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हम पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक
हम पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक
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© Anshu sharma

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रमेश जी और वृन्दा जी के तीन बेटे थे। ख़ुशहाल परिवार था उनका। बच्चों की समय पर शादी कर दी। सब अपनी जिन्दगी में खुश थे। दूसरे शहरों में बसे थे। समय-समय पर आते, रहते मिलते और त्यौहारों पर तो रंगत ही अलग होती...तीनों भाई साथ जो मिलते थे।

उनके आने की खबर सुनकर रमेश और वृन्दा महीने भर से आने की तैयारी में लग जाते। तीनों के कमरे साफ-सफाई होती। कपड़े.. बच्चों के उपहार सब ले लेते.. जब आने का दिन आता तब नाश्ते का ढेर लगा देते। बहुओं की पसंद का भी ध्यान रखते। यहाँ तक कि साबुन...शेम्पू एक-एक चीज़ का ध्यान रखा जाता...नौकरी में थे रमेश जी पर बच्चों के लिये कोई कमी नहीं रखते। आज सब आने वाले थे। सबकी पसंद सोच कर नाश्ता, खाना बनाया। शाम को सबकी पसंद की देसी घी की गोपाल की चाट भी आई।

सब खाते-खाते तारीफ कर रहे थे कि वाह पापा, मजा आ गया घर आकर। सब बहुएँ भी खुश रहती वहाँ। उनके लिये पिकनिक जैसा होता ससुराल आना। सास के साथ मिलकर काम कराती वो सब। देखते ही देखते रमेश जी का रिटायरमेन्ट का समय भी आ गया। धूमधाम से फंक्शन मनाया गया। रिटायरमेन्ट के कुछ दिन बाद वृन्दा जी ने रमेश जी से कहा, सुनो ... अब कोई चिंता नहीं है। चलो...थोड़े दिन बच्चों के पास हो आयें। दोनों ने बड़े बेटे को बताया कि हम आ रहे हैं, सबके लिये बाजार से उपहार लिये।

अचार-चटनी... लडडू... सब बनाये थे वृन्दा जी ने। वहां जाने के बाद सब खुश थे। थोड़े दिन तो सही रहा लेकिन थोड़े दिन बाद ही बहू को काम का भार लगने लगा। जबकी वृन्दा जी साथ में रसोई में लगी रहती। एक हफ्ता हो गया था उन लोगों को आये हुए। बड़ी बहू अपनी सहेली से फोन पर बात कर रही थी... वृन्दा के कानों में आवाज़ आ रही थी। बहू कह रही थी कि अरे... बंधन हो गया इन लोगों के आने से... कहीं अकेले जा नहीं सकती, समय से चाय...खाना दो।

दिन में मैं तो फल ही खा लूँ पर इनके लिये तो खाना बनाना ही है। एक बड़ा झटका था वृन्दा जी के लिये। सोचने लगी... सुबह की चाय तो मैं बना लेती हूँ अपने और रमेश के लिये। और सारा दिन काम में हाथ भी बँटाती हूँ। फिर भी हमसे परेशानी ? जबकि बहू किटी भी हो आई इन सात दिनों में। सोच कर परेशान हो गयी वो... अगले दिन दूसरे बेटे के जाने का प्रोग्राम बनाया...

वो दोनों जाने लगे तो सबने रोका। लेकिन दोनों ने एक ही जवाब दिया "नहीं बेटा कुछ दिन मंझले के भी हो आये... हम आते रहेंगे।" बहू ने रमेश जी को शर्ट-पैंट और वृन्दा को साड़ी दी। दोनों ने तारीफ की- बहुत सुंदर है।

दूसरे, तीसरे बेटे के भी हो आये वो दोनों। कुछ दिन तक मेहमान की तरह सही थे पर दोनों को अहसास हो चला था कि बच्चे आजाद रहना चाहते थे उनको शुरू से संयुक्त परिवार की आदत नहीं रही थी। मंझली बहू शॉट्स पहनती थी। दोनों को अटपटा तो लगा पर ये सोचकर खुद को समझा लिया कि आजकल सब पहनते हैं, कभी टोका नहीं। फिर भी बहू को लगा स्वतन्त्र नहीं रह पाते बड़ों के आने से, और पति का समय भी उसे बाँटना पड़ रहा था।

तीसरे के बारे में भी यही निर्णय रहा कि बेटे-बहू सोचते हैं कि हमसे विचार भी कम मिलते हैं, खाने में हम तो पिज्जा खा ले पर बड़ों को गैस बनती है। ऐसे में दोनों को घर का खाना चाहिये। समय पर उठो.. अगर मम्मी-पापा नहीं होते तो दस बजे तक सोते रहते।

तीनों बेटों ने उपहार दिये। रमेश और वृन्दा घर लौट आये, उन्हें भी अपने घर में सुकून मिल रहा था। पड़ोस से हमउम्र दोस्त आ गये। सभी का एक सवाल था ? भई बेटों के पास से आये हो कैसा लगा ? वृन्दा ने कहा, बच्चों के पास बहुत अच्छा लगा, उपहार दिये हमें।

दोनों परिवार अपने-अपने बच्चों की बातें बता रहे थे। दोनों परिवार एक ही नतीजे पर पहुँचे कि बच्चे अब आज़ादी चाहते हैं। रमेश ने कहा, जब बच्चे यहाँ आते हैं तो उनकी पसंद-नापंसद का हम कितना ध्यान रखते हैं। चाहे कितने समय तक बच्चे रहे दिन कम ही लगते हैं। मुँह से निकलता है अरे, बड़े जल्दी समय निकल गया। जी-जान लुटा देते हैं हम बच्चों पर लेकिन बच्चे कुछ दिन में ही हमें भार समझने लगे। भले ही उन्होंने नहीं कहा, ना हमने शिकायत की... पर एक बात अखरी... जब हम वहाँ गए तो सब बच्चों के हिसाब से चलता रहा। लेकिन यहाँ हम उनके आने पर सब बच्चों के हिसाब से चलाते हैं। हम भले ही चिकनायी ना खाए पर उनके लिये उनकी पंसद का खुशी से बनवाते हैं। वृन्दा कहने लगी... अच्छा किया नहीं टोका हमने किसी बात पर... वो करेगें तो अपने मन का ही। जरा जवाब दे दिया कि हमे ये ही पंसद है या आपको क्या मतलब तो क्या इज्जत रह जायेगी हमारी... हमारे जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं हम अलग ही ठीक है।

जब जरूरत होगी तभी वो हमारा ध्यान रख ले ये ही बहुत है। बच्चों को क्यूँ बंधन में बाँधना ? आजकल बच्चों को आदत नहीं डाली गयी है। वो बन्धकर नहीं रहना चाहते। वृन्दा और रमेश के दोस्त भी कहने लगे सच कहा... आजकल बच्चों को अकेले रहना पसंद है। हमारा टोकना उन्हें पसंद नहीं आता, लगता है कि कुछ बुरा ना मान जाए कहीं।

पहले के जमाने की बात और थी... आजकल तो बच्चे सुनना ही नहीं चाहते। आजादी पसंद है, बहुत कम है जो संयुक्त परिवार में रहना चाहते हैं। खैर... पड़ोस के दोस्त चले गये। तब रमेश जी और वृन्दा भी रात भर बच्चों की बात करते रहे। वो एक दूसरे को बोले कि आजकल बच्चों को हमारा टोकना पसंद नहीं है, कितना खर्च करे... कुछ भी खाये... कहीं भी जाए हमें कोई मतलब नहीं होना चाहिए। उनकी जिन्दगी में दखलअंदाजी करेंगे तो आयेंगे नहीं ये लोग। हमारा सहारा तो वही है, अच्छे या बुरे जैसे भी हो। है तो हमारे बच्चे ही.... रमेश जी की बातें सुनकर वृन्दा ने अपना सिर उनके कन्धे पर रख लिया और कहने लगी, आज गाना याद आ गया तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है...

सच में देखा जाये तो आजकल दो-चार मेहमान आने पर सब इतने परेशान हो जाते हैं। माता-पिता को साथ रखना भी मुश्किल लगता है। अपने लिये चार बार चाय बना कर पी लेंगे पर किसी बड़े ने कह दिया तो उठने में भी परेशानी होने लगती है।

जमाना आजादी दखलअंदाजी बच्चे

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