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मुट्ठी में आसमान
मुट्ठी में आसमान
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© Upama Darshan

Tragedy

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पापा मुझे साइकिल दिला दो – मुझे साइकिल चाहिए।

दो साल की नन्ही पिंकी साइकिल का हेंडिल पकड़े मचल रही थी और पिता की उंगलियाँ अपनी जेबें टटोल रही थीं। चार सौ रुपए के मासिक वेतन में से 50 रुपए बच्ची की ट्राई साइकिल पर खर्च करना आसान नहीं था। माँ पद्मा ने बेटी को फुसलाने की कोशिश की – पिंकी यह साइकिल अच्छी नहीं है कहीं और देखेंगे पर प्रकाश तो अपनी बच्ची की इच्छा पूर्ण करने के लिए अपनी जान भी दे सकता था। बड़े-बड़े पीले फूलों वाली फ्रॉक और पीला रिबन लगाए पिंकी एकदम परी जैसी लग रही थी। प्रकाश की आँखों के आगे अपना बचपन घूम गया। मन अनायास ही अतीत की गलियों में भटकने लगा।

“माँ कहाँ हो मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी है।“ पाँच साल का प्रकाश चूल्हे पर भोजन बनाती राधिका के गले में बाँहें डाले झूल गया। “अरे पहले हाथ मुँह धो ले – देख कितनी मिट्टी लगी है।” राधिका ने स्नेह से कहा और झट से थाली में भोजन निकाल कर लाई। गरम गरम दाल चावल और आलू का चोखा प्रकाश का पसंदीदा भोजन था।

माँ चटाई पर बैठ प्रकाश को भोजन खिलाने लगी। नन्हें बालक के पास माँ को बताने के लिए ढेरों बातें थीं। “माँ पता है रमेश के पापा उसके लिए शहर से गेंद और बल्ला लाये हैं।”

गाँव में अभी तक उसके साथियों के पास खिलौने के नाम पर कंचे, गुल्ली डंडा और पतंग हुआ करती थी। तब खिलौनों की जरूरत ही कहाँ थी – गाँव का तालाब, छोटी सी नदी, पेड़ पर चढ़ना, छुपम छुपाई कितना कुछ था खेलने को। पिता क़ृष्णदेव विद्यालय में अध्यापक थे। पिता के घर लौटने पर प्रकाश ने पिता से गेंद बल्ला लाने की फरमाइश की।

पिता ने समझाया कि जब वह शहर जायेंगे तो अवश्य उसके लिए गेंद बल्ला लाएंगे पर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। उसके अच्छे भले चंगे पिता बतीस वर्ष की अल्पायु में अचानक ही दुनिया से विदा हो गए और माँ को तो जैसे काठ मार गया।

घर में बाबा दादी थे, चाचा और बुआ भी थे पर अपनी माँ को पाषाण प्रतिमा बनी देख हँसता-खेलता प्रकाश भी गुमसुम रहने लगा। माँ की यह हालत देख नानी ने उसे अपने पास बुला लिया पर खाना-पीना त्याग माँ तो सूखती ही जा रही थी। उसके सामने पूरा जीवन पड़ा था और विधवा के रूप में शेष जीवन बिताने की कल्पना ही उसके लिए भयावह थी। आखिरकार ईश्वर के घर से उसका बुलावा भी आ गया और संयोग से उसी दिन प्रकाश के बाबा उसकी बुआ की शादी तय होने की खुशखबरी लेकर उसकी ननिहाल आए पर बहू के गुजर जाने की खबर सुन उल्टे पैरों ही लौट गए।

आखिर खुशी की खबर लेकर वह मातम वाले घर में कैसे आते। इस आघात से नन्हें प्रकाश का हृदय विदीर्ण हो गया और उसने जीवन पर्यंत अपने बाबा के घर न जाने की कसम खा ली। आठ वर्ष का बालक बेखबर था कि वह अपार खेत-खलिहान, जमीन-जायदाद का मालिक है। बूढ़ी नानी ने अनाथ हुए अपने मासूम नाती को अपनी गोद में समेट लिया। नानी ने उसके माँ पिता की बाकी धरोहर गहने, रेशमी साड़ियाँ और सोने की मोहरें को एक सन्दूक में सँजो लिया। उधर बालक अपने रंग बिरंगे कंचों की धरोहर से अपना मन बहलाता बड़ा हो रहा था। पर ईश्वर को इस बालक की अभी और परीक्षा लेनी थी और उसकी एकमात्र साथिन नानी भी एक दिन भगवान को प्यारी हो गईं। प्यार दुलार बरसातीं मौसियाँ उसे बारी बारी अपने घर ले गईं और उस प्यार के वशीभूत धीरे-धीरे माँ पिता की धरोहर का संदूक खाली होने लगा।

मौसी समझातीं “बेटा तुम तो लड़के हो मेरे तो लड़कियाँ हैं इन मोहरों से उनके जेवर बनवा दूँगी।” और बेचारा 12 साल का बालक उस धरोहर की हिफाज़त भी कैसे करता। इस अल्प अवधि में वह अपने तीन प्रियजनों को खो चुका था। उसके छोटे मामा के बेटे प्रकाश के हम उम्र थे, वह उसे अपने साथ शहर ले गए और उसके साथ शेष थी अपने माँ पिता की विरासत – माँ की शादी की साड़ी, एक खूबसूरत काँच की तश्तरी और पिता की डिग्री। बचपन से माँ पिता के साये से मरहूम वह कभी किसी से कोई फ़रमाइश न कर सका। पर अपनी जान से प्यारी बेटी पिंकी की फ़रमाइश अधूरी कैसे रहने देता।

उसने पचास का नोट दुकानदार की ओर बढ़ा कर ट्राई साइकिल देने को कहा। नन्ही पिंकी की मुट्ठी में आसमान था – आखिर उसके पिता जो उसके पास थे।

साइकिल गरीबी अनाथ

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