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अर्पण कुमार की कहानी 'सेल की गाँठ'
अर्पण कुमार की कहानी 'सेल की गाँठ'
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© Arpan Kumar

Classics

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सेल की गाँठ

  

नियंता चौधरी आए दिन घर के बजट को संतुलित करने की कोशिश में लगी रहती।बच्चों के संग बाज़ार जाती, तो उनकी पाँच  फरमाइशों में बमुश्किल दो या तीन पूरे करती। सुपर मार्केट और पास के थोक विक्रेता की दरों का, सामान दर सामान तुलनात्मक अध्ययन करती। इस चक्कर में उसे थोड़े से सामान की खरीद में भी बड़ा वक़्त   लग जाता। हर समय दिमाग पर ज़ोर देने से उसके सिर के बाल असमय झड़ने लगे थे। मगर स्वयं के स्वास्थ्य को पटरी से गिराकर भी वह गृहस्थी की गाड़ी को पटरी पर बनाऐ  रखना रखना चाहती थी। किस सामान पर कितना ऑफर है, उसे कब खरीदना उचित होगा, हर चीज पर उसकी नज़र रहती।

 

कमलेश और नियंता दोनों कॉलेज में सहपाठी थे। दोनों का प्रेम विवाह था। दोनों के घरवाले इस शादी के खिलाफ थे। नियंता ने शादी के बाद अपना ‘सरनेम’ नहीं बदला और कमलेश भी ऐसी किसी परंपरा को पसंद नहीं करता था। कमलेश त्रिपाठी और नियंता चौधरी दोनों तब दिल्ली विश्वविद्यालय के दो अलग-अलग कॉलेजों मॆं एड-हॉक पर पढ़ा रहे थे। इस बीच ‘कम्मो’ ने जन्म लिया। कमलेश के ना-ना करने के बावजूद नियंता ने कम्मो को भरपूर प्यार करने और समय देने के लिए अपनी एड-हॉक की नौकरी हँसते हँसते छोड़ दी। समय कैसे बीता, पता ही नहीं चल पाया। कम्मो के पैदा होने के कोई दो साल बाद ‘कुन्नू’ आ गया। जब नियंता के दूसरी बार पाँव भारी हुऐ , दोनों ने अपनी आगामी संतान को ‘भूल की फूल’ मानकर सहज ही स्वीकार लिया। बस एक दिन हिदायत नहीं बरती गई और फिर...दोनों इशारों ही इशारों में एक दूसरे को देख हँस पड़े। कमलेश की आँखों में कुछ ऐसी चमक आई कि नियंता किसी लाजवंती सी स्वयं में सिमट गई। उसके होठों पर कमनीयता भरी मुस्कान तैर गई। एक नए बच्चे के यूँ शीघ्र और अप्रत्याशित रूप से आने के लिए अंततः दोनों ने अपना मानस तैयार कर लिया था। और फरवरी माह के अंतिम रविवार को जब कुन्नू पैदा हुआ तो कमलेश ने नियंता के मोटे-मोटे दूधिया गालों से अपने गेंहुऐ  गाल को सटाते हुऐ  और उसकी बाईं बाजू पर चिकोटी काटते हुऐ  कहा, ‘क्यों जी नीतू, तुम तो बड़ी फर्टाइल निकली’। कमलेश प्यार के क्षणों में नियंता को नीतू कहा करता था।

 

नियंता भी कहाँ चुप रहनेवाली थी, “सब तुम्हारा ही किया-धरा है जनाब। उस रात तुम न यूँ बेताब होते और न मुझे इतनी जल्दी फिर से..”। नियंता ने अपने बेटे की ओर निहारा। वह उसकी ओर टुकुर टुकुर देख रहा था। उसकी मोहक छवि पर वह अपना सबकुछ लुटाने को तैयार थी। अपनी ख़ुशी , अपना चैन, अपना स्वास्थ्य सब कुछ। अंदर की ममता रह-रहकर हिचकोलें मार रही थीं। वह अपने सारे कष्ट भूल चुकी थी। उसे स्वयं और कमलेश पर भरोसा था कि दोनों मिलकर संभाल लेंगे दोनों बच्चों को।

 

नियंता हँसते हुऐ  बोली, “चलो जो होता है, अच्छे के लिए होता है। दोनों बच्चों को एक-दूसरे की कंपनी मिल जाऐगी  । फिर एक साथ हँसते-खेलते दोनों पल भी जाऐंगे”।

 

कमलेश ने सहमति में सिर हिलाया और नियंता की बायीं जाँघ पर चिकोटी काटी और उसकी ओर देखकर शैतान अंदाज़ में अपनी आँख मारी।  

तभी नकली गुस्सा दिखाते हुऐ  नियंता ने कहा, ‘अरे हटो प्रोफेसर, ऐसे भी कोई चिकोटी काटता है क्या? देख रही हूँ, तुम दिनों-दिन कुछ ज्यादा ही रोमांटिक होते चले जा रहे हो। कॉलेज में कोई नई लड़की पटा ली है क्या!’

 

उसपर अबतक झुक पड़ा कमलेश गुस्से में उठकर कर एक किनारे खड़ा हो गया। तभी नियंता ने बेड पर लेटे लेटे ही उसकी दाईं बाजू पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा, ‘अरे वाह, वनस्पतियों का डॉक्टर बुरा भी ख़ूब मानता है। किसी लाजवंती की तरह लजाता भी है। भूमि परीक्षण करते करते अपनी पत्नी की उर्वरता पर भी नज़र रखता है’।

 

कमलेश के बाऐं कान को अपने दाँतों से काटती हुई वह धीरे से फुसफुसाई, ‘अरे प्रोफेसर, अपनी ताकत क्यों भूल जाते हो! कुछ बात तो शक्तिशाली नस्ल के बीज की भी होती है ना!’ कमलेश मुस्कुरा उठा।

 

‘यू नॉटी’, कमलेश के होंठ उसके होठों की बढ़ ही रहे थे कि बगल में लेटा कुन्नू कुनमुनाया। दोनों मियाँ बीवी अपने नवजात शिशु के साथ खेलने लगे।  

 

जच्चा और बच्चा दोनों ठीक थे। नार्मल डिलीवरी हुई थी। रविवार की उस दुपहरी दोनों देर तक अस्पताल के निजी वार्ड में प्यार और मनुहार की बातें करते रहे। यूँ दुबारा माता-पिता बनकर दोनों काफी ख़ुश थे।        

...................................................

 

कहते हैं कि अच्छा वक़्त   घड़ी के सेकंड की सुई की तरह तेज चलता है। देखते देखते उनकी गृहस्थी के पंद्रह साल बीत गऐ । दोनों बच्चे बड़े हो रहे थे। बेटी आठवीं में और बॆटा छठवीं मॆं आ गया था। सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था। नियंता ने अपना जीवन पूरी तरह अपने घर के नाम कर दिया था। अब डॉ. नियंता मुहल्ले की दूसरी स्त्रियों की तरह एक होममेकर थी। वह सफलतापूर्वक अपने घर को चला रही थी। अपना घर और अपनी गाड़ी भी बैंक से ऋण लेकर खरीदी जा चुकी थी। कमलेश के खाते से उनकी किश्तें समय पर चुकाई जा रही थीं। घर मॆ एक शख्स ही कमानेवाला था, सो नियंता को कुछ होशियारी और संयम से काम चलाना होता। वह अनावश्यक खरीददारी से बचती थी। मगर इन कुछेक सालों में कमलेश को सेल के ऑफर मॆं कुछ न कुछ खरीदने की आदत किसी छूत की बीमारी की तरह लगी थी। बाज़ार में तरह तरह के ऑफ़र आते और वह उनका शिकार हो जाता। इलेक्ट्रॉनिक सामानों का भूत उस पर अलग से चढ़ा हुआ था। डिजीटल कैमरा, हैंडीकैम, मोबाइल, लैपटॉप आदि। किसी की गुणवत्ता से संतुष्टि नहीं मिली तो दूसरी। घर में देखते देखते कई सारे मोबाइल और कैमरे हो गऐ थे। जूतों और कपड़ों की खरीददारी में भी यही स्थिति थी। कहीं घूमने जा रहे हैं, तो वहाँ से बैग भी लेते आ रहे हैं। दो कमरों के फ्लैट में आखिर जगह भी कितनी होती है! एक वार्डरोब में जहाँ माँ और बच्चों के कपड़े भली-भाँति रखे होते, वहीं कमलेश का अपना निजी वार्डरोब अकेले उसके लिए भी कम पड़ रहा था। ऐसा नहीं था कि कमलेश सिर्फ अपने लिए ही किसी भूत की तरह शॉपिंग करता, बल्कि सेल में या किसी दूसरे ऑफर में आभूषण, पत्नी और बच्चों के कपड़े, गेम कंसोल आदि होने पर उन्हॆं भी चट उठा लेता। नियंता, कमलेश की इस आदत से परेशान हो गई थी। क्रेडिट कार्ड से एक महीने बेशुमार की गई खरीददारी का असर उसके अगले महीने के बजट पर पड़ता। बच्चों की स्कूल फीस, दूधवाले का बकाया, बाई के मेहनताने और ऐसे ही दूसरे आवश्यक खर्चों के भुगतान अनियमित हो जाते। नियंता एक दिन झल्लाकर कमलेश से बोली,' अजी आपका क्या भरोसा! अगर सेल में पत्नियाँ मिलने लगीं,तो आप उन्हें भी न छोड़ें।और मुझे तर्क दें ,क्या करता नियंता! तीन पर एक फ्री मिल रही थीं'।

 

यह नियंता की हाज़िरजवाबी थी। उसकी अपनी कल्पनाशीलता थी। बनानेवाले ने उसे तीखे नाक-नक्श दिए थे तो तेज दिमाग भी दिया था। कमलेश कब से उसकी इस अदा पर फिदा था। वह मुस्कुराया और नियंता को बाँहों मे भरता हुआ बोला, “हाँ मेरी नीतू, मैं सचमुच ऐसा ही कुछ करूँगा”।

 

नियंता ने गुस्से में आँखें तरेरते हुऐ  उसे अपने से दूर कर दिया, “ तो जाओ ना! मेरे पास क्या कर रहे हो! अभी ले आओ! मैं भी तो देखूँ, कैसे नमूने लाते हो!”

 

कमलेश नियंता के पास वापस आया और उसकी पारदर्शी ग्रीवा को चूमते हुऐ  कहा, “ मुझे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। मुझे मेरा ऑफर पहले ही मिल गया है या कहो ऑफर से भी अधिक”।

 

“क्या मतलब?” नियंता ने अनजान बनते हुऐ  उससे पूछा।

 

“तुम्हे हासिल कर। तुमने अकेले मुझे चार स्त्रियों के बराबर प्यार किया है। तो एक पर तीन फ्री हो गई ना!” कमलेश दुबारा उसपर झुकने लगा।

 

“हटो बदमाश, दो दो बच्चों के पिता बन गऐ हो। मगर तुम्हारे भीतर का शैतान मानों दिनों-दिन जवान ही होता जा रहा है”।

 

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वक़्त गुजर रहा था। नियंता ने सचमुच कमलेश के अकेलेपन के मरुस्थल को अपने प्यार की नेह-वर्षा से पाट दिया था। उसके भीतर की प्यास को चार कुओं के पानी से तृप्त कर दिया था। नियंता को कई बार अपराध बोध घेर लेता। बच्चों और घर को सँभालते हुऐ  वह कई बार इतना डूब जाती कि कमलेश की ज़रूरतों का ध्यान नहीं रख पाती। ऐसे में जब भी मौका मिलता, वह उसे टूटकर प्यार करना चाहती थी। कमलेश तो किसी चिर प्यासे की मानिंद उसके रोम रोम को चूमता उसे दुनिया की सबसे हसीन औरत बना देता। वह अपनी किस्मत पर स्वयं भी इतराती। कमलेश ने कभी उसे अपने मायके की कमी महसूस न होने दी। मगर जब कभी थकान के मारे उसका शरीर जवाब देने लगता तो वह मन ही मन सोचती....वह कितनी बदकिस्मत है! उसके गृहस्थ जीवन में उसकी माँ और उसकी सास द्वारा उसके लिए कुछ किऐ  जाने का कोई सुख नहीं है। घर में दो-दो बच्चे आए मगर दोनों परिवारों में से किसी का भी दिल नहीं पिघला कि बच्चों को एक झलक भी देखें। यह तो उसका व्यवहार अच्छा था कि वह जहाँ रही उसके पड़ोसियो ने उसकी खूब मदद की। उसे देर सबेर किसी चीज की ज़रूरत हुई तो लोग-बाग बिन बुलाए हाज़िर मिलते। कमलेश का व्यवहार भी काफी मिलनसार किस्म का था। खैर बच्चे अब धीरे धीरे बड़े होने लगे थे। छोटे बच्चों को पालने और बड़ा करने संबंधी जो नाजुक दौर होते हैं, वे निकल चुके थे। मगर मन तो मन ही है। उसे रह रह कर इसका दुख सालने लगता कि उसे और उसके परिवार को उसके मायके और ससुराल पक्ष ने दूध में गिरी मक्खी की तरह अपने जीवन से निकाल फेंका है। मगर उसकी मजबूरी थी कि अपने मन की इस वेदना को वह कमलेश के सामने अभिव्यक्त नहीं कर सकती थी! वह जानती थी कि कमलेश जैसा संवेदनशील व्यक्ति इन परिस्थितियों से बमुश्किल लड़ रहा है। वह अपने अंदर के गरल को किसी समुद्र की भाँति ख़ुद  में जज्ब रखा करता था। नियंता उसे जानती थी। उससे ये सब बातें करने का मतलब उसे ख़ामख्वाह दुखी करना था। वह जानबुझकर इस विषय पर उसे छेड़ने से बचना चाहती थी। कमलेश ने भी हमेशा समझदारी का परिचय दिया। भूलकर भी इन मुद्दों पर कभी उसने नियंता से चर्चा नहीं की। और अब तो मानों उनके बगैर ही उन्हें जीने की आदत पड़ गई थी।

 

...............            

 

नियंता कई बार सोचती, इस क्रेडिट कार्ड ने कमलेश को बिगाड़ रखा है। हर महीने बजट से अधिक की खरीददारी। वह कमलेश के इस व्यवहार का विश्लेषण भी करती। कई बार सोचती...अपने घरवालों से अलग-थलग पड़ा कमलेश शायद अपने भीतर के निचाट अकेलेपन से लड़ने के लिए शॉपिंग-मॉल का इतना सहारा लेता है। आख़िर, वह उसके पति से पहले एक इंसान है। इधर बच्चों को पढ़ाते-लिखाते, खाना बनाते-खिलाते, घर के दूसरे कई कामों में वह इतना थक जाती कि कमलेश से ठीक से बातचीत भी नहीं कर पाती थी। बिस्तर पर जाते ही उसे नींद आ जाती। कमलेश उसे जगाने/गुदगुदाने की कोशिश करता तो किसी रात उसे उसकी मेहनत का फल मिल जाता तो किसी रात देवी प्रसन्न नहीं भी हो पाती। वह कमलेश के भीतर के हाहाकार को समझती थी, मगर मजबूर थी। उसे अपने से अधिक अपने घर की और दोनों बच्चों की चिंता थी। एक दिन कमलेश के भीतर बिखरते ज़ख़्म पर मरहम लगाते हुऐ  वह बोली, ‘देखो कमलेश, जैसे तुम अकेले हो, वैसे मै भी अकेली हूँ। मगर हम दोनों ने एक साथ चलने का निर्णय लिया और जब इसमें हमारे घरवाले हमारे साथ नहीं आए, तो क्या किया जा सकता है! आखिर हमॆं भी तो औरों की तरह ख़ुश रहने का हक़ है! अगर वे लोग हमॆं दूध में गिरे मक्खी की तरह निकाल बाहर कर चुके हैं, तो हम कबतक उन्हॆं अपनी छाती से लगाए घूम सकते हैं! वैसे भी अपने निजी दर्द से बाहर निकल हमें अपने बच्चों के भविष्य निर्माण की ओर ज़्यादा ध्यान देना चाहिऐ ’।

 

कमलेश बिना कुछ बोले अपनी पत्नी की बातें ध्यानपूर्वक सुनता रहा। वह बिल्कुल शांत भाव से एक शिशु की मांनिद नियंता की छाती से देर तक लिपटा रहा। वह उसके कहे एक-एक शब्द को बड़े गौर से सुन रहा था। उसे अंदर ही अंदर, पत्नी के रूप में नियंता को चुनने के अपने फैसले पर नाज़ हुआ और उसे अपने घरवालों की नियंता को पसंद न करने की ज़िद पर तरस आया। वह करुणा से भींग गया। वह देर तक नियंता की छाती से चिपटा रहा। अंदर का पुरुष कब जागृत हुआ, पता ही नहीं चला। उस रविवार, जब दोनों बच्चे नीचे पार्क मॆं खेल रहे थे, नियंता और कमलेश के प्यार की जुगलबंदी देर तक चलती रही। कमलेश ने नियंता से वादा किया, ‘अब मैं सेल की चकाचौंध मॆं कभी नहीं आउँगा’। नियंता ने सुधरे हुऐ  बच्चे को एक गरमा गरम पुरस्कार दिया।कमलेश के होठों पर एक सुदीर्घ चुंबन।

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तभी एक दिन कुछ ऐसा घटा जो नहीं घटना चाहिऐ  था। डॉक्टर को कुछ शक हुआ। नियंता की जाँच कराई गई। उसे स्तन कैंसर निकला। दिल्ली में बेहतर से बेहतर अस्पताल में कमलेश ने उसका इलाज शुरू कराया। पैसे को पैसा नहीं समझा उसने। पानी की तरह बहाया उसे। चिकित्सकों के लाख समझाने के बावजूद शुरू के कुछेक सप्ताह तक नियंता अपने स्तन-विच्छेद को टालती रही। समय तेजी से निकलता चला जा रहा था, मगर उसके भीतर की स्त्री मानों जानबूझकर उस विनाशकारी खतरे से बेपरवाह थी।

 

अपने बॆडरूम में दायीं करवट सोयी नियंता के पास उस शाम, कमलेश देर तक बैठा रहा। कोई आधे घंटे बाद जब उसकी नींद उचटी, तो नियंता ने अपने पति को एकटक अपनी ओर देखता पाया। ‘अरे, तुम कब आए कमलेश’ वह उठना चाह रही थी, मगर कमलेश ने उसे वापस लिटा दिया। वह उसके उभारों को देर तक दुलारता रहा। उनके भीतर की गाँठ से अबतक वह अवगत हो चुका था। मगर जितनी बड़ी गाँठ, उसके स्तन में थी, उससे भी अधिक बड़ी उसके मन में थी। कमलेश सोच रहा था, उसके शरीर की गाँठ को तो डॉक्टर निकाल लेंगे, मगर उसके मन के भीतर पैठी गाँठ का क्या होगा! उसका ऑपरेशन दुनिया का कौन सा डॉक्टर कर पाऐगा ! उसके लिए तो कोई सच्चा हमदर्द ही चाहिऐ , जो उलाहने के नश्तर से इस गाँठ को सतह दर सतह निकाल सके। कुछ इतने स्नेह और आहिस्ते से कि नियंता को इसके निकाले जाने तक का आभास न हो। कमलेश का प्रेमी, आज उसके पति पर हावी था। वह किसी भी कीमत पर नियंता को अपनी ज़िंदगी से दूर नहीं जाने देना चाहता था। उसे याद आया, किस तरह अपने दिल को मजबूत करके उसने नियंता को ‘प्रपोज’ किया था। कैसे लड़कों की गिद्ध दृष्टि से उसे बचा कर रखता था। दोनों ही परिवारों के विरोध के बावजूद दोनों ने प्यार की लंबी ‘कोर्टशीप’ के बाद शादी की थी। उसके जीवन में नियंता का इतना महत्व था कि वह उसके बगैर सचमुच स्वयं को असहाय और अधूरा समझता था। वह किसी भी कीमत पर उसे जाने नहीं दे सकता था। उसके जीवन में नियंता का वही महत्व था, जो किसी बेशकीमती हीरे का जौहरी के जीवन में होता है! जो किसी ‘मैग्नम ओपस’ (पुस्तक) का महत्व उसके लेखक के जीवन में होता है! अगर उस जौहरी के कब्ज़े से वह हीरा और उस लेखक के खाते से वह पुस्तक निकाल ली जाए, तो वे जीते जी मर जाएंगे। उनका आगे का जीवन तपते रेगिस्तान सरीखा हो जाऐगा । क्या, कमलेश नियंता के बगैर रह पाऐगा ! उसे याद आया...वह ऐसा ही कुछ तब सोचता था, जब तक उसने नियंता से अपने दिल की बात नहीं कही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि सबकुछ मानों कल की ही बात हो। किस तरह उसने लंबी दोस्ती के बाद उससे प्यार का इज़हार किया। उसके लंबे समय बाद उससे शादी की। और अब इतनी जल्दी वह उसे हमेशा हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर चली जाऐगी  ! वह किसके भरोसे अपना जीवन जीएगा! उसके दोनों बच्चों का क्या होगा! उसे लगा कि अपने विश्वविद्यालय के दिनों में जिस कैरम के खेल में वह जीत गया था, अब वही ‘क्विन’ उससे छिनी जा रही है! नियंता इधर बिस्तर पर लेटी थी और उसका मन-मस्तिष्क अतीत की यात्रा कर रहा था! सबकुछ उसके ज़ेहन में कल की ही बात की तरह एकदम तरोताज़ा था।

 

वह एक बार फिर से अपने कॉलेज के दिनों में चला गया था। बीएससी फाइनल इयर के वे दिन, जब उसकी और नियंता की दोस्ती कुछ परवान चढ़ने लगी थी।तब तक इन दोनों का प्यार एक-दूसरे के दिल में ही कहीं दबा हुआ था। कमलेश और नियंता एक-दूसरे को मन ही मन कॉलेज के प्रथम वर्ष से ही चाह रहे थे। मगर नियंता, कमलेश की ओर से पहल की अपेक्षा कर रही थी और उधर कमलेश का कस्बाई संस्कार, किसी लड़की को प्रपोज करने के ख्याल मात्र से ही वह पसीने पसीने हो आता था। मगर प्यार का जादू कुछ ऐसा होता है कि वह प्रेमी की आँखों से बयाँ हो जाता है। फर्स्ट इयर में झिझक से शुरू हुई बातचीत सेकंड इयर तक आते-आते ठीक-ठाक की दोस्ती में बदल गई थी। दोनों एक-दूसरे से नोट्स की अदला-बदली करने लगे थे, कॉलेज की कैंटीन में साथ-साथा कॉफी-समोसा का आनंद लेने लगे थे। कॉलेज के प्ले-ग्राउंड में जब-तब साथ-साथ टहलना हो जाता। मगर दोनों की जोड़ी, तब तक लवर्स क्लब में शामिल नहीं हुई थी। एकाधिक बार उनके दोस्तों ने इस बाबत उनसे पूछना चाहा, मगर दोनों इस सवाल को चुपचाप टाल गऐ।

 

उनकी इसी चुप्पी का परिणाम था कि उस दिन कमलेश के अपने ही दोस्त, सुरेंद्र सैनी ने उसकी प्रेमिका को चाहने की बात स्वयं उसी से कर रहा था। कमलेश की स्थिति कुछ ऐसी हो गई थी कि काटो तो ख़ून  नहीं। मगर वह सुरेंद्र को कोई करारा जवाब नहीं देना चाहता था। मगर चुप रहने से स्थिति और उलझ सकती थी। उसे लगा, कुछ घुमा-फिराकर सुरेंद्र को समझाया जा सकता है। प्रकटतः उसने अपने अंदर के तूफ़ान पर कुछ नियंत्रण रखते हुऐ  कहा, “ अरे नहीं सुरेंद्र, वह तुम्हारे टाईप की नहीं है। उसका पहले से ही कहीं अफेयर चल रहा है”।

 

सुरेंद्र ने अपनी बटन सी आँखों को थोड़ा फैलाते हुऐ  कमलेश की ओर देखा, “क्या कहते हो कमलेश!”

 

कमलेश को उसकी आँखों में दूर दूर तक भोंडापन नज़र आया। वह अंदर ही अंदर सोच रहा था, लोग भी कैसे कैसे सपने पाल लेते हैं! कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली! इन आँखों में बसाएगा नियंता जैसे गुलाब को! लोग भी कहाँ कहाँ से चले आते हैं! मगर अगले ही पल उसे लगा कि किसी की शारीरिक संरचना के आधार पर किसी को कमतर क्यों समझा जाए! उसने उसे आगे समझाना शुरू किया, “ सुनो सुरेंद्र, वैसे भी एकतरफा प्यार तो एक बंद गली ही है ना! वह आगे कहीं नहीं जाती है। आखिरकार उसका कोई भविष्य नहीं होता ना!”

 

मगर सुरेंद्र अभी इतनी जल्दी हार माननेवाला कहाँ था, “तुम तो उसके दोस्त हो ना कमलेश, तुम ही बताओ, उसका अफेयर किससे चल रहा है! कहीं तुम ही तो नहीं हो! क्या तुम्हारी रिलेशनशीप, दोस्ती से आगे की तो नहीं है!” सुरेंद्र ने कुछ विभत्स रूप से कमलेश को आँख मारी। उसे अंदर ही अंदर सुरेंद्र पर गुस्सा आया। क्या उसका दोस्त होकर सुरेंद्र उसे यही समझता है! मगर उसे लगा कि लड़का-लड़की के बीच के रिश्ते को लोग क्या इतने पाक-साफ रूप में ले सकते हैं! उसने मन ही मन निश्चय किया कि अब नियंता को अपने दिल की बात बता देने का समय आ गया है।      

 

इधर, सुरेंद्र की असली मंशा अभी बाहर आनी बाक़ी थी। बेबाक और बेपर्दा होकर उसके अंदर का वहशी पुरुष बाहर आया, “ अरे तुम शायद समझे नहीं कमलेश! नियंता जैसी पटाखा लड़की और तुम्हारे जैसा गबरू जवान! अगर तुम्हारी जगह मैं होता तो अबतक ‘वन टू का फोर’....” आगे की बात उसने अपने इशारों से पूरी कर दी।

 

कमलेश की सहनशक्ति जवाब दे रही थी। उसकी आँखों में गुस्सा उबलने लगा. “हरेक को एक ही तराजू में तौलना छोड़ दो सुरेंद्र। सब धन बाईस पसेरी नहीं होता। यह मुहावरा तो सुन रखा होगा ना! हम दोस्त हैं। हम ऐसी मर्यादा में रहें कि अपनी दोस्ती बनी रहे”।

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इस घटना के बाद कमलेश, हर समय किसी न किसी उलझन में रहता। उसे हरदम लगता कि अगर अब नियंता से वह अपने दिल की बात नहीं कहेगा, तो शायद कभी नहीं कह पाऐगा । दोनों अब कॉलेज से निकलकर विश्वविद्यालय में आ गऐ थे। एमएससी प्रथम वर्ष में। कॉलेज का प्ले-ग्राउंड कहीं पीछे छूट गया था।दोनों को साथ-साथ रहने के लिए अब दोस्ती पर्याप्त नही होगी। दोनों का दायरा बढ़ रहा है। सुरेंद्र जैसे कितने लंपट लड़के,उसके जीवन में अपनी बदनीयती के साथ प्रवेश करना चाहेंगे! उसे अपने दिल की बात कह देनी चाहिऐ । फिर उसके भीतर बैठे संशय ने उससे सवाल किया…कहीं वह मना कर बैठी तो! मगर उसके प्रेमी ने उसके भय को बरज दिया...नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा। वह भी उसे दिल ही दिल में चाहती है। बस, आगे बढ़कर वह कह नहीं रह रही है।  

 

फिर कुछ ऐसा हुआ कि एमएससी प्रथम वर्ष के सभी विद्यार्थी पिकनिक पर ‘दमदम लेक’ घूमने सोहना, गुड़गाँव जा रहे। कमलेश सोच रहा था कि अगर वह पिकनिक की इस यात्रा में नहीं कह पाऐगा , तो शायद कभी नहीं कह पाऐगा । बात की शुरूआत कैसे की जाए....वह इसपर मन ही मन कई तरह के संवाद तैयार कर चुका था। मगर कुछ भी उसे अंतिम रूप से स्वीकृत नहीं हो रहा था। आखिर परिस्थितियाँ भी कोई चीज होती हैं। उद्विग्न और हड़बड़ी भरे मन से वह सुबह नाश्ता किऐ  बगैर ही साईंस फैकल्टी में बस के लिए निर्धारित हुई जगह पर पहुँच गया। हल्के लाल रंग की हैट लगाए नियंता मानों उसका ही इंतेज़ार  कर रही थी। वह उसका हाथ पकड़ कर बस के अंदर अपनी सीट के बगल में ले गई, ”तुम यहाँ बैठोगे कमलेश। मेरे पास”। फिर उसकी आँखों में झाँकते हुऐ  देर तक उतरती रही। उसकी आँखों में शरारत के बादल मंडरा रहे थे। कमलेश उन बादलों में खो गया था। “अरे तुम्हारे होंठ सूख क्यों रहे हैं, सुबह से कुछ खाया है या नहीं!”

 

कमलेश ने हलका सा मुस्कुराते हुऐ  ‘ना’ में सिर हिला दिया।

 

और फिर बिना कोई देर किऐ  उसने अपने बड़े से पर्स को खोलकर बेहतर तरीके से पैक किऐ  सैंडवीच के दो पैकेट निकाले। एक उसके लिए और एक स्वयं अपने लिए। दोनों चुपचाप खाने लगे। अभी कुछ देर की चहल-पहल अचानक से खाने की हलकी आवाज़ में बदल जाती है। इस बार कमलेश ने ही पहल की, “और सुनाओ नियंता, इन दिनों और क्या कर रही हो?”

 

नियंता कुछ कातिलाना अंदाज़ में मुस्कुराई, “नियंता इन दिनों कमलेश के साथ सैंडविच खा रही है”।

 

बोलते हुऐ  सैंडविच का क्रीम उसके निचले होंठ के दायीं कोर में थोड़ा नीचे की ओर गिर गया था। कमलेश ने उसे अपनी उँगलियों से पोंछ दिया। इतने भर से नियंता के होंठ कुछ और लाल हो गऐ। और कमलेश गुलाब की उन पंखुड़ियों को छूकर कुछ मदहोश सा हो गया। अभी बस में इक्का दुक्का लोग ही बैठे थे। नियंता ने अपने दाँऐ  हाथ से कमलेश के हाथ को भरपूर स्नेह से दबाया और उसका सिर, धीरे से कमलेश के बाँऐं कंधे की ओर लुढ़क गऐ। कमलेश इससे पहले नियंता के निकट इस तरह नहीं बैठा था।

 

पहले से तैयार किऐ  गऐ अपने सभी संवाद वह भूल चुका था। उसने धीरे से कहा, “नियंता, मैं तुम्हारे साथ यूँ जीवन भर ऐसे ही सैंडविच खाता रहना चाहता हूँ”। कमलेश की आँखों में नियंता के लिए सातों सागर का प्यार हिलोरें ले रहा था। वह देर तक कमलेश की आँखों में डूबती-उतराती रही। फिर उसने अपनी पलकें बंद कर ली। कमलेश का प्यार स्वीकृत हो चुका था। दोनों की हथेलियाँ रास्ते भर एक-दूसरे के बढ़ते रक्तचाप का अंदाज़ा लगाती रहीं और इस कोशिश में दोनों के रक्तचाप और बढ़ते रहे। पिकनिक की कौन कहे, पिकनिक की शुरूआत में ही कमलेश का प्यार स्वीकृत हो चुका था।                    

                

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कमलेश अतीत की रंगीन दुनिया से वापस हकीकत की दुनिया में आ चुका था। संजीदा स्वर मॆं नियंता से कहने लगा, ‘ऐसे कैसे चलेगा नियंता, चिकित्सकों की बात तुम मान क्यों नहीं जाती!’  

 

नियंता की आँखों की कोर मॆं आँसू आ गऐ। वह देर तक कमलेश की सूखी आँखों में तैरती रही और फिर धीरे से कहा, ‘मैं तुमसे ही पूछती हूँ, अगर मैं मान जाती हूँ तो फिर तुम्हारा काम कैसे चलेगा कमलेश! तुम इन्हें इतना दुलार जो करते हो। एमएससी के दिनों से ही इन्हें गुलाब कहते आए हो। बताओ कमलेश, क्या इन गुलाबों के बगैर तुम पहले की तरह मुझे प्यार कर पाओगे!’ आगे कुछ और कहती, वह सहसा फफक पड़ी। उसके आँसुओं को अपनी उंगलियों से पोंछते हुऐ  उस शाम कमलेश ने उसे देर तक दुलारा और समझाया। अंत में नियंता को मानना पड़ा। कमलेश ने हँसते हुऐ  कहा, ‘धत पागल लड़की, तुम्हें शादी के लिए राजी करने मॆं भी मुझे इतनी मेहनत नहीं लगी थी। तुम भी हद करती हो नीतू’।  

 

अगले दिन उसके दोनों स्तन बीमार अंगों की तरह शरीर से अलग कर दिए गऐ। कीमोग्राफी समेत कैंसर के दूसरे उपचार किऐ  जा रहे थे। कमलेश को लगा कि शायद अब वह अपनी नीतू को बचा ले जाऐगा । वह काफी ख़ुश था। एक दिन अपने दोनों बच्चों से कहने लगा, ‘तुम लोग चिंता मत करो। वह सिर्फ तुम्हारी मम्मी नहीं, मेरी प्रेमिका और मेरी नियती भी है। उसके बगैर मैं कैसे ज़िंदा रहूँगा!’

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मगर नियंता के स्वास्थ्य के साथ नियति की आँख-मिचौली जारी थी। कैंसर के ज़रा कठिन ईलाज़ के ‘साइड इफेक्ट’ अपना काम कर रहे थे। उसे दिन में दो-चार बार, उल्टी करने का सा मन होता। मगर, जबतक उसका अशक्त शरीर, वॉश बेसिन तक पहुँचता, अंदर का उतावला तरल, अंदर ही कहीं अटक कर रह जाता। वह उल्टी करना चाहती और उल्टी होती नहीं। घर में जब कमलेश होता, उसे अकेले बिस्तर से उठने नहीं देता। मगर जब वह नहीं होता, तो नियंता बात-बात में अपने बच्चों को तंग करना नहीं चाहती थी। इस चक्कर में एक बार वह वॉश बेसिन पर बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ी। कलाई के कड़े की, चीनी मिट्टी पर गिरनेवाली आवाज़ से अपने ‘स्टडी’ से भागी-भागी कम्मो बाहर आई। किसी तरह, उसे सँभालकर बिस्तर तक ले गई। नियंता का सुंदर शरीर मानों बीते दिनों के अलबम में कहीं बचा रह गया था। कुछेक महीनों में वह सूखकर काँटा हो गई थी। उसके अंदर से जिजीविषा मरती जा रही थी। कैंसर से लड़ने के लिए, जिस आत्मशक्ति की आवश्यकता थी, वही, बदली के मौसम में छीजती धूप की तरह दिन के बढ़ने के साथ अपनी असर और चमक खोती जा रही थी। जिस सच से कमलेश भागता था, डॉक्टर ने उसे उस सच से दो चार कराया, ‘कमलेश, कैंसर के डायगनोस होने और फिर उसकी छाती के ऑपरेशन होने मॆं कुछ ज्यादा वक़्त   लग गया। इनका कैंसर अब पूरे शरीर में फैल चुका है। अब जो है, ऊपरवाले के ही हाथ मॆं है”।

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नियंता को गुजरे कोई छह महीने हो चुके थे। कमलेश के घर की रौशनी चली गई थी। कमलेश और उसके दोनों बच्चे मानों अनाथ हो गऐ थे। कमलेश को पसंद नहीं था, मगर उसके घर और ससुराल के लोगों ने आपसी वैमनस्य को भुलाकर उसके दोनों बच्चों को संभालना शुरू किया। वह सोचता... जीते जी इन दोनों परिवारों ने जब नियंता को तलछट पर पड़ी किसी मछली सरीखा छोड़ दिया तो अब क्यों आए हैं यहाँ! मैं इनके बगैर भी नियंता की इन दो निशानियों को पाल सकता हूँ। मैं स्वयं ही इन्हें पिता और माता दोनों का प्यार दूँगा। मुझे किसी और के सहारे या सहानुभूति की कोई ज़रूरत नहीं है।मगर प्रकटतः वह कुछ बोल नहीं पाता। दोनों तरफ से उसके अपने परिवार के ही लोग थे। अगर नियंता आज ज़िंदा होती तो क्या वे लोग इस तरह अपने वैमनस्य भुलाकर यूँ साथ रह रहे होते! तो क्या दोनों परिवारों की एकता के लिए नियंता ने अपनी जान की बली दी है! क्या नियंता की जान इतनी सस्ती है! क्या उसके घरवाले और ससुराल वाले उसके यूँ मर जाने का इंतेज़ार  कर रहे थे! क्या इन दोनों परिवारों के अहं का आकाश सचमुच इतना ऊँचा था कि वहाँ तक पहुँचना नियंता के लिए जीते जी संभव नहीं था और उसे वहाँ तक जाने के लिए एक सितारा बनना पड़ा! कमलेश अंदर ही अंदर उबल पड़ता। उसकी मुट्ठी तन जाती। क्रोध में उसकी पेशानी पर पसीने चुहचुहा आते। वह क्रोध में घर से बाहर निकल आता। उसके दोनों जबड़े आपस में कस जाते। वह आकाश की ओर देखने लगता। उसे लगता...ऊपर से उसे कोई समझा रहा है। वह उन सितारों में सबसे अधिक चमकते सितारे की ओर देखता। वह मानों उसे ही देख रहा होता। उसे यकीन था कि आकाश का सबसे चमकता सितारा, हो न हो नियंता ही है। फिर वह शांत भाव से वापस अपने घर में आ जाता। किसी से कुछ नहीं बोलता। अपने कमरे में चला जाता। घंटों नियंता की तस्वीरों के सामने खड़ा होकर जाने क्या क्या बड़बड़ा रहा होता! उसकी सास और उसकी माँ दोनों उसके इस मनोभाव को समझ रही थीं। उसके गुस्से को देखते हुऐ  उसे खाना भी कभी उसका बेटा तो कभी उसकी बेटी परोसती। वह अपने दोनों बच्चों की खातिर किसी तरह थाली में परोसे खाने को समाप्त कर लेता। उसके पिता और ससुर को स्वयं अपने किऐ  पर पछतावा था। मगर... “अब पछताऐ  होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत” !

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ज़िंदगी का नाम ही है आगे बढ़ना। चरैवेति, चरैवेति। उस रात जब कमलेश अपने बच्चों के बैग समॆट रहा था, कम्मो की डायरी नीचे गिर पड़ी। जब उसने उसके भीतर देखा तो उसके होश उड़ गऐ। स्कूल-डायरी पर दो बार से लगातार लिखा हुआ आ रहा था। इसके बाद उसने बेटे की डायरी देखी। वहाँ भी यही कहानी। दोनों बच्चों के जूते और बैग अपनी अंतिम साँसें गिन रहे थे। बच्चे भी इतने ज़हीन थे कि अपने पापा को इस बाबत कुछ नहीं बताया और स्कूल में डाँट सुनते रहे। उसे स्वयं पर बड़ा गुस्सा आया। क्या नियंता के रहते ऐसी लापरवाही संभव थी! उसे लगा कि वह नियंता के वियोग में अपने बच्चों के साथ नाइंसाफ़ी कर रहा है। क्या इससे नियंता  की आत्मा को शांति मिलेगी! कमलेश ने निर्णय लिया, चाहे कुछ हो जाए, वह अपने आप को संभालेगा और अपने बच्चों को उनकी माँ के हिस्से का प्यार और देखभाल देगा।    

 

उस शाम कमलेश कॉलेज से जल्दी घर आया। फिर दोनों बच्चों को उनकी पसंद के मॉल में ले गया। उनके स्कूल बैग और जूते खरीदने के बहाने आज कमलेश कोई छह महीने बाद शहर के चर्चित ‘एक्सिस मॉल’ में आया था। यह पहला मौका था, जब वह अरसे बाद बिना सेल या ऑफर की खरीददारी करने आया था। उसे अपनी महरूम पत्नी की हिदायतें याद हो आईं। खट्टी-मीठी यादों के झोंके से उसकी आँखों मॆं नमी और उसके होठों पर एक हल्की सी मुस्कराहट तैर गई। उसके दोनों बच्चों ने अपने पिता की स्थिति को समझा और उससे लिपट पड़े। बेटी कम्मो कह रहा थी,'कोई बात नहीं पापा। मम्मी ऊपर से सब देख रही है। आप हम दोनों भाई बहनों को कितना प्यार करते हो!'

 

छोटा बेटा कुन्नू भी कहाँ चुप रहने वाला था, “अब तो आप मॉल भी नहीं आते पापा। आज इतने समय बाद यहाँ आए हो तो हमारे लिए कुछ खरीदने”।

 

पेमेंट काउंटर पर बिल चुकाने के लिए कमलेश ने अपना पर्स निकाला। पर्स में नियंता की फोटो रखी थी। नियंता अपनी बड़ी बड़ी आँखों से उसे निहार रही थी। उसकी आँखों में कमलेश के लिए अथाह प्यार और सम्मान था। कमलेश की आँखों में स्मृतियों का बादल उतर आया।

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गाँठ शरीर और मन की...

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