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मेरा वतन
मेरा वतन
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© Bhim Bharat Bhushan

Inspirational

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आरामकुर्सी पर झूलते हुए अनायास ही वो भावुक हो उठा | उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली |

शायद कोई पुरानी यादें उसकी भावनाओं को धकेल रही थी| अभी 10 दिन पहले न्यूयार्क से भारत आया सतीश हर उस जगह गया था, जहाँ उसने अपना बचपन बिताया था | हर उस दोस्त से मिला जो उसके साथ पढ़ा और खेला था |

 अब सभी अनजाने से हो चले थे जो अपने घर परिवार में मशरूफ थे| लेकिन उसके बावजूद जिस गर्मजोशी से वो सब मिले, सतीश के मष्तिष्क में अंकित हो गए| लगभग 15 वर्ष पहले मैकेनिकल इंजिनियर के पद पर नौकरी करने गए सतीश ने धन और यश तो खूब कमाया, लेकिन वहां का कल्चर उसे कभी भी प्रभावित न कर सका | तभी तो आज वह अपने अतीत के पन्नों में अपने बचपन और यौवन के तमाम किस्सों को याद करके मायूस सा बैठा था| न जानें क्यूँ आज वह कमजोर सा महसूस कर रहा था, जैसे अन्दर से उसे कोई तोड़ सा रहा हो | अपने वतन में लौटकर शायद उसे परिवार के अपनत्व का आभास हो रहा था |

 एकाएक उठकर वह बाहर अपने भाई रितेश और दो भतीजों से एक साथ गले मिलकर फफक फफककर रोने लगता है|

 रितेश-"क्या हुआ, क्या कोई परेशानी हुई ?"

सतीश-"नहीं, कोई परेशानी नहीं, मेरी आप सभी से एक विनती है|"

 रितेश-"हाँ-हाँ कहो न"

अजय और विजय-"चाचाजी कहिये क्या बात है?"

सतीश-"अगर अचानक मैं जीवित न रहूँ तो मेरा अंतिम संस्कार इस मेरे वतन, मेरे शहर में ही करना|"

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