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क्यूंकि सब बिकता है
क्यूंकि सब बिकता है
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© Anonymous

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बिक रहा है पानी, पवन बिक न जाए 

बिक गयी है धरती, गगन बिक न जाए 

 

चाँद पर भी बिकनॆ लगे है जमीन,डर है कि सूूूरज की तपन बिक न जाए

हर जगह बिकने लगी है सवॆथं नीति,डर है कि कही धर्म बिक न जाए

देकर दहेज खरीदा गया है अब दूलहे को, कही उसी के हाथो दुल्हन बिक न जाए

हर काम की रिश्वत ले रहे अब नेता, कही इन्ही के हाथो वतन बिक न जाए

सरेआम बिकने लगे अब तो सांसद, डर है कि कही संसद भवन बिक न जाए

आदमी मरा तो भी आँखे खुली हुई है, डरता है मुर्दा कही कफन बिक न जाए।

बिकना पवन पानी

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