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रफ ड्राफ्ट
रफ ड्राफ्ट
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© Ish Madhu Talwar

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शशांक आज तीन दिन की दिल्ली यात्रा के बाद घर लौट रहा था। इस दौरान उसे रजनी की बेहद याद आती रही। आज तो जब हिचकी आई तो उसे लगा, केवल वही रजनी को याद नहीं कर रहा, बल्कि रजनी भी शायद उसे याद कर रही है-किसी अंधेरे कोने में बैठी, उदास और गुमसुम। जैसे वह कह रही हो-‘इतने दिन हो गए, तुम आते क्यों नहीं? जल्दी आओ, मुझे तुमसे बातें करनी हैं।’

शशांक ने बस की खिड़की के बाहर झांका। बाहर तेज, चिलचिलाती धूप पड़ रही थी। दूर तक खेत ही खेत और गांव नजर आते थे। उसने पर्दे खिसका कर खिडकी को ढंक दिया। मोबाइल में समय देखा और अंदाज लगाया-अभी जयपुर पहुंचने में कम से कम तीन घंटे लगेंगे। उसने बस की पुश सीट पर अपनी गर्दन टिका कर आंखें बंद कर लीं और रजनी के बारे में सोचने लगा।

अच्छा नहीं हुआ रजनी के साथ। गैंग रेप हुआ। वहशियाना हमला किया गया। चेहरे को नोंचा गया। जिस्म पर जगह-जगह चोट के निशान दरिंदगी की कहानी कह रहे थे। दुष्कर्म के बाद उसे सड़क किनारे फेंक दिया गया था। रजनी किसी तरह बच गई थी। अब अस्पताल में भर्ती थी, जहां उसका इलाज चल रहा था। शशांक को याद आया, कैसे जब अस्पताल में उसके घावों की ड्रैसिंग की जा रही थी तो बाहर तक उसकी चीखों की आवाज़ आ रही थी। तब शशांक को लग रहा था जैसे चाकू से जिस्म की त्वचा खुरची जा रही हो। चीख की आवाज सुनते ही शशांक भीतर तक हिल जाता था। उसे लगता जैसे कोई चाकू से उसी के शरीर को छील रहा हो। दर्द रजनी को हो रहा था, लेकिन उसकी आवाजें सुन कर शशांक कराह उठता था। शशांक दर्द से ऐसे तड़प उठता था, जैसे रजनी का नहीं, उसका खुद का शरीर छीला जा रहा हो। जैसे बसूले से लकड़ी छीली जाती है।

रजनी के दर्द में वह बहुत देर तक डूबता, उतराता रहा और फिर पता नहीं कब उसकी आंख लग गई।

 

घर पहुंच कर शशांक ने चाय पीने के बाद सबसे पहला काम यह किया कि वह अपने स्टडी रूम में आ कर बैठ गया। उसने अपने उपन्यास ‘रात का अंधेरा’ का रफ ड्राफ्ट निकाला और पन्ने पलटने लगा। पेज नं. 40 पर आ कर रुक गया। इसी पेज पर रजनी अस्पताल के पलंग पर लेटी थी। पृष्ठ में से झांकता हुआ उसे रजनी का मासूम चेहरा दिखाई दिया। उसे अचानक जैसे रजनी की आवाज़ आई-‘आ गए?’

‘हां, आ गया।’

‘बहुत दिन लगा दिए। मैं आपको याद कर रही थी।’

‘हां, समय लग गया। बोलो, क्यों याद कर रही थीं?’

‘आपने मेरे साथ अच्छा नहीं किया।’

‘कैसे?’

‘एक तो आपने मेरे साथ दुष्कर्म करा दिया, ऊपर से आप एक लड़की को एक्‍सपोज कर इस घटना को अब पूरे समाज को बताना चाहते हो। क्या ऐसा कर के आप दुष्कर्म नहीं कर रहे।’

‘इसीलिए मैंने नकली नाम रखा है- रजनी। फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि तुम्हारे साथ दुष्कर्म हुआ?’

‘मर्द के लिए नाम कोई मायने नहीं रखता उसके लिए स्त्री होना काफी है। आपने रजनी नाम रख कर देश की सभी रजनियों की जिंदगी में रात का अंधकार भर दिया है। अब हर रजनी को लोग आपके उपन्यास की नजरों से देखेंगे। खा जाने वाली नजरों से।’

‘मैं उपन्यास में लिख दूंगा कि सभी पात्र काल्पनिक हैं।’

‘ऐसा लिखने से मर्द जात कल्पना करना नहीं छोड़ देगी। उसको तो पर्दे के पीछे बैठी औरत की चूड़ियों की आवाज से ही स्त्री गंध आ जाती है और उसके नथुने फड़कने लगते हैं। रजनी नाम रख देने से क्या पुरुष औरतों को अच्छी नजरों से देखना शुरू कर देंगे?’

‘तुम चाहती क्या हो? मैं कोई दूसरा नाम रख देता हूं।’

‘उससे क्या होगा? आप जो भी नाम रखेंगे, उस नाम को कलंकित ही करेंगे। लोग अपने घरों में वह नाम रखना ही बंद कर देंगे।’

शशांक जब रजनी से बात कर रहा था तो अचानक उसे चिड़िया की चीं-चीं सुनाई दी। उसने रजनी से कहा-‘रुको, मैं थोड़ी देर में आता हूं। एक चिड़िया परेशान कर रही है।’ उसने रफ ड्राफ्ट के पन्ने पलटने शुरू किए। पेज नं. 51 पर चिड़िया बैठी हुई मिल गई।

शशांक ने कहा-‘बोलो चिड़िया रानी, क्या तकलीफ है?’

‘आपने मुझे भूखी मार दिया।’

‘कैसे?’

‘जेठ की ऐसी तपती दोपहरी में आपने मुझे बाजरे के सिट्टे पर बैठा दिया। जेठ में भी कहीं बाजरा होता है क्या?’

‘ओफ्फ! सही कहा। चलो, मौसम बदल देते हैं। जेठ की जगह कार्तिक कर देते हैं। लेकिन नहीं बदलेंगे। तुम्हें बैठना पड़ेगा बाजरे के सिट्टे पर ही, क्योंकि इस कहानी में आगे जा कर बाजरा कुछ गुल खिलाएगा।’

‘ठीक है, तो मुझे कार्तिक में ले चलो। अपना पेट तो भर लूंगी। जेठ की गर्मी में यहां बैठी-बैठी क्या करूंगी?’

‘चलिए, बदल दिया मौसम। अब आप कार्तिक में आ गई हैं। खूब अपने पंख फड़फड़ाइए। उड़िए। बाजरे के खेत में भरपूर भोजन का लुत्फ उठाइए।’

इसी बीच शशांक को रजनी की आवाज सुनाई दी-‘कहां चले गए?’ रजनी की आवाज में दर्द था। रजनी की आवाज सुनकर शशांक का दिल भी पिघलने लगता था। अस्पताल के बिस्तर पर तड़पती रजनी की पीड़ा उससे देखी नहीं जाती थी। वह दौड़ कर वापस उसी पर आ गया। उसने रजनी से कहा-‘हां, तो बात तुम्हारे नाम पर चल रही थी। ऐसा करता हूं, तुम्हारा नाम निर्भया रख देता हूं।’

‘तुम फिर छलावा कर रहे हो’

‘कैसा छलावा?’

‘किसी जमाने में स्त्री को देवी कह कर छला गया। अब तुम उसे निर्भया कह कर छलना चाहते हो।’

‘इसमें छलने की क्या बात है?’

‘पहले पुरुष ने स्त्री को देवी कह कर खूब शेखी बघारी कि हमारे समाज में स्त्री का दर्जा देवी का है और हमारे यहां महिलाओं की इज्जत होती हैं, लेकिन उसे कभी इज्जत नहीं दी गई। कहने को देवी थी, लेकिन उसे कभी देवी नहीं माना गया और पैर की जूती बना कर रखा गया। अब निर्भया नाम रख कर महिलाओं की पीठ ठोकी जा रही है कि तुम निर्भय हो। लेकिन जमीन पर हकीकत क्या है? क्या सचमुच स्त्री आज निर्भय है? यह सब इमोशनल ब्लैक मेलिंग है।’

‘फिर मैं ऐसा करता हूं, किसी झंझट में नहीं पड़ता। मैं किसी विदेशी महिला का नाम रख देता हूं। पात्र बदलने में मुझे कितनी देर लगती है? तुम्हें विदेशी पर्यटक बना देता हूं। विदेशी पर्यटकों के साथ भी भारत में यह सब खूब होता है।’

 

‘क्या विदेशी महिला की कोई अस्मिता नहीं होती? महिला किसी भी देश की हो, इससे क्या फर्क पड़ता है? क्या देश, धर्म और जाति से महिला की अस्मिता को छोटा-बड़ा किया जा सकता है?’

इस बीच शशांक को एक लड़के और लड़की की बारी-बारी से आवाज आने लगी-‘इधर आइये, इधर आइये।’ वह परेशान हो उठा। उसने रजनी से कहा-‘सॉरी, प्लीज जस्ट वेट। अभी आता हूं।’ 

इसके साथ ही शशांक तेज गति से पन्ने पलटने लगा। अंगुलियां एक के बाद एक पन्ने पर सरपट दौड़ रही थीं। वह एक जगह आ कर रूका जहां लड़का और लड़की खड़े थे-एक नदी के किनारे।

लड़की की आवाज़ आई-‘यह आपने क्या किया?’

‘क्या कर दिया?’

‘आपने हमें ये कहां नदी के किनारे मिलवा दिया। आजकल कहीं नदी दिखती है क्या? सारी नदियां तो सूख गई हैं। आपका वो पुराना जमाना भी कब का सूख चुका है, जिसमें नायक-नायिका नदी किनारे मिला करते थे।’

‘तो तुम कहां मिलना चाहते हो?’

‘आजकल तो लड़के-लड़की मॉल में मिलते हैं। सीसीडी (कैफे कॉफी डे) में मिलते हैं।’

‘तो चलो, तुमको वहां मिलवा देता हूं। ये लीजिए, आप दोनों को मैंने सीसीडी की एक शांत टेबल पर ला कर बैठा दिया है। यहां आराम से कोल्ड कॉफी पीजिए, बर्गर खाइये और प्यार-मौहब्बत की बातें कीजिए।’

‘तो हमारे नाम क्या राम प्यारी और मोहन लाल ही रहेंगे? सीसीडी में ऐसे नाम वाले नहीं आते।’

‘चलिए, नाम परिवर्तन कर देते हैं। रामप्यारी का नाम हो गया रामिया और मोहन लाल का नाम हो गया मैक मोहन। ठीक है?’

‘अच्छा, एक बात और बताइये।’-रामिया ने कहा- ‘आपने मेरी साड़ी की इतनी तारीफ कर दी है, मैं क्या साडी पहन कर सीसीडी जाऊंगी? शादी के वक्त चाहो तो बेशक साड़ी पहना देना।’

‘नहीं, शादी तो मुझे तुम्हारी करानी नहीं है।’

‘क्यों नहीं करानी?’ इस बार मैक मोहन बोला।

‘अरे यार, तुम समझते नहीं हो। तुम्हारी शादी करा दूंगा तो कहानी का तनाव खत्म हो जाएगा। पाठक के दिमाग में तनाव बनाए रखना जरूरी है। तनाव खत्म हुआ तो वह कहानी उठा कर एक तरफ फेंक देगा।’

रामिया ने दृढ़ता से कहा-“लेकिन, मैं साड़ी पहन कर तो सीसीडी नहीं जाऊंगी। मैं कोई टीचर हूं क्या जो नौकरी पर जा रही हूं किसी स्कूल में।”

“हां, इसमें मुझे कोई दिक्कत नहीं है। आप मजे से जीन्स और टॉप पहन कर जाइये।”

अचानक बातचीत में खलल पड़ा। एक मकान की छत से आवाज आ रही थी-‘अरे, लेखक महोदय, यहां क्यों ले आए मुझे?’

शशांक ने फिर पन्नों पर सरपट दौड़ना शुरू किया और वह तलाश करता हुआ उस छत्त तक पहुंच गया, जहां मोना खड़ी थी। वह यहां आ कर रूक गया।

मोना ने कहा-‘मुझे यहां छत्त पर क्यों ले आए? कपड़ों की बाल्टी उठाने से मेरा सारा बदन दुख रहा है।’

‘मोना डार्लिंग, आपको यहां छत्त पर कपड़े सुखाने हैं। फिर पास वाली छत्त पर एक युवक से आपकी आंखें लडेंगी और प्यार की एक नई कहानी शुरू होगी।’

‘आप बहुत बड़े लेखक होंगे। मैंने भी बहुत किताबें पढ़ी हैं। क्या इस नए दौर में भी हसरत मोहानी का जमाना चल रहा है, जो छत्त पर कपड़े सुखाने वाली से प्यार हो जाएगा?’

‘क्या मतलब?’

‘हसरत मोहानी के गली बल्‍ली मारान वाले मकान के पड़ौस में ऐसे ही तो एक लड़की छत्त पर कपड़े सुखाने आया करती थी, जिसके लिए उन्होंने लिखा है- ‘वो तेरे कोठे पे नंगे पांव आना याद है, चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है।’ उन्होंने यह गज़ल 1931 में लिखी थी। आप आज इक्कीसवीं सदी में छत्त वाली वैसी ही प्रेम कहानी को दोहराना चाहते हैं। अब तो उसे नीचे जमीन पर उतार कर लाइए हुजूर।’

‘छत्त पर प्यार आज भी हो सकता है। इसमें दिक्कत कहां है?’

‘दिक्कत यह है कि आपने मुझे उपन्यास में एक पढ़ी-लिखी लड़की बताया है। फिर मैं छत्त पर कपड़े सुखाने क्यों जाऊंगी? मेरी बाई यह काम करेगी।’

‘तो मैं तुम्हें काम वाली बना देता हूं। इसमें क्या दिक्कत है? पात्र ही तो बदलना है। फिल्मों में ऐसा होता ही रहता है। हीरो-हीरोइन के साथ नौकर-नौकरानी का प्रेम प्रसंग भी समानान्तर चलता रहता है।’

‘आप मेरा ऐसा डिमोशन करेंगे? मैं इसे कतई बर्दाश्त नहीं करूंगी।’

‘क्यों बर्दाश्त नहीं करोगी? तुम एक पात्र ही तो हो। मैं जो चाहूं, वो भूमिका तुम्हें दे सकता हूं। तुम्हें क्यों एतराज होना चाहिए?’

‘बिलकुल ऐतराज है। अब आप ऐसा नहीं कर सकते। आपने मुझे अब तक जैसा गढ़ा है और लगातार विकसित करते हुए जैसी मेरी रचना की है, उसमें अब पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं है। आपको मुझे अब आगे ही ले जाना पड़ेगा। मेरी भूमिका पर फिर से सोचना पड़ेगा। तुम्हें छत्त वाले लड़के से मेरी आंखें लड़वानी हैं तो यह काम किसी अच्छे रेस्तरां में कराओ।’

इस बीच शशांक को लगातार रजनी की आवाज सुनाई दे रही थी। उसने झल्लाते हुए मोना से कहा-‘मैं उधर से उधर भागते हुए थक गया हूं। तुम पर अब बाद में सोचूंगा। फिलहाल इस मामले को पेन्डिंग रखते हैं। अभी मुझे रजनी बुला रही है।’

रफ ड्राफ्ट के पन्नों पर रजनी की ओर दौड़ते हुए शशांक रास्ते में एक जगह रुक गया। अस्पताल के बाहर टीवी चैनल वालों की भीड़ जुटी थी। रिपोर्टर अपने-अपने चैनल के लोगो वाले बूम हाथ में लिए इधर से उधर घूम रहे थे। बाहर ओबी वेन्स की लाइन लगी हुई थी। एक सैनिक की तरह सब मोर्चा संभाले हुए थे। कब रजनी बाहर निकले और कब ये रिपोर्टर बूम को बंदूक की तरह तान कर हमला बोलें, सब को जैसे इसी बात का इन्तज़ार था।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्टार रिपोर्टर कहे जाने वाले विश्वास कुमार की अचानक आवाज आई-‘हम कितने दिन से यहां खड़े हैं। हमें रजनी की एक बाइट दिला दीजिए ना।’

‘रजनी अभी बाइट देने की स्थिति में नहीं है। फिर इतनी भीड़ में वह आएगी तो सब कौवे के तरह उस पर टूट कर पडेंगे।’

‘अरे सर, हमें अलग से, चुपके से अंदर ले चलिए ना। किसी को पता भी नहीं चलेगा और हम उसकी बाइट ले आएंगे।’

‘मुझे पता है, फिर आप स्क्रीन पर एक्सक्लुसिव का टैग लगाएंगे। दहाड़-दहाड़ कर कहेंगे-ये तस्वीरें केवल हमारा चैनल आप तक पहुंचा रहा है।’

‘जी ये तो होगा ही, लेकिन रजनी की आवाज भी तो हम पूरे देश तक पहुंचाएंगे। आप यह क्यों नहीं सोचते कि रजनी की आवाज घर-घर पहुंचेगी।’

‘क्या आवाज पहुंचेगी, मुझे मालूम है।’

‘क्या मालूम है?’

‘आप उससे यही तो पूछेंगे न कि अब आप कैसा महसूस कर रही हो?’

‘हां, यह तो पूछेंगे ही।’

‘किसी अभागी महिला के साथ बलात्कार हुआ है और आप उससे पूछोगे कि कैसा महसूस कर रही हो? यह कोई सवाल है?’

“आप जैसा कहो, वैसा पूछ लेंगे। एक बार बाइट तो दिलाओ।” शशांक को इस स्टार रिपोर्टर के दिमाग में टीआरपी की भूख के चूहे कूदते हुए साफ नजर आ रहे थे।

शशांक ने सोचा, क्या यहां रजनी को टीवी चैनल वालों से रू-ब-रू कराना ठीक रहेगा? फिर उसे लगा, नहीं। यहां टीआरपी का भूत फिर रजनी के साथ एक नया दुष्कर्म शुरू कर देगा। यह अलग ढंग का दुष्कर्म होगा।

इसी स्थान पर अस्पताल के बाहर कुछ पुलिस वाले भी खड़े थे। निर्जीव बुत की तरह। शशांक अंदर से उबल रहा था। जब रजनी के साथ हादसा हुआ, तब पुलिस छह घंटे देर से पहुंची थी। अब यहां अस्पताल के बाहर खड़ी अपना बहादुर चेहरे वाला मुखौटा दिखा रही थी। अस्पताल के बाहर जब-तब न्याय की मांग करते लोगों की भीड़ जुट जाती थी, जिन्हें पुलिस डंडे बरसा कर खदेड़ देती थी। ‘जो भी हो, अभी तो पुलिस को यहां रखना ही पड़ेगा’-शशांक ने सोचा और रजनी की तरफ आगे बढ़ गया।

सामने आते ही रजनी बोली-‘आपने ये जादू कहां से सीखा?’

‘कौन सा जादू?’

‘ये गायब होने का जादू। बीच-बीच में आप गायब हो जाते हो।’

‘अरे भई, सब को संभालना पड़ता है। तभी तो उपन्यास पूरा होगा। हमारा काम ही ऐसा है। हर चरित्र में घुसना पड़ता है। फिर उस किरदार से बाहर भी निकलना पड़ता है।’

‘अभी आप बाहर हो या अंदर।’

‘आपने बुलाया, अब अंदर आ गया।’

‘अच्छा, फिर आपने क्या सोचा मेरे बारे में?’

‘सोचना क्या है? हां, याद आया। नाम बदलने की बात चल रही थी न?’

‘नाम बदलने से क्या होगा?’

‘तो आप क्या चाहती हो?’

‘अपनी सोच बदलो।’

‘कैसे बदलूं?’

‘देखो, आपने मेरी अस्पताल में क्या हालत बना रखी है। लगता है जैसे मेरे जिस्म के साथ ही नहीं, आत्मा के साथ भी बलात्कार हुआ है। इस हादसे के बाद मैं कैसे जी पाऊंगी? जीवन भर यह घटना साये की तरह मेरा पीछा करेगी।’

शशांक को लगा जैसे रजनी का दर्द उसके शरीर में प्रवेश कर रहा है। अंदर ही अंदर वह भी दर्द से कराहने लगा। तभी रजनी ने कहा-“आप ने मुझे ऐसी तकलीफ में क्यों डला?”

“इसलिए तकलीफ दी कि कहानी की मांग यही थी।”

“आप ऐसे जमाने की कहानी क्यों नहीं लिखते, जिसमें दुष्कर्म हो ही नहीं।”

“जब जमाना ऐसा है ही नहीं, तो मैं ऐसा कैसे लिख सकता हूं?”

इसी बीच शशांक को फिर कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगीं। ये रामिया और मैक मोहन की आवाजें थीं। वह दौड़ कर उनके पास पहुंचा-‘हां, बोलो, क्या परेशानी है?’

रामिया ने कहा-‘परेशानी यह है कि आप हमें यहीं सीसीडी में छोड़कर चले गए। इतनी रात हो गई। अब हम घर कैसे जाएंगे?’

“ठीक है, तुम अब घर जा सकते हो। हां, लेकिन जाओगे कैसे?”

“देर रात को भी कुछ बसें मिल ही जाती हैं। बस से चले जाएंगे।”

‘नहीं तुम्हें बस से नहीं भेजूंगा। तुमने देखा नहीं, दिल्ली में निर्भया के साथ क्या हुआ था? तुम मेरे लिए एक नई आफत खड़ी कर सकते हो। ऐसा जोखिम मैं नहीं ले सकता।’

‘तो फिर हम टैक्सी से चले जाएंगे।’

‘ठीक है तुम्हें टैक्सी से भेज देता हूं। लेकिन इस बात की सावधानी रखनी पड़ेगी कि टैक्सी में केवल ड्राइवर हो। कोई और सवारी उसके साथ न हो। अकेले आदमी से तुम दोनों निपट लोगे। और हां, यह भी जरूर चैक कर लेना कि टैक्सी के फाटक के अंदर के हैण्ड टूटे ना हों।’

‘ठीक है, हम सावधानी बरतेंगे।’

“तो फिर जाओ। टैक्सी से चले जाओ। ऑल द बेस्ट।”

शशांक को मालूम था कि अब आगे क्या होने वाला है, लेकिन वह कर भी क्या सकता था? कहानी के आगे बढ़ने का रास्ता यही था। लिहाजा, रामिया और मैक मोहन टेक्सी की सारी जांच-पड़ताल करने के बाद उसमें बैठ तो गए, लेकिन कहानी को कुछ और ही मंजूर था।

टैक्सी ड्राइवर ने बीच में किसी से मोबाइल पर बात की थी, लेकिन वे ठीक से सुन नहीं पाए थे। ‘गाजर, टमाटर’ जैसे कुछ शब्द कान में पड़े थे, लेकिन इनका वे कोई अर्थ लगा नहीं पाए थे। टैक्सी एक सुनसान सड़क पर रुक गई थी। वहां सड़क किनारे दो लोग खड़े थे। टैक्सी रुकते ही वे अंदर आ गए और अपना ऑपरेशन शुरू कर दिया। उनके पास रस्सी थी। दोनों ने अपने-अपने अंगोछों को रामिया और मैक मोहन के मुंह में ठूंस कर बांध दिया। रस्सी से उनके हाथ पैर बांध दिए। फिर जो कुछ हुआ, वह दरिंदे ही कर सकते थे।

टैक्सी वालों ने पहले हाथ-पैर बंधे हुए मैक मोहन को एक स्थान पर सड़क किनारे पटका और आगे चले गए। बाद में रामिया पर वहशीयाना हमला किया गया। आगे जो कुछ हुआ, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

रामिया अब अस्पताल में भर्ती थी और शशांक ने उसका नाम रजनी रख दिया था।

शशांक रजनी के इस हश्र पर दुखी हो कर कुछ सोच में डूबा था कि उसे मोना की आवाज़ सुनाई दी। वह चिल्ला रही थी-‘लेखक महाशय-लेखक महाशय।’

शशांक को सारे काम छोड़ कर मोना के पास जाना पड़ा। पन्ना खुलते ही मोना फड़फड़ाई- ‘मुझे क्या अनंत काल तक पेन्डिंग में पटके रखोगे?’

‘चलिए, बताइये, अब आपकी क्या इच्छा है? आप तो ऐसी किरदार हैं जो अपनी इच्छा से ही चलेंगी। मेरा तो आप पर अब वश रहा नहीं। बताइये, क्या चाहती हैं?’

‘मुझे इंडिया गेट ले चलिए।’

‘वहां आप क्या करोगी?’

‘मैंने ‘स्त्री शक्ति’ पर कुछ कविताएं लिखी हैं। उनकी पोस्टर प्रदर्शनी लगाऊंगी। लोगों का हस्ताक्षर अभियान शुरू करूंगी। लोगों को साथ लेकर कैन्डल मार्च करूंगी। बलात्कारियों को सजा दिलाने के लिए आंदोलन का नेतृत्व करूंगी।’

‘अरे वाह! ठीक है, तुम्हें इंडिया गेट लिए चलता हुं। तुम वहां यह सब कर सकती हो। इससे मेरी कहानी को ताकत ही मिलेगी।’

शशांक इंडिया गेट पर मोना को छोड़ कर आगे बढ़ा तो उसे रजनी के सिसकने की आवाज़ आई। वह दौड़ कर फिर रजनी के पास पहुंचा। उसने बड़े प्यार से पूछा- ‘हां, बोलो रजनी क्या हुआ?’

‘आप यह कह रहे थे कि जैसा जमाना होगा, वैसा ही आप लिखेंगे।’

‘हां, बिल्कुल।’

‘तो पहले जब संगम जैसी फिल्में बना करती थीं, तब क्या सचमुच जमाना वैसा ही था?’

‘क्या मतलब?’

‘याद नहीं है आपको? एक दौर में हमारे यहां कितनी ही फिल्में ऐसी बनी हैं, जिनमें दोस्त के लिए स्त्री को एक निर्जीव गिफ्ट की तरह भेंट कर दिया जाता था। बड़े त्याग और बलिदान की मूर्ति बनते थे यह कह कर कि दोस्त के लिए अपनी प्रेमिका को छोड़ दिया। तब प्रेमिका क्या एक सामान होती थी? उसका दिल नहीं धड़कता था? तब क्या स्त्री के बारे में पुरुष ही आपस में तय करते थे कि उसे किससे प्रेम करना है? क्या हकीकत में ऐसा कोई जमाना था कभी?’

‘अरे, यह फिल्म का मामला अलग होता है। मैं फिल्म नहीं बना रहा। उपन्यास लिख रहा हूं।’

‘उपन्यास पर कभी फिल्म भी बन सकती है। बनती भी रही हैं। सवाल यह है कि क्या आप अपनी कलम से एक आदर्श जमाने की रचना नहीं कर सकते?’

“नहीं, वो मैं नहीं कर सकता। तुम्हें पहले भी बता चुका हूं। मुझे तो जैसा जमाना दिखता है, उसे मैं वैसा ही लिखता हूं। जहां जमाने का हर दिन अपराध और खून से रंगा हो, वहां मैं क्या अपने उपन्यास के पन्नों पर खुशबूदार फूल उगाता रहूंगा?”

अचानक बातचीत में खलल पड़ा। तेज शोरगुल सुनाई दिया। नारेबाजी से आकाश गूंज रहा था। शशांक तेजी से पन्ने पलटता हुआ इंडिया गेट पर आ कर रूका। यहां अब मोना ने आन्दोलन का नेतृत्व संभाल लिया था। इंडिया गेट पर भीड़ इकट्ठी हो गई थी और बढ़ती ही जा रही थी। पुलिस ने भीड़ को घेर लिया था और चारों तरफ खाकी वर्दियां नजर आ रही थीं। वाटर कैनिंग की गाड़ियों ने मोर्चा संभाल लिया था। रॉयट कंट्रोल फोर्स भी नीली बसों में भरकर पहुंच गई थी।

भीड़ जब राष्ट्रपति भवन की और बढ़ने लगी तो पुलिस ने लाठियां बरसाना शुरू कर दिया। जवाब में युवकों ने पत्थर फेंकने शुरू कर दिये। इसके बाद पुलिस तो जैसे पागल हो गई। पुलिस के पगलाए जवान इधर से उधर भाग कर मासूम छात्रों पर निर्ममता से लाठी बरसा रहे थे। वाटर कैनिंग वाहनों ने तेज पानी फेंकना शुरू कर दिया। अश्रु गैस के गोले भी छोड़े गए। इंडिया गेट एक युद्ध स्थल में बदल चुका था, जहां निरीह, निहत्थे छात्र-छात्राओं और खूंखार खाकी के बीच जंग छिड़ी हुई थी। बड़ी संख्या में युवक-युवतियां पुलिस बर्बरता के शिकार बन कर अस्पताल पहुंचे। अगले दिन बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ छपी खबरों से अखबार भरे पड़े थे। शशांक को अखबारों के बीच से अचानक रजनी की आह भरी आवाज सुनाई दी।

शशांक इस आन्दोलन के कोहराम से निकल कर रजनी के अस्पताल की और जा रहा था कि अचानक उसे सम्पत की आवाज सुनाई दी।

सम्पत को अदालत में पेश किया जा रहा था। शायद आन्दोलन का ही दबाव था कि गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया था। सम्पत को पुलिस ने एक झुग्गी-झोंपड़ी से दबोच लिया था।

सम्पत को देखने के लिए भीड़ टूट कर पड़ी। अदालत परिसर में पैर रखने की जगह नहीं थी। अचानक कुछ लड़कों ने सम्पत की जूतों से धुनाई शुरू कर दी। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर भीड़ को खदेड़ा। सम्पत के चेहरे से हवाइयां उड़ी हुई थीं। वह मुझसे बोला-‘मेरे खिलाफ कानून ही तो फैसला करेगा? जनता कानून हाथ में लेकर फैसला करने वाली कौन होती है?’

मैंने उससे कहा-‘मॉब हेज नो माइंड। भीड के दिमाग नहीं होता। बेटे, भीड़ तंत्र ऐसे ही फैसले करता है।’

शशांक सम्पत को अदालत में छोड़ कर फिर रजनी के पास आ गया और कहा-‘हां, अब सुनाओ। बताओ, आप क्या कह रही थीं, कैसे आह भर रही थीं?’

‘मैं आप से एक बार फिर पूछना चाहती हूं कि आप मुझे दुष्कर्म का शिकार क्यों बनाना चाहते हो?’

‘इसलिए कि आज के समय में यह सब हो रहा है। जो हमारे समय का सच है, वही तो लिखूंगा।’

‘नहीं, सच तो यह है कि आप कहानी को मसालेदार बनाने के लिए मेरे साथ दुष्कर्म कर रहे हो।’

‘नहीं ऐसा नहीं है। तुम क्या समझती हो कि जब तुम्हारे साथ दुष्कर्म हुआ, तो क्या मुझे तकलीफ नहीं हुई? मैं इतना खिन्न रहा कि दो दिन तक कुछ लिखा नहीं गया। लेकिन क्या करूं? सचाई वही है, जो मैं देख रहा हूं।’

‘तो सचाई को तुम बदलते क्यों नहीं? आखिर आप एक लेखक हैं। ऐसे समाज की रचना क्यों नहीं करते, जिसमें दुष्कर्म हों ही नहीं।’

‘मैं यह नहीं कर सकता। यह मेरा काम नहीं है। मैं कोई समाज शास्त्री नहीं हूं और न ही कोई क्रांतिकारी हूं। मैं केवल एक लेखक हूं।’

‘आप समाज को सही रास्ते पर ला नहीं सकते तो उसे विकृत भी क्यों करते हो?’

‘मैं समाज को क्या विकृत करूंगा? वह तो है ही विकृत। बीते जमाने के हमारे महान अफसाना निगार सआदत हसन मंटो ने भी कहा है-मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं, दर्जियों का है।’

‘यदि ऐसा है तो मेरी नजर में सोसाइटी के लिए तुम से ज्यादा अच्छे दर्जी हैं।’ रजनी सुबकने लगी थी। शशांक रजनी को उसके हाल पर यहीं छोड़ कर अस्पताल से बाहर निकल आया।

शशांक ने ‘रफ ड्राफ्ट’ के आगे के पन्नों पर नजर दौड़ाई। रजनी के साथ दुष्कर्म के बाकी बचे दो आरोपियों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। इनके नाम थे-कजोड़ और मुरारी। सम्पत को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी थी। ये तीनों एक ही गांव के थे। गांव का नाम था-बेगस। कजोड़ गांव से दिल्ली आ कर कुल्‍फी का ठेला लगाता था। मुरारी टैक्सी चलाता था।

      शशांक इन पन्नों से गुजर रहा था कि अचानक उसे सम्पत की दर्द में डूबी आवाज सुनाई दी। वह रो रहा था। वह बोला-‘तुमने अच्छा नहीं किया। मुझे इनकी संगत में क्यों फंसा दिया? मैं अच्छा भला बी.ए. कर के यहां आईसीएस की परीक्षा की तैयारी के लिए आया था। तुमने मुझे गांव के इन दोनों गुण्डों के साथ मिलवा कर मेरा पूरा जीवन अंधकार में डाल दिया है।’

     ‘चूंकि तुम एक ही गांव के थे, इसलिए तुम्हें मिलवाना तो लाजिमी था। पराये शहर में एक ही गांव के लोग मिल ही जाते हैं।’

      ‘नहीं, ये दोनों समाज के क्रूर चेहरे हैं। इन्होंने जिस तरह रामिया को नोंचा-खरोंचा, उससे तो मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए थे, लेकिन तब मैं भी इनके साथ अपराधी था इसलिए कुछ कर नहीं सकता था।’

       “टैक्सी ड्राइवर ने मोबाइल पर जो बात की थी, उसमें ‘गाजर-टमाटर’ का क्या मतलब था?”

       “गाजर जैसा सुंता हुआ बदन और टमाटर जैसा लाल रंग।”

       ‘क्या कहा था तुमसे तुम्हारे इन दोस्तों ने?’

       ‘ये बोले कि शहरों में तो ऐसा ही होता है और हम पहले भी ऐसा कर चुके हैं। शहर की लड़कियों को इसकी आदत होती है। मैं इनकी बातों में आ गया। अब मैं जेल में आ गया हूं और गांव में मेरी बूढ़ी मां अकेली रह गई है, जो सिर पटक-पटक कर रोएगी।’

       ‘समाज में ऐसा ही होता है। आप जैसे लोग कई बार घुन की तरह गेहूं के साथ पिस जाते हैं। तुम्हारी नियति में यही लिखा था। मैं भी इसके अलावा कुछ और नहीं लिख सकता था। अब पछताने से क्या फायदा, जब चिडि़या चुग गईं खेत।’

       अचानक शशांक को बहुत सारी चिड़ियाओं के चहकने की आवाज सुनाई दी। वह भाग कर ‘रफ ड्राफ्ट’ के खेत पर पहुंचा जहां चिड़ियाएं जश्न मना रही थीं। वे सचमुच खेत का सारा बाजरा चुग गई थीं। एक वृद्ध महिला माथा पकड़ कर रो रही थी। यह संपत की मां थी। उसने सम्पत को शहर में पढ़ने भेजा था, लेकिन उसे पता नहीं था, उसका सपूत क्या कारगुजारी कर बैठा है।

      शशांक को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह चिड़िया को बाजरे के खेत में छोड़ कर भूल गया था। दिल्ली के टैक्सी ड्राइवर मुरारी की तरह उसने और चिड़ियाओं को भी दावत के लिए बुला लिया और सब एक साथ बाजरे के सिट्टों पर टूट पड़ीं।

      सम्पत को ले कर शशांक उसकी मां से बात करना चाहता था, लेकिन इसी बीच उसे रजनी की दहाड़ सुनाई दी। वह दौड़ कर रजनी के पास पहुंचा और पूछा-‘क्या हुआ? इतनी तेज चीखने की आवाज कैसे आई? क्या बहुत दर्द हो रहा है?’

      ‘हां, सीने में तेज दर्द हो रहा है। मेरी आत्मा रो रही है।’

      ‘क्यों, आत्मा क्यों रो रही है?’

      ‘इस हादसे को मैं एक क्षण के लिए भी भूलती नहीं। जिस्म का दर्द तो बर्दाश्त हो जाता है, लेकिन घायल पंछी की तरह जब मन फड़फड़ाता है तो वह सहन नहीं होता। तुमने मेरी हालत ऐसी क्यों की? मैं तुमसे फिर पूछना चाहती हूं कि तुम्हारे लिखने का समाज को आखिर क्या फायदा है?’

      शशांक ने रजनी का दर्द अपने भीतर महसूस किया और उसकी आंखें नम हो गई। वह बोला- ‘देखो, लिखने का फायदा नुकसान मैं नहीं जानता। मैं केवल यह बता सकता हूं कि हमारे समाज में यहां फोड़ा है। फोड़े का ऑपरेशन मैं नहीं कर सकता।’

      ‘यानी आप केवल डायग्नोस्टिक मशीन हैं। डॉक्टर नहीं हैं। उपचार नहीं कर सकते। यही कहना चाहते हैं न आप? जब आप समाज को कोई दिशा नहीं दे सकते तो फिर ये फोड़े-फुंसी बताने की भी क्या जरूरत है?’

      ‘समाज को मैं एक से एक अच्छे उपदेश दे सकता हूं, लेकिन आजकल कहानियों में उपदेश देने का रिवाज नहीं है। उपदेश कोई नहीं पढ़ना चाहता।’

      ‘यानी आपकी चिंता यह है कि आपकी कहानी कैसे बिके?’

      ‘सवाल यह नहीं है। कहानी पढ़ी जाए, यह तो कहानी की पहली शर्त होनी ही चाहिए न? उपदेश आजकल कोई नहीं सुनना चाहता। हां, मैं एक काम कर सकता हूं। तुम्हें एक प्रेरक पात्र के रूप में पेश कर सकता हूं, जिससे लोग जीवन में संघर्ष की प्रेरणा लेंगे।’

     ‘वह कैसे?’

     ‘तुम्हारा नाम अभी रजनी है। रजनी यानी रात। इसलिए मैंने उपन्यास का शीर्षक रखा है- रात का अंधकार। लेकिन मैं तुम्हें अब समाज की विद्रूपताओं से लड़ने वाली ऐसी स्त्री बनाऊंगा, जो लोगों के जीवन से रात का अंधकार दूर कर उषा काल लाएगी। इसलिए मैं अब तुम्हारा नाम बदल कर उषा रखता हूं और उपन्यास का नया शीर्षक होगा- ‘लो सुबह आ गई।’

     ‘आप सब कुछ करोगे, लेकिन दुष्कर्म मुक्त समाज की कहानी नहीं लिखोगे?’

     ‘नहीं, वह मैं नहीं कर सकता।’

     ‘फिर सुबह आएगी कैसे? फिर तो आप इस रफ ड्राफ्ट को कितना भी फेयर कर लो, समाज के लिए तो यह रफ ड्राफ्ट ही रहेगा।’

     इसी बीच रजनी के गले से फिर तेज चीख निकली। नर्स औऱ डॉक्टर रजनी की और दौड़े। रजनी को जोर से एक हिचकी  आई और वह शांत हो गई। उसकी सांसें थम चुकी थीं। 

     शशांक की आंखों से आंसू बह निकले। वह केवल रो सकता था। वह केवल एक लेखक था।

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