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जब गुरु गलत हो
जब गुरु गलत हो
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© Ajay Amitabh Suman

Inspirational

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अभी हाल फिलहाल में धर्म गुरुओं के साथ जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, उससे आम आदमी के मन में अविश्वास बढ़ता जा रहा है। मैंने अनेक महिलाओं को देखा है जिनकी आसाराम बापू में बहुत ज्यादा आस्था थी। अभी आसाराम बापू जिस तरह की घटनाओं में जेल गए हैं महिलाओं के साथ अपने किये गये गलत आचरण के कारण और अभी भी सजा काट रहें हैं।

इसी तरह की घटनाएँ तथाकथित अन्य धर्म गुरुओं जैसे कि राम रहीम, गुरु रामपाल, स्वामी नित्यानंद जी महाराज आदि के साथ घटी हैं। इन तथाकथित धर्म गुरुओं के इस तरह के व्यवहार से आम आदमी के मन में भ्रम का माहौल व्याप्त हो चुका है। आम आदमी को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर में सद्गुरु है कौन? किस पर भरोसा करके भगवान की राह पर आगे बढ़ा जाए?

मुझे एक छोटी सी कहानी याद आती है। बहुत पुरानी बात है, तिब्बत में एक ख्याति प्राप्त गुरु रहते थे। उसी तिब्बत में एक छोटा सा बालक रहता था। वह ईश्वर की प्राप्ति के लिए बहुत बेचैन था। वह उन गुरु के पास शिक्षा लेने के लिए पहुंचा। काफी अनुनय-विनय करने के बाद गुरु ने उसे अपना शिष्य बनाने के लिए स्वीकार कर लिया। वह बालक अपने गुरु की तन मन धन से सेवा करता।

वह बालक अपने गुरु को साक्षात ब्रह्म का अवतार मानता था। उसकी गुरु में आस्था को देखकर अन्य गुरु भाइयों में जलन होने लगी। उस बालक का मानना था कि गुरु की कृपा से कुछ भी संभव है। उसके गुरु भाइयों ने पूछा क्या गुरु कृपा से पानी पर चल सकते हो? उस बालक ने कहा बिल्कुल चल सकता हूं। फिर गुरु का नाम लेकर वह नदी के जल के ऊपर दौड़ते हुए चल पड़ा। गुरु का नाम लेकर वो अंगारों पे दौड़ लगाता। उसने गुरु के नाम पे अनगिनत चमत्कार कर दिखाए.

यह खबर उसके गुरु के पास भी पहुंची। उसके गुरु को कौतूहल हुआ कि आखिर मेरे नाम में ऐसी कौन सी बात है जिस कारण से वह पानी पर बड़े आराम से दौड़ रहा है? उसका गुरु नदी के पास खुद गया और अपने शिष्य से नदी के जल पर दौड़ने के लिए कहा। उस बालक ने बहुत श्रद्धा से गुरु के पाँव छुए और गुरु का नाम लेकर नदी के जल पर दौड़ने लगा।

गुरु को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा यदि मेरे नाम में इतनी शक्ति है तो मैं भी नदी के जल के ऊपर ज़रूर दौड़ सकता हूँ। गुरु ने नदी के जल पर दौड़ने की कोशिश की पर वह डूब कर मर गया। यह देखकर चारों तरफ आश्चर्य की लहर फैल उठी। उसके गुरु भाइयों ने फिर बालक से पूछा क्या तुम अब भी नदी के जल के ऊपर दौड़ सकते हो? उसकी आस्था डगमगा चुकी थी। उसने ऐसा करने से मना कर दिया।

आखिर हुआ क्या था? बात बहुत छोटी सी थी। जब तक उस बालक की अपने गुरु में आस्था थी, जब तक वह बालक अपने गुरु को साक्षात ब्रह्म का अवतार समझता था, वह अपनी तीव्र आस्था के कारण पानी के ऊपर भी दौड़ जाता था। आग के उपर से भी बिना जले बाहर निकल आता था। जब उसने खुद देख लिया कि उसका गुरु इस तरह का व्यक्ति नहीं है तो उसकी आस्था डगमगा गई और वह चमत्कार दिखाने में असक्षम हो गया। कहने का तत्पर्य यह है कि एक व्यक्ति के विकास के लिए गुरु मात्र एक सहायक का काम करता है। गुरु की महत्ता बस इतनी सी ही है। साधक तो अपनी तीव्र साधना के कारण ही आगे बढ़ता है। यदि साधना प्रबल हो तो वह स्वयं ही परम ब्रह्म का साक्षात्कार करने में सक्षम है। उसे किसी भी गुरु की जरूरत नहीं है।

महर्षि रमण को किस गुरु ने ज्ञान प्रदान किया? ओशो रजनीश को किसने ईश्वर का मार्ग दिखाया? रामकृष्ण परमहंस को काली के दर्शन किस गुरु ने कराये? महर्षि अरविंदो को श्रीकृष्ण के दर्शन किसने करवाये? मीरा को कृष्ण के दर्शन किसने कराए? मिलारेपा तो अपने गुरु से एक कदम आगे निकलकर अपने गुरु के मार्गदर्शन का स्रोत बना। रामकृष्ण परमहंस की त्वरित गति से अध्यात्मिक शिखर पर पहुँच जाना उनके मार्ग निर्देशकों के लिए दुनिया के आश्चर्यों में से एक था।

डाकू रत्नाकर केवल राम राम मंत्र के जाप से ही सृष्टि का प्रथम कवि होने और वाल्मीकि रामायण रचने का गौरव प्राप्त किया और बाद ने वाल्मीकि मुनी के नाम से विश्व मे ख्याति प्राप्त की। इतिहास गवाह है, गुरु के मना करने पर भी शिष्य अपनी आस्था के बल पर ज्ञान प्राप्त कर लेता था। कौन नहीं जानता कि एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य के मना करने पर भी अपनी आस्था के बल पर धनुर्विद्या में निपुणता उनकी मूर्ति मात्र स्थापित करके कर ली थी।

कहने का मतलब यह है कि गुरु ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सहायक है, मंज़िल नहीं। साधक की साधना में एक साधन मात्र है, साध्य नहीं। कई बार ईश्वर गलत गुरुओं के पास भेजकर साधक की परीक्षा लेता है। यदि आसाराम, राम रहीम, गुरु रामपाल, नित्यानंद आदि ने गलत आचरण किये है तो उसके फल भी भुगत रहे हैं।

इन गुरुओं ने हमेशा सत्य आचरण, ब्रह्मचर्य, ईमानदारी, सेवा की बात की। हालाँकि वो स्वयं उन आदर्शों का पालन अपने जीवन मे नहीं कर सके। तो क्या हुआ? इनके द्वारा बताए गए आदर्शों का पालन करने से तुम्हें कौन रोकता है। ये कोई ज़रुरी नहीं कि बेहतरीन खिलाड़ी पैदा करने के लिए कोच भी बेहतरीन हो। ज्यादातर बेहतरीन कोच एक साधारण खिलाडी ही रहें हैं। आदमी को राजहंस की तरह इन तथाकथि धर्मगुरुओं के मुख से निकले हुए अध्यात्म के कमल पुष्प का ही पान करना चाहिए न कि इनके पतनोमुख चरित्र रूपी कीचड़ का।

गुरु के गलत होने से ईश्वर गलत नहीं होता। मार्ग गलत होने से मंज़िल नहीं बदलती। आदमी मार्ग बदलने के लिए हमेशा से स्वतंत्र रहा है। गलत गुरु ईश्वर के द्वारा आपकी ली जा रही परीक्षा मात्र है। यदि आपकी आस्था नहीं डगमगाती है तो आपको मंज़िल मिलेगी ज़रूर। गुरु का सही होना जरूरी नहीं, पर शिष्य का सही बने रहना बहुत जरूरी है।

साधक साधना आदर्श

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