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अंत भला तो सब भला
अंत भला तो सब भला
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© dr vandna Sharma

Drama

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एक बार क्या हुआ ,मुझे अपनी ससुराल से दिल्ली जाना था। गढ़वाल में शाम ६ बजे रिज़र्वेशन था लेकिन कन्फर्म नहीं हुआ ,वेटिंग ही रहा अंत तक।

एक तो पतिदेव ने ही देर कर दी थी घर से निकलने में ,किसी तरह भागते -भागते पहुंचे चांदपुर स्टेशन तो गाड़ी बस छूटने ही वाली थी। ईमानदारी से अव्वल मेरे पतिदेव ,कोई जुगाड़ न लगाकर जनरल डिब्बे में ही चढ़ गए। अजी चढ़ गए पीछे -पीछे। वहाँ इतनी भीड़ पाँव रखने को ज़गह नहीं। धक्का -मुकी ,रेलम-पेल। मेरी गोद में मेरा एक साल का बेटा था जो भीड़ की वज़ह से रो रहा था। सहयात्री इतने निर्दयी और इतने दुष्ट किसी ने तरस नहीं खाया कि कोई ज़रा सी सीट भी ऑफर करता। मुझे आया गुस्सा बहुत . मैंने गुस्से में घूरकर पतिदेव को देखा और मैं अगले स्टेशन पर उतर गयी। पतिदेव भी उतरे पीछे -पीछे। अब स्टेशन गांव का था , दूसरी ट्रैन भी नहीं दिल्ली के लिए। घमासान वाक् युद्ध हुआ दोनों के बीच। रात के ८ बजे थे बस स्टैंड भी दूर था। अब मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा था। पर अब कुछ सूझ नहीं रहा था। ईगो के कारन दोनों बात भी नहीं कर रहे थे। तभी एक पैसेंजर ट्रेन रुकी ,दोनों ने एक दूजे को घुरा , चढ़ गए। रात्रि का समय और गाँव का स्टेशन होने के कारन वो डिब्बा खाली था। एक -दो ही यात्री उपस्थित थे। अगले स्टेशन तक हम ने बिलकुल बात नहीं की। एक खतरनाक ख़ामोशी व्याप्त। स्पेस मिलने कारण बच्चा तो सो गया। लेकिन अब रास्ते पड़ने वाली मुसीबतो पतिदेव पारा हाई हो गया हो गया। गजरौला जंक्शन पर दोनों उतर उतर गए। शर्मंदगी और डर से मेरा बुरा हाल। पर गुस्से में उनका चेहरा देखकर सॉरी कहने की भी हिम्मत नहीं हुई। कोई ट्रेन नहीं थी दिल्ली के लिए लम्बे समय तक। रात का समय ,सुनसान स्टेशन ,पतिदेव का गुस्सा और मैं बेचारी अकेली।

काटो तो खून नहीं स्थिति हो रही थी। मैंने चुप रहने में ही समझदारी समझी।

दिन का समय होता तो अनेक विकल्प होते। पर बुरे फंसे मेरी बेबकूफी की वज़ह से। गुस्सा बहुत आता है न मुझे। थोड़ी देर नदी के दो किनारो की तरह दूर-दूर बेंच पर बैठे रहे। अजीब से ख्याल आने लगे मन में। कैसे जायेंगे अब ? सवारी नहीं साथ में छोटा सा बच्चा और पतिदेव ही गुस्से में छोड़कर चले गए तो क्या होगा ?मैं अकेली कैसे जाउंगी घर। किसी को फोन भी नहीं कर सकते जग हँसाई होगी क्योंकि गलती तो मेरी थी ना। फिर क्या हुआ ?पतिदेव अपना बैग उठाकर बिना कुछ बोले ही गुस्से में चल दिए। मैं परेशान कुछ समझ नहीं आरहा था क्या करूँ ?सारी रात तो स्टेशन पर नहीं रुक सकते ऊपर से माहौल इतना ख़राब एक अकेली लड़की रात में ,तो समझो कितने खतरे की बात। अपना ईगो छोड़ मैं तो चुपचाप बैग उठा पति के पीछे चल पड़ी। वो दूर निकल गए थे। अँधेरे में परेशानी रही थी उनको देखने में। भगवानजी तब तुम बड़े याद आरहे थे। रही थी जैसे -तैसे बस घर पहुँच जाऊँ एक बार ,बाकी का युद्ध झेल लेंगे। एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा पतिदेव ने। अगर मैं पीछे न जाती व्ही छूट जाती। वो तो पहुँच गए बस स्टैंड ,जाकर उनके बराबर में खड़े हुए ,पतिदेव ने कोई भाव नहीं दिया। कोई प्रतिक्रिया नहीं। बहुत गुस्सा आया हमें । कैसा खड़ूस पति है कोई परवाह नहीं हमारी। वाक्युद्ध समय अनुकूल नहीं था। दिल्ली की एक बस में चढ़ गए दोनों। पर बस में सीट नहीं ,हाथ में बच्चा ,दूसरे हाथ में बैग और मैं बेचारी ,पतिदेव को तो सीट आगे ही ,पर इन्होने पूछा भी नहीं। सबसे पीछे जाकर मैं बच्चे के साथ बैठ गयी। ये तो सो गए और मैं सोचने लगी आज तो बड़ा बुरा दिन था ,अगर मैं पीछे न आती तो गयी भैंस पानी में। जब कंडक्टर टिकिट लेने आया तो मैं पर्स में पैसे ढूंढने लगी टिकिट लेने के लिए। पर उसने नहीं। शायद पतिदेव का गुस्सा शांत हो गया होगा उन्ही ने ले लिया होगा मेरा टिकिट। करीब एक बजे पतिदेव की आँख खुली तो गुस्सा गायब ,हमारी आयी ,बच्चे गोद में कुछ नहीं उतर गए बस से.ऑटो से पहुंचे घर। पुरे रास्ते कोई बात नहीं। सुनसान ख़ामोशी। हमे तो डर लग रहा था कहीं घर पहुंचकर फिर से वाक्युद्ध ?लेकिन रूम पर पहुंचकर इन्होने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया सॉरी बोलै। धन्यवाद भगवानजी सबकुछ सामन्य हो गया तो हमने भी चुप रहने में ही भलाई समझी। और अंत भला तो सब भला।

गुस्सा पति-पत्नी साथ झगड़ा

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