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गाय पार्टी
गाय पार्टी
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© Atul Agarwal

Comedy Others

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हमारा २० गाय और २ सांडों का झुण्ड स्वरुप नगर, कानपुर में रोज सुबह बेकरी के सामने वाली गड्ढेदार पक्की सड़क पर लगता है. जैसे जैसे गायों के मालिक बैड टी से निवृत होते जाते हैं, हमें घरों से छोड़ते जाते है. पहली धन्नो ६.३० पर आती है. यह गाय है, शोले की बसंती की घोड़ी नहीं है. फिर धीरे- धीरे तन्नो, मन्नो, चन्नो, भन्नो.... एक एक कर के आती जाती हैं. सांड अपने आप आ कर कोरम पूरा कर देते हैं. ७.३० से ९.३० तक सड़क हमारी है.


बासी खाना आने लगता है. रोटी-पराठे तो कॉमन है. बाकी कुछ भी हो सकता है – जैसे दाल, सब्जी, ब्रैड, आदि. चावल रेरली आता है. उसमे से कुछ ज्यादा बासी होता है, जो काम वाली बाइयों के लायक भी नहीं होता. कभी कभी लाटरी भी लगती है, रात की पार्टी या त्यौहार की बची हुई पूड़ी, कचौड़ी, पनीर की सब्जी, रायता, आदि. मिठाई जल्दी कोई नहीं खिलाता, क्योंकि फ्रिज में जल्दी खराब नहीं होती.


कुछ तो पॉलिथीन में गांठ लगाकर डाल जाते हैं. अब हमें गांठ खोलनी तो आती नहीं. समूची गटक जाती हैहमें कोई भी जंक फ़ूड नहीं खिलाता, पिज़्ज़ा, बर्गर, पाव भाजी, बर्गर, चिप्स. अरे भई, बिना चीज़ के पिज़्ज़ा बेस, बिना आलू की टिक्की के बन (हिन्दी में बन्द) और बिना मक्खन वाली भाजी के ५० ग्राम वाला पाव भी तो खिला सकते हैं. पर ऐसी हमारी किस्मत कहाँ. वैसे भी यह सब चीजें शाम को कोल्ड ड्रिंक के साथ ताज़ी ताज़ी ओ.टी.जी. (अवन / ओवन) या माइक्रोवेव से निकलते निकतले गरमा गरम खाने कसामने बेकरी में यह सब सामान देख कर शुरू शुरू में तो लार टपकती थी, लेकिन अब आदत पड़ चुकी है. जो मिलता है, उसी में मस्त रहते हैं, कम से कम घास से तो अच्छा है. नई बहनों को बताओ की पहले तो हम सिर्फ घास चरती या खाते थी, तो वो कहती हैं कि एक बार हमें भी घास टेस्ट करा दो. कहाँ से कराएं, क्लब के पास खुले पार्क में भी अब चरने लायक घास नहीं है. अब हम घास नहीं खाती, तो जुगाली किस की करें. और तो और रम्भाना भी भूल गई.


कुछ के तो रोटी दाता बंधे हुए हैं. बाकी सुबह आने के समय के हिसाब से अपना टर्न आने पर रात्रि व्रत तोड़ती हदोनों सांड हम सबके हैं, अतः उनका कोई फिक्स्ड टर्न नहीं होता. दूसरी जगह के सांड के मुहँ के सामने से निकल जाओ, तो ऐसा भभका आता है कि उबकाई आ जाती है, पर यह दोनों तो डियो फ्रैश रहते हैं

फिर ट्रैफिक की भीड़ बढ़ जाती हैं. हम गाय हैं, स्वभाव से ही विनम्र, अतः ९.३० के बाद तितर बितर हो जाती हैं, चरस पिक्चर का गाना गाते हुए - कल की हसीं मुलाक़ात के लिये, आज के लिये, हम जुदा हो जाते हैं.


फिर देर रात तक आर्य नगर पन्चवाह से निकलने वाली पांचो सड़कों पर जाम पे जाम लगते रहते हैं. लेकिन इसमें हमारा कोई कॉन्ट्रिब्यूशन नहीं है, हमारा तो चंदन सा बदन, चंचल चितवन, हमेंदोष न देना ओ जगवालों


अलग अलग चौराहों पर लोट लगाती हैं. बीच बीच में लेटे लेटे ही धीरे से कान हिला कर ट्रैफिक को आगे जाने का सिग्नल देती रहती हैं. यह भी तो कर्म है. रात को ९ बजे के बाद हम सब अपने अपने घर चली आती हैं. सांडों का हमें पता नहीं. उन्हें तो सड़क पर ही सोना पड़ता होगा. अब वो कहाँ गुहार लगाएं. इसी नाइंसाफी की वजह से साल में दो चार बार तो उठा पटक करते हैं और शहर में दो एक की बलि तो ले ही लेते हैं. पिछली सड़क से आने वाली एक बहन ने बताया कि उस सड़क पर शहर की बहुत अच्छी मिठाई व् नाश्ते की दुकान है और वह दुकानदार रोज प्रातः, कल का बचा नमकीन समान सड़क पर फ़ेंक देता है. उस बहन का प्रस्ताव था कि अपनी गाय पार्टी वहां शिफ्ट कर ली जाए. लेकिन वह सड़क चौड़ी कम है, अतः प्रस्ताव फेल हो गया. हमें भी तो अपने रोटी दाताओं की फिक्र है. उस सड़क पर अगर हम २२ का झुण्ड खड़ा हो गया, तो ट्रैफिक कहाँ से निकलेगा.


एक और बहन ने प्रस्ताव दिया कि अपनी गाय पार्टी उस गली में शिफ्ट कर ली जाए, जिस गली में शहर की सबसे अच्छे दूध की डेरी है. दूसरी बहन ने बताया की वहां पास ही एक छोटा सा साफ़ सुथरा मंदिर है जिसके सामने दो हैण्ड पम्प है, लेकिन दोनों में ही पानी नहीं आता. इसलिए यह प्रस्ताव भी गिर गया.

अभी कुछ नई बहने नॉएडा आगरा एक्सप्रैसवे व् लखनऊ आगरा एक्सप्रैसवे के नीचे पड़ने वाले गॉंव से आई हैं. बताती हैं कि पिछले लगभग ६ महीने से खूब मौज है. सुबह सुबह हमें एक्सप्रैसवे की ६ लेन साफ़ पक्की सड़कों पर छोड़ दिया जाता है. दोनों तरह और बीच में सरकारी घास है. मजे से खाओ, जुगाली करो और कहीं भी लोट लगाओ. इससे गाड़ी के ड्राईवरों को स्पीड कम रखनी पड़ती है और एक्सीडैंट कम होते हैं. हर जगह हमारा योगदान है. हमारे देश में रोज १४० करोड़ में कितने बढ़ जाते हैं, इसका तो गुमान सरकार को है. लेकिन कुल ८४ लाख योनियाँ है, उसमे से कुछ सड़क पर हैं, जैसे की हम, उनकी तो कोई गणना है नहीं, अनुमान है कि कुल गाय २० करोड़ के लगभग हैं.


हमारे देश में १४० करोड़ की जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है और वह भी हर पल बढ़ती जा रही है. जब हम समस्या का हल तो जानते हों, पर अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए, समस्या हल ना करने पर विवश हों, तो उस समस्या को आतम्सात करके, उसका जिक्र करना तक बंद कर देते हैं, बहुत जरुरत होती है तो उसे जस्टिफाई या उसका गुणगान करने लगते हैं. और अब तो सदी के महानायक ने भी पैडमैन पिक्चर में इसको समस्या ना होने का सर्टिफिकेट दे दिया है कि यह १४० करोड़ की जनसंख्या तो हमारे देश की ताक़त है. और ताक़त बढ़ना तो कोई समस्या है नहीं.


प्रशासन के फरमान से शहर के बीच से चट्टे हटाये जा रहें हैं. अब हम तो चट्टा है नहीं. हमारा तो टैम्पररी ३ घंटे की झुण्ड सभा है, जिस पर धारा १४४ लागू नहीं होती.


एक बात और कि हम झूठ नहीं बोलती और नेता भी नहीं हैं. तटस्थ हैं.


जय हो रोज होने वाली गाय पार्टी की, इस प्रार्थना और कामना के साथ कि और मोहल्लों में भी ऐसी ही गाय पार्टी होने लगे.

..

ैं.


सड़क लोग गाय आस्था

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