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शहादत
शहादत
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© Bhagirath Parihar

Inspirational

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मरा हुआ व्यक्ति भी तो अपनी कहानी सुना सकता है। अगर मैं अपनी कहानी सुनाऊं तो तुम्हें कोई एतराज है? हो सकता है, तुम तर्क करने लगो कि मरा हुआ व्यक्ति भी कहीं बोल सकता है? क्या इसी बात से मेरी कहानी झूठी हो जायेगी? मैं अब वायवीय होकर ज्यादा अच्छी तरह हालातों का जायजा ले सकता हूँ, खास तौर से उन हत्यारे हालातों का, जिन्होंने मुझे ही नहीं मेरे जैसे पता नहीं कितनों के जीवन को असमय खत्म कर दिया है।

लो, तुम तो झुंझलाने लगे। ऐसे में, मैं अपनी बात कैसे पूरी कर पाऊंगा। बेहतर होगा कि तुम स्वयं को विक्रमादित्य मान लो और मुझे बेताल। ताकि तुम मेरी बात आसानी से सुन सको। क्यों, यह तो ठीक है। चीजों को शर्तों के दायरे में बांधना ठीक  नहीं है मगर यह मैं  केवल तुम्हारी सुविधा के लिए ही कह रहा हूँ। तुम्हारी झिझक और अविश्वास मुझे खाये जा रहे हैं कि कहीं मेरा बोलना बेकार न हो जाय। शायद तुम कुछ कहना चाहते हो। तुम्हारे होंठ बड़ी बेताबी से फड़क रहे है।। लेकिन कहने की आवश्यकता नहीं है। मैं जान गया हूँ, कहो तो बता दूँ। मगर इसलिए ही तुम मुझे भूत समझ बैठो तो गलत बात है। वास्तव में, मैं तुम्हारा मित्र हूँ। और मैं सोचता हूँ  कि मेरी कुर्बानी किसी तरह सार्थक हो जाय। नहीं तो क्या मैं ऐसा कदम उठाता कि मरने के बाद फिर अपनी बात कहने लगूं। पर मुझे बराबर यह लगता रहा कि मेरी शहादत फालतू ही नहीं बेजा भी थी। तुम कहने लगो शायद कि मैं इतिहास पुरुष नहीं हो पाया और इसलिए अपनी शहादत को फालतू समझ रहा हूँ। वास्तव में, मैं वह व्यक्ति नहीं हूँ जो इतिहास बोध से ग्रसित हो। मगर क्या करूँ? विवश हूँ। मेरी अपनी गाथा ही मेरी अस्मिता है। इसकी अभिव्यक्ति के लिए अभिशापित हूँ। इसलिए कहता हूँ मैं बेताल की तरह कहानी खत्म होने पर कोई प्रश्न नहीं पूछूंगा। हालांकि पूछने के लिए मेरे पास इतने सवाल हैं कि तुम्हें और तुम्हारी व्यवस्था को कटघरे में खड़ाकर महीनों जिरह कर सकता हूँ। सवाल दर सवाल। जब तक कि तुम हथियार न डाल दो और कहने लगो कि ‘‘मैं दोषी हूं - मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा हत्यारा हूँ।’’ लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। तुम निश्चिंत रहो। बल्कि मैं तो तुम्हें इस बात का मौका दूंगा कि सवाल तुम करो, उत्तर देना मेरी जिम्मेदारी होगी।

अच्छा होगा अगर हम एक जगह खड़े न रहे। धीरे - धीरे टहलते - टहलते कहानी सुनाने का मजा और ही है। मगर मित्र के नाते मैं भावावेश मैं तुम्हें यार कह बैठूं तो बुरा नहीं मानना। और न ही जब मैं तुम्हें कामरेड या पार्टनर कहूं।

तुम पूछ सकते हो, हालांकि यह बात इस वक्त तुम नहीं पूछोगे कि इतनी कम उम्र में, मैं क्यों मर गया। क्या मरने की जिम्मेदारी मेरी अपनी है या क्या मैं अपनी इच्छा से मरा हूँ? क्या मैने आत्महत्या की है? तुम शंकालु निगाहों से मेरी तरफ क्यों देख रहे हो? तुम तो चिल्लाने लगे कि मैने आत्महत्या की है। सारा समाज जानता है और इस तथ्य को छिपाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। जवाब देने को मैं भी चीखकर कह सकता हूँ कि तुम झूठ बोलते हो समाज के लोग झूठ बोलते हैं। भला कोई आदमी अपनी मरजी से मर सकता है यानि कि क्या वह अपनी इच्छा से मर जाना चाहेगा? लेकिन नहीं, मैं तुमसे सवाल नहीं कर रहा हूँ, न तुम्हें उत्तर देने की जरूरत है। परन्तु इसका मतलब यह भी नहीं है कि मैं तुम्हारी सब आपत्तियां यूं ही चुपचाप स्वीकार कर लूंगा।

और मेरी इसी आदत ने मुझ पर ऐसा कहर ढाया है कि मैं चुप नहीं रह पाया। हालांकि मुझे इसका अफसोस नहीं है। मेरी भाषा से भले ही ऐसा प्रतीत हो।

तुम कह सकते हो कि मुझ में आत्म विश्वास की कमी थी, साहस की कमी थी। दृढ़ता का अभाव था। या कि मैं कमजोर व्यक्तित्व वाला व्यक्ति रहा हूंगा। और इसलिए मैं यातनाजनक हालातों का सामना नहीं कर पाया। पर ऐसा नहीं था। अब तुम पहले जैसी बेसब्री नहीं दिखा रहे हो और चुपचाप चलते - चलते मुझे सुन रहे हो ये अच्छे श्रोता के लक्षण हैं। 

किन्तु यह धैर्य मुझे में कहाँ था। मैं तो गलत चीजों को होते देख उबल पड़ता था और उनका गला टीपने पर उतारू हो जाता था। वैसे तो मैं भी तुम्हारी तरह नौकरी करते - करते खत्म हो सकता था। पर मेरी आदत मेरे आड़े आई। मुझे नहीं पता था कि नौकरी करने के बाद, आदमी नागरिक अधिकारों से वंचित हो जाता है। वह व्यक्ति के रूप में महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। और एक देश के नागरिक होने के नाते तो हरगिज नहीं। लेकिन एक गलती हो गई। मैं अपने आप को स्वतन्त्र देश का एक स्वतन्त्र नागरिक मान बैठा। क्या यह उचित था? मेरे पिताजी ने ही नहीं, मेरे बॉस ने भी जो मुझ से उम्र में काफी बड़े थे तथा जिन्होंने घाट - घाट का पानी पिया था, कहते थे - अनुभव की बात है, गर्मजोशी क्या हासिल कर सकती है। पर मैं नहीं माना। इसलिए भी कि मैं तर्क करने में प्रवीण था और वे मेरे तर्कों के जवाब नहीं दे सकते थे। तब ....

तब अन्त में एक ही प्रश्न पर आकर, हर बार, हर एक अनुभवी के साथ बहस का समापन हो जाता है। वे कहते - तुम रोटी चलाना चाहते हो या मसीहा बनना। यह हारे हुए लोगों की चाल थी। जिसे मैं बड़े हल्केपन से दरकिनार कर देता और कहता स्वतन्त्र देश के गुलाम नागरिकों! अपमानित जिन्दगी के अभिशापित भूतों! मेरे पास संबोधनों के अलावा कुछ भी नहीं है।

यह बात भी नहीं थी कि मैं लड़ाई में अकेला था और न ही मैं कोई दुस्साहासिक कार्य करने पर तुला था। फिर भी ऐसा क्यों हुआ? मैं निहायत घटिया मौत का शिकार हो गया जबकि मैं जंग के मैदान में खड़ा था। मुझे एक क्रांतिकारी की मौत नसीब होनी चाहिए थी। और हुआ यह कि मुझे एक निहायत हेय किस्म की मौत मिली। लोग कह सकते हैं कि मैं स्वयं उत्तरदायी हूँ तथा मेरी समझ व्यवस्था को लेकर साफ नहीं थी मैं आरोपों का स्पष्टीकरण देने के लिए तैयार हूँ पर बेहतर होगा कि तुम मेरी कहानी पूरी सुन लो।

तुम शायद सोचने लगे हो कि मुझे अपनी असामयिक मृत्यु पर दुख है या कि मेरी मौत पिटे हुए पैदल सी है। मेरे जीवन और मेरी मौत में बराबर अन्तर विरोध रहा है। और तब यह सवाल पैदा होता है कि क्या मैं मात्र विरोधाभासों का पुतला था? जो मेरे अपने पैदा किये हुए थे या जिसके लिए परिस्थितियां जिम्मेदार थी।

अगर मैं गलत चीजों को अस्वीकार करने और उनकी आलोचना करने तक ही सीमित होता हो तो गनीमत थी। लेकिन नहीं, मैं तो उन्हें सही करने के लिए संघर्ष में विश्वास करता था। चुपचाप गरल पी जाने की आदत मेरी नहीं थी।

नतीजतन वही हुआ जिसकी अनुभवी लोग मुझे चेतावनी देते थे। जिसका डर दूसरों को था। इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे डर था ही नहीं। मैं काफी भावुक था। अन्याय होते देख तीव्र प्रतिक्रिया कर बैठता था। यहाँ तक कि भावावेश में मैं अपनी सीमाएं लांघ जाता था। लेकिन दिल में डर अपना अड्डा जमाए बैठा था। और वक्त - बेवक्त मौका देखकर, खास तौर पर जब बीवी बच्चे सामने होते, हावी हो जाता था। इन्हीं सब कारणों की वजह से, मैं न चाहते हुए भी एक राजनैतिक व्यक्ति हो गया। अपने साथियों के बीच मैं राजनैतिक सूझ - बूझ वाला व्यक्ति माना जाने लगा। मैं स्थितियों का विश्लेषण कर लोगों के सामने बिल्कुल उन्हें उनके आदमजात रूप में रख देता था और स्थितियों को उसके भ्रष्ट सन्दर्भ में देखकर जोश खा लेता था। तब मेरा अपना नैतिक बल कितना ऊंचा था कामरेड! तुम नहीं जान सकते। पूरे नक्शे को बदल डालना कितना आसान लगता था। सोचता था, जो व्यवस्था हमारे कंधों पर टिकी है, गिराने में वक्त ही कितना लगेगा, बस कंधे हिलाने भर की ही तो देर है। तुम कह सकते हो यह मेरा ‘पेटी बुर्जुआ’ दृष्टिकोण था मगर उस वक्त मैं ऐसा ही सोचता था।

नौकरी में राजनीति एवं ज्ञान अभिशाप साबित होता है। दरबारी विज्ञानों का ज्ञान जो मुझे बचपन से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा में प्राप्त हुआ था, दरकिनार कर, नचिकेता की तरह सही ज्ञान प्राप्त करने की जिद पर अड़ा रहा। हठ और जिज्ञासा ये दो ऐसी चीजें हैं जिन पर बचपन से ही हथौड़ों की चोट पड़ते रहने के बावजूद मेरे सिर पर सवार रही और लोग मुझे सनकी कहने लगे। प्यारे! तुम मुस्करा रहे हो और लोगों की बात की हामी भर  रहे हो। तुम भी यही कहना चाहते हो न कि दुनिया की ठेकेदारी क्यों ले रहे हो, अपना काम करो और इस संसार से दफा हो जाओ। लेकिन मैं कहता हूँ जो दुधारी तलवार हमारी गर्दनों पर लटक रही है। जो कभी भी हमें सिर और धड़ में अलग कर सकती है, उसकी चिंता से पीछा कैसे छुड़ाया जा सकता है? तुम्हीं बताओ पाटर्नर लेकिन बताने के लिए उतावले मत होओ क्योंकि मैं जानता हूँ तुम वही पिटे - पिटाये तर्क मेरे सामने रखोगे।

तुम इतिहास उठा कर देखो, आज का वर्तमान देखो, हजारोँ लोगों ने जेल में दम तोड़ दिया, निर्दोष व्यक्तियों को फांसी दी गई, कत्लेआम किया गया। दीवारों में चुनवा दिया, हाथों में कीलें गाड़ दी गई। योनि और गुदा में स्टील की छड़ें घुसेड़ दी गई। लोगों के मुँह में मूता गया। और जो इसमें शामिल न हो पाए, वे असमय भुखमरी, बीमारी और आत्म हत्या कर मर गया या चिंताओं एवं तनावों के हिमालय उठाते - उठाते विक्षिप्त हो गए, तुम कहते हो यह सब अच्छा हुआ। अब तुम फिर संत की तरह निर्लिप्त दिखने लगे हो। मानो कह रहे हो - किसी के करने/नहीं करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है यह संसार चलता है एक दुःस्वप्न की तरह।

किंतु फर्क तो मुझे पड़ा है प्यारे। जिसने अपने न्याय संगत अधिकार को प्राप्त करना चाहा। जी हुजूरी की भाषा में नहीं, बल्कि अधिकार पूर्ण, आवेशजनित एवं तर्क संगत भाषा में। नतीजा क्या हुआ? वही जो मेरे जैसे हजारों भाइयों के साथ होता आया है। सीधे - सीधे बिना इलजाम अन्दर डाल दिया गया।

आवेश के कारण थक गया हूँ कामरेड थोड़ा सुस्ता लेने दो। दो घड़ी चुप रहकर हम अपनी - अपनी शक्ति संचित कर लें। मैं बोलने की और तुम सुनने की...

विक्रमादित्य भी होते तो थक जाते। शव को नीचे उतारना पड़ता। मगर मैं वायवीय हूँ। भार नहीं बनूंगा? लेकिन मेरी बातें तुम्हारे मस्तिष्क में बोझ बन जाये तो मुझे माफ करना मैं अपना भार ही तो हल्का कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे प्रति आभारी हूँ क्योंकि तुम मेरी कहानी सुन रहे हो। हो सके तो दूसरों को भी सुना देना, वे चाहे इसे अविश्वसनीय ही क्यों न माने।

जब मैं अन्दर था, बिना आज्ञा मूत भी नहीं सकता था। चार दीवारों, सींकचों, बोनेट लगी राइफलों से सजे सिपाहियों के अलावा मैं कुछ नहीं देख सकता था। क्योंकि मेरी जिद और चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की आदत के कारण मुझे जेल में एक अकेली काल कोठरी मिली। सवाल - जवाब के दौरान जो पीड़ाएं दी जाती थी। उसके आगे कोई भी सब कुछ कबूल कर सकता था। मगर मुझसे वो सब पूछा जा रहा था जिसके बारे में, मैं कुछ नहीं जानता था। मुझे जबरदस्ती ही नक्सलवादी घोषित किया जा रहा था सारे सवाल उसी सन्दर्भ में ही थे।

जब मैं अकेलेपन से जूझ  रहा था। जोश और अपमान से तिलमिला रहा था। अपने असहायता पर हाथ पाँव  पटक रहा था, तब मुझे खुफिया तरीके से मेरी बच्ची के बीमार होने की सूचना दी गई। फिर मैं समझौते  की भाषा प्रयोग करने लगा। तब मुझे पता लगा, बच्ची को टाइफाइड है और हालत गम्भीर है। मेरी अनन्त दरख्वास्तों, भूख हड़ताल और सींकचों को पूरी ताकत से झिंझोंड़ने के बावजूद मुझे अपनी बच्ची के पास नहीं ले जाया गया। बल्कि मुझे उस काल कोठरी से हटाकर अस्पताल में ले जाया गया जहां मुझे विक्षिप्त करार दे दिया गया।

तुम्हारे चेहरे पर पहली दफा करुणा के भाव देखकर मैं धन्य हो गया। कम से कम तुम में यह चीज बाकी हैं और जब तक यह चीज बाकी है तुम अन्याय से समझौता नहीं कर सकते। मैं जानता हूँ कि  मेरी बात फालतू नहीं जायेगी। एक मिनट के लिए फर्ज करो तुम्हें भी इस यातना से गुजरना पड़े तब ...। बस यही सोचकर शायद तुम मेरी तरफ करुणा और आक्रोश की मिली जुली नजर से देख रहो हो शायद इस वक्त तुम आततायी को अपने आक्रोश से भून दो और मुझे ढांढस दिलाने की कोशिश करो कि मैं अकेला नहीं हूँ। पर इससे क्या होगा?

मैं फिर तुमसे सवाल करने लगा। जबकि शर्त के मुताबिक मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। खैर! फिर क्या हुआ। समयागत दबावों के कारण परिस्थितियों में परिवर्तन आया। अन्य बंदियों के साथ मुझे भी मुक्त कर दिया गया। अर्ध विक्षिप्त मस्तिष्क लेकर घर आया। वहां इक्कीस महीने का जमा हुआ सूनापन था। बच्ची की किलकारी, धमाचौकड़ी कहां गई! पत्नी जड़ हो चुकी थी। वह सहायता तो क्या सहानुभूति के लिए भी तरस गई थी। वह भी मेरी तरह शारीरिक एवं मानसिक तौर पर टूट चुकी थी जबकि वह तो जेल से बाहर थी। फिर उसकी तमाम मानवीय संवेदनाएं लुप्त क्यों हो गईं थी? मैं इस प्रश्न से काफी दिनों तक मुकाबला करता रहा। मेरे कुछ साथी जो मेरी तरह जेल भोग चुके थे या उन दिनों भूमिगत हो गये थे, अब मुझे सांत्वना देने आते। लेकिन अब काफी देर हो चुकी थी।

और कुछ ही दिनों में, मैं अंट - शंट चिल्लाने लगा। बेवजह इधर - उधर मारा मारा फिरने लगा। जो आदमी महीनों नहीं सो पाया हो। जो जूझते - जुझते टूट गया हो, वह इसके अलावा कर क्या सकता है। तुम कह सकते हो कि मैं अपनी सीमाओं से आगे बढ़ गया था, हो सकता है तुम ही सच हो, पर मैं इसे नहीं मानता।

मैं अपनी कहानी को बहुत लम्बा कर गया हूँ। तुम्हारी उकताहट मुझे स्पष्ट दिख रही है। पागल आदमी की बकवास कोई कितनी सुन सकता है?  खैर! अब इसे मैं एक झटके में ही खत्म कर दूंगा।

एक दिन मैं अपने गाँव  की बावड़ी पर बैठा हुआ था और उसी वक्त पागलपन के एक जबरदस्त दौरे के  दौरान बावड़ी में कूदकर मर गया। अब तुम ही बता सकते हो कि मेरी शहादत फालतू थी या नहीं। लेकिन शर्त के मुताबिक मैं तुमसे कोई प्रश्न नहीं पूछ सकता। अस्तु।

 

 

 

 

शहादत बेताल नक्सल कामरेड विक्षिप्त

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