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नटखट मटरू
नटखट मटरू
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© Dr Hemant Kumar

Children

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एक गांव में एक किसान रहता था। किसान ने एक गाय पाल रखी थी। गाय का नाम था कबरी। कबरी बहुत सीधी थी। लेकिन कबरी का बेटा मटरू बछड़ा बहुत नटखट स्वभाव का था। वह हमेशा कबरी को परेशान करता रहता था। कबरी बेचारी उसे इतना समझाती, पर मटरू उसकी कोई बात नहीं सुनता था।

 

किसान अक्सर कबरी को गांव की दूसरी गायों के साथ गांव के बाहर चरने भेज देता। एक दिन मटरू भी कबरी के साथ गांव के बाहर जाने की जिद करने लगा। कबरी ने उसे बहुत समझाया पर मटरू नहीं माना। हारकर कबरी उसे ले जाने के लिए राजी हो गई। घर से बाहर निकलने से पहले मटरू को समझाते हुए कबरी ने कहा, ‘‘मटरू बेटा वहां एक बात का ध्यान रखना।’’
‘‘कौन सी बात माँ?’’ मटरू ने पूछा।
‘‘गांव के बाहर तुम मेरे साथ ही रहना। कहीं इधर-उधर मत जाना नहीं तो तुम रास्ता भूल जाओगे।’’ कबरी बोली।
‘‘ठीक है मां मैं आपके साथ ही रहूँगा।’’ मटरू बोला।

 

इसके बाद मटरू चल पड़ा बाहर की सैर करने के लिए। रास्ते भर तो मटरू धीरे-धीरे चलता हुआ मां के साथ गया। पर गांव के बाहर पहुंचकर जब कबरी दूसरे जानवरों के साथ चरने लगी तो वह उसके पास से हट गया। उसने सोचा जब तक मां घास खा रही है, तब तक मैं थोड़ा घूम लूं।

 

मटरू चलते-चलते दूसरे जानवरों से बहुत दूर निकल आया। जब वह रुका तो उसे अपने सामने एक घना जंगल दिखायी पड़ा। जंगल देख कर वह बहुत खुश हुआ। उसने सोचा चलो लगे हाथों जंगल में भी घूम लिया जाय। बस फिर क्या था वह चल पड़ा उछलता कूदता जंगल के अन्दर।

 

अभी मटरू जंगल के अन्दर थोड़ी ही दूर गया था कि उसे जोर की आवाज सुनाई पड़ी। आवाज सुनकर वह बहुत डर गया। उसने सामने देखा तो सामने से एक बड़ा सा भालू आता दिखाई पड़ा। भालू मटरू को देखते ही उसके चारों ओर घूमने लगा और उससे बोला,
ऐ बछड़े तू कहाँ से आया
क्या है तेरा नाम,
इस जंगल में भटक रहा क्यूँ
किससे तुझको काम।


भालू की बात सुनकर मटरू रोने लगा। रोते रोते वह बोला,
मैं हूँ गांव से आया भइया,

मटरू मेरा नाम

रास्ता भूल गया हूँ घर का

भटक रहा हूँ मैं जंगल में।

वापस घर पहुँचा दो

मुझको मेरी मां से मिला दो मुझको।


भालू उसकी बात सुनकर जोर-जोर से हंसने लगा और हंसता हुआ बोला,


हा....हा.....हा......

घर से भागा है तू,

रास्ता भूला है तू,

मैं क्यों बतलाऊँ तुझको रास्ता?

अपनी करनी की ही तो

अब सजा पा रहा है तू।

मटरू भालू की बात सुनकर फिर रोने लगा और भालू उसे रोता छोड़कर वहां से चला गया। कुछ ही देर बाद एक चीता उधर आ निकला। चीते से भी मटरू ने घर वापस पहुंचाने के लिए प्रार्थना की। पर चीता भी उसका मजाक उड़ा कर वहां से चला गया।

 

चीते के चले जाने के बाद मटरू बहुत घबरा गया। उसे अफसोस भी हो रहा था कि उसने अपनी मां का कहना क्यों नहीं माना। वह सोच रहा था कि वापस घर जाने का रास्ता किससे पूछे? इतने में ही एक बन्दर सामने से आता दिखाई पड़ा। बन्दर को देखते ही मटरू दौड़ कर उसके पास गया और उसके सामने जोर से हिचकियां ले कर रोने लगा। बंदर को उसके ऊपर दया आ गयी। वह मटरू के पास आकर उसे चुप करा कर बोला,


ऐ बछड़े कहां से आया,
क्या है तेरा नाम?
इस जंगल में क्यों रोता है?
मुझसे क्या है काम?


बन्दर से भी मटरू ने वही बातें कहीं जो उसने भालू और चीते से कही थीं। बन्दर उसकी बात सुनकर मुस्कराने लगा। और उससे बोला,"मटरू मैं तुझे घर पहुंचा दूँगा। रास्ता भी बता दूँगा। पर तुझे मेरा एक कहना मानना पड़ेगा।’’

 

‘‘हाँ बन्दर काका मैं आपकी हर बात मानूँगा पर आप मुझे घर वापस लौटने का रास्ता बता दें।’’ मटरू रोते-रोते बोला।


‘‘देख मटरू तू अभी बहुत छोटा है। तेरा इस तरह अकेला घूमना ठीक नहीं। अब कभी ऐसा मत करना।’’ बन्दर ने उसे समझाया।


‘‘हां काका आप ठीक कह रहे हैं। मां ने भी मुझे समझाया था पर मैंने उनकी बात नहीं मानी थी।’’ मटरू सिसक कर बोला।


‘‘तो अब आगे से कभी ऐसा मत करना। मां का कहना हमेशा मानना। बोलो मानोगे न?’’ बन्दर ने उसे समझाते हुए कहा।


‘‘हाँ काका अब मैं हमेशा अपनी माँ का कहना मानूँगा।’’ मटरू बोला। इसके बाद बन्दर ने मटरू को जंगल के बाहर तक पहुंचा दिया। मटरू तेजी से दौड़ता हुआ अपने गांव की तरफ भागा और जल्दी ही अपनी माँ कबरी के पास पहुंच गया। दोनों एक दूसरे से मिलकर खूब खुश हुए।

 

जंगल देख कर वह बहुत खुश हुआ। उसने सोचा चलो लगे हाथों जंगल में भी घूम लिया जाय। बस फिर क्या था वह चल पड़ा उछलता कूदता जंगल के अन्दर।

 

 

बाल कहानी

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