबकी नज़र बचा कर नीचे फेंक दिया और पूरी तन्मयता से धागा सुई में पिरोने में खो गए| आज तक अगर कोई काम पूरी तन्मयता से किया जाए और उसमे सफलता न मिले, भला ऐसा हुआ है? बंटू-दादा ने सुई में धागा पिरो ही लिया| वह बहुत खुश थे|
“मैंने धागा पिरो लिया|”
जब धागा पिरोने के बाद बंटू दादा फिर से रेस के आरम्भ बिंदु की तरफ दौड़ने के लिए पलटे तो उन्हें नज़ारा देख कर चक्कर आने लगे| सारे प्रतियोगी आरम्भ बिंदु तक पहुँचने ही वाले थे और वह इस तरफ निरे अकेले ही अपने हाथ में सुई-धागा लिए हुए खड़े थे| हार जाने के अपमान से उनका मुँह लाल  हो गया| उन्हें रुलाई आने ही वाली थी कि उनकी नज़र चतुर्वेदी आचार्य जी पर पड़ी| गुस्से से बंटू दादा उनपर बिफर पड़े|
“आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया आचार्य जी कि धागा डालने में मुझे ज्यादा देर लग रही है?”
“अरे तो क्या हुआ? अभी भी सारे बच्चे प्रारम्भ बिंदु तक नहीं पहुँच पाए हैं लड्डू-नरेश| हिम्मत जुटाओ और दौड़ पडो|”
आचार्य जी की बात सुन कर बंटू-दादा पूरे जोश के साथ जोर से दौड़ पड़े| पूरे मैदान में बंटू-दादा अकेले दौड़ रहे थे और फिर एक बार ऐसा लग रहा था कि कोई गेंद लुढ़क रही है| सारे बच्चे उनका मजाक उड़ा रहे थे| पापा को बैठे-बैठे गुस्सा आ रहा था और मम्मी दुःख में मारे चुप बैठी थीं| दादी ने अपने माथे पर अपना हाथ दे मारा था और मैं भीड़ में गुम हो गई थी| बीच मैदान में पहुँचते ही बंटू दादा खड़े हो गए| कुछ देर कुछ सोचा और फिर मंथर गति से दौड़ते हउए किसी तरह रेस के प्रारम्भ बिंदु तक पहुँच पाया| हाँ बंटू दादा का आख़िरी स्थान आया था|
शाम को घर पहुँचते ही पापा का गुस्सा फूट पड़ा| पहले मेरे ऊपर और फिर बंटू-दादा के ऊपर|
“आखिर तुमको पोंगा फाड़ कर रोने की क्या जरूरत थी| ठेले पर और भी तो बच्चे बैठे थे| कम से कम अपना गाना तो ठीक से गाती|”
दादी को पापा पर गुस्सा आ गया|
“हद करते हो तुम भी भरत! एक खस्ताहाल ठेले में तहसीलदार की बेटी बैठ कर गाना गाये तो क्या इसमें हमारे खानदान की बेइज्जती नहीं है?”
“अरे अम्मा! अब स्कूल के फंक्शन में बच्ची के गाने से आपके खानदान कि इज्ज़त कहाँ से चली गई|”
अब पापा बंटू दादा की तरफ मुखातिब हुए|
“और आप शुभांक शर्मा जी? जब तुम सारे बच्चों के आरम्भ बिंदु तक पहुँचने तक इसी तरफ खड़े हुए सुई में धागा ही डालते हे रहे थे तो तुमको पूरे मैदान में अकेले टहलने की ज़रूरत क्या थी?”
बंटू दादा को अब बड़ी ज़ोर से गुस्सा आ गया|
“आपने ही ने तो मुझे कहा था कि खेल-भावना के साथ खेलना चाहिए| मैं तो पूरी स्पीड के साथ दौड़ा था| सारी गड़बड़ दादी और राम-खिलावन भैया ने की है|”
बंटू दादा की बात सुन कर सब अचम्भित रह गए|
पापा-”अब रामखिलावन और दादी कहाँ से आ गई तुम्हारी रेस के बीच में बंटू?”
“रामखिलावन को सुई में लाल धागा डालने की क्या ज़रूरत थी, सफ़ेद नहीं डाल सकता था? और दादी आपको कहा था न कि मेरी पैंट सुधरने के बाद भी ढीली है? बीच मैदान में पहुँचते ही उसकी इलास्टिक के कोने छूट गए थे| बीच मैदान से चाहे आगे या चाहे पीछे मुझे जाना तो था ही| पीछे जाने की कोई वजह नहीं थी| मजबूरी में आगे ही दौड़ता रहा| जोर से दौड़ता तो पैंट सरक जाती पापा| फिर आपकी दो बार नाक कटती| एक बार मेरे हारने के कारण और दुबारा मेरे बिना पैंट के हारने के कारण|”
सब चुपचाप खड़े थे और बंटू-दादा रोते हुए अपने कमरे में चले गए|
आज की हार के एवज में पापा ने अगले दिन बन्टू दादा को एक पैंट के बदले  कई नए कपड़े दिलवाए थे और मम्मी का सिलाई-प्रशिक्षण अब दादी खुद कर रही थीं|
“कम से कम एक इलास्टिक तो टाँकना आना ही चाहिए न बहू? क्या सीख कर आयी हो तुम अपनी माँ के घर से?”
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बंटू के कारनामें

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