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बेटी का ब्याह
बेटी का ब्याह
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© Vandana Singh

Others Tragedy

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आज मणिराम बहुत खुश है और हो भी क्यूँ ना सात महीने के इंतजार के बाद उसकी बेटी चन्दा विवाह के पश्चात पहली बार घर जो आ रही थी अपने बाबा के पास। होली का त्यौहार उसकी बेटी चन्दा को हमेशा से ही बहुत भाता था। बड़ा मज़ा आता था उसे बार-बार अपने ही बाबा को रंगकर। मणिराम पहले तो झूठ मुठ का गुस्सा दिखाता था फिर प्यार से हँसते हुए कहता "रंग ले,तू मानेगी थोड़ी। कैसी पागल बेटी है मेरी,अपने ही बाबा के संग होली खेलती है। "चन्दा हँसती हुई बस आँगन में दौड़ती रहती और मणिराम उसे देखता रहता। अपनी पत्नी सुशीला के गुज़र जाने के बाद चन्दा का पिता भी वही था और माता भी। नन्ही सी थी चन्दा जब मणिराम ने उसे अपने हाथों में लिया था। और हाथ में लेते गंभीर स्वाभाव का मणिराम फूट फूट कर रोया था। ये ख़ुशी के आँसू थे। औलाद पत्थर दिल इन्सान को भी मोम बना देती है फिर मणिराम तो खेतिहर किसान था। पृथ्वी की भांति ऊपर से सख़्त और भीतर से नर्म। हाँ पृथ्वी ही तो था वो जिसकी भांति उसमें अपार सहन शक्ति थी। अपनी नन्ही सी गुड़िया का पालन पोषण बड़े चाव से किया। किसी भी चीज़ की कमी ना रखी। राजकुमारियों सी रहती थी चन्दा, ग़रीब की राजकुमारी। साँवले रंग वाली चन्दा का मुख भी चंद्रमा सामान ही सुन्दर व शीतल था। लोग प्रायः मणिराम को कहते रहते "बेटी से इतना मोह भी ठीक नहीं कि उसका चेहरा देखे बगैर निवाला हलक से ना उतरता हो जब ब्याह के चली जायगी तब पता चलेगा। ब्याह की बात तो वो सोच भी ना पाता था क्योंकि चन्दा के बगैर जीना तो वो भूल ही चुका था। फिर भी जग की यही रीत है। बेटी जितनी भी प्यारी हो एक दिन छोड़ के चली ही जाती है। और बेटी का कन्यादान तो हर पिता का सौभाग्य होता है। ये सोचकर वो अपने मन को समझा लेता था। खैर वो दिन भी आया और बड़े ही संपन्न कृषक परिवार में उसका ब्याह हो गया। बड़ी धूमधाम से बेटी ब्याह के चली गयी और पिता के घर को सुना कर गयी। और दिन गिनते सात महीने बीत गए और होली के अवसर पर वो अपने बाबा से मिलने घर आ रही थी।

तो मणिराम आज बहुत खुश था। घर को सुबह ही सजा दिया और चन्दा के मन पसंद खाने की सारी चीज़े बना डाली। जितने भी दिन वो यहाँ रहे जी भर के खाए, क्या पता ससुराल में खुल के खा पाती होगी भी कि नहीं। ससुराल आखिर ससुराल ही होता है और पिता का घर पिता का घर। इन्ही सारी भावनाओं से भरा मणिराम टक टकी बांधे दरवाज़े की ओर देखने लगा। कई चक्कर चौराहे के लगा चुका था और सारे गाँव को पता चल चुका था कि चन्दा आज आ रही है। दोपहर हो गयी। उतावला मणिराम दरवाज़े से लद के बैठा था कि अचानक से बाहर से कुछ आदमियों के आने की आवाज़ आई। वो चौंक कर उठ गया। जल्द ही चार आदमी उसके आँगन में एक पोटली लिये दाखिल हो गए। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। पूछा "कौन है भाई आपलोग? और ये क्या है? मेरी बेटी के गाँव से है? मेरी बेटी कहाँ है? इतने में गाँव के ढेरों लोग जमा हो गये थे। उनमें से एक ने धीमे स्वर में कहा "बहुरानी ने कल जल कर आत्महत्या कर ली। पोटली में वही,उनकी राख है "इतना कहते ही वो वहाँ से भाग खड़े हुए। पोटली मणिराम के हाथों में थी। वो कांप गया। उसे काटो तो मानो खून नहीं। आत्महत्या कर ली? पर क्यों? अपने बाबा को बिना बताये चली गयी। औरतें रोने-विलाप करने लगी। चारों ओर मातम छा गया। मणिराम बुदबुदाने लगा "मेरी चन्दा ऐसा नहीं कर सकती..ना. कभी नहीं। वो समझ चुका था कि कुछ तो बात है। पीछे से आवाज़ आई "जाने दो मणिराम यही उसकी किस्मत थी।"मणिराम बिफर पड़ा "नहीं ये किस्मत नहीं हो सकती उसकी। उसकी किस्मत का फैसला करने वाले वो कौन होते है। उसकी फूल सी बच्ची की किस्मत तो सोने से लिखी थी उसमें राख तो ज़माने के लालची लोगो ने भर दी।

वो उठा, हाथ में कुदाल लिया। बगल की बूढ़ी काकी ने कहा "बेटा, कहाँ जा रहा है? घर में जवान बेटी की जली राख पड़ी है और तू बाहर जा रहा है "मणिराम ने कहा "काकी,पहले उन सबसे तो हिसाब ले लूँ जिन्होंने मेरी बेटी का ये हाल किया। किसी को भी ये हक नहीं कि वो किसी की बेटी के साथ ये करे। ये हश्र कि मुझे उसका अंतिम संस्कार भी नसीब ना हुआ। हाँ सोचूँगा इस राख के बारे में भी पर उन्हें राख में बदलने के बाद। फिर रोऊंगा..बहुत रोऊंगा।

और इतना कहकर वो निकल पड़ा दखिन दिशा की ओर।

आज किसी दहेज़ के दरिंदों ने एक पिता के ह्रदय को जलाया था। पृथ्वी आज अशांत हो गयी। अब प्रलय दूर ना था।

होली पृथ्वी दहेज़

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