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अनहोनी
अनहोनी
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© Sahil shrivastav

Drama

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"लखन.. ओ लखन..।"

सुबह आठ बजते ही नीचे टोला के चार मित्र लखन के द्वार पर आकर पुकार लगाते। सभी एक ही स्कूल में पढ़ते थे। सभी की उम्र लगभग तेरह-चौदह वर्ष की रही होगी। ढाई किलोमीटर दूर ग्रामीण विद्यालय के ये छात्र साथ-साथ ही स्कूल जाया-आया करते थे। पाँचों का एक-दूसरे के बिना मन भी नहीं लगता था। साथ-साथ चलने से यह ढाई किलोमीटर की दूरी मिनटों में निकल जाती। सभी हँसते-बतियाते, उछलते-कूदते... तालाब के किनारे पहुँचते और चपटी पत्थर चुन-चुन कर तालाब के शांत जल में फेंकते। पत्थर जब पानी की सतह पर मेढ़क की तरह उछल-उछल कर दूर जा डूबता तो बच्चे तालियाँ बजा कर खूब खुश होते। फिर खेतों की पतली मेड़ पर नियंत्रण का तमाशा दिखाते और स्वर्णरेखा नदी को पार कर... कब स्कूल पहुँच जाते उन्हें पता ही नहीं चलता।

"लखन.. ओ लखन..।" मित्रों ने फिर पुकारा।

इस बार लखन बाहर निकला, पर उसके हाथ में किताब की जगह खाली थैला था। उसने मित्रों से कहा- "बस दस मिनट रूक जा यार, भौजी ने चीनी और चायपत्ती लाने को कहा है। लाला की दुकान से आता हूँ।"

"क्या यार... रोज-रोज..!" पवन बोला।

"ठीक है जा, देर मत करियो।" मनोज ने कहा।

"ठीक है.. बस अभी आया।"

कह कर लखन ने दुकान की राह पकड़ ली। अक्सर लखन के साथ यही होता, पर चारों मित्र इंतजार करते ही थे.. क्योंकि लखन के बिना उनका मन ही नहीं लगता था किंतु कभी-कभी जब ज्यादा देर होने लगती तब वे चले जाते, क्योंकि स्कूल भी समय में पहुँचना जरूरी था। जब किसी दिन लखन अकेला पड़ जाता तो उसे ढाई किलोमीटर की दूरी, ढाई सौ किलोमीटर जैसी लगती।

लखन के साथ अक्सर ऐसा ही होता था। भौजी को भी रोज सुबह ही कुछ न कुछ काम पड़ जाता और बिना कुछ सोचे-समझे लखन को हाँक दिया करती। राम भैया भी कुछ नहीं कहते। उल्टे थोड़ी सी गलती पर लखन की बेरहमी से पिटाई कर दिया करते। राम क्रोधी मिजाज का था, जरा सी गलती पर हाथ-पाँव चलने लगते थे। बस इसी बात का धौंस जमाती थी भौजी और डर के मारे लखन सारे काम कर दिया करता था। एक बार तो सामान्य सी बात पर लखन को बहुत मार पड़ी, जब नाक से खून बहने लगा तब राम ने छोड़ा उसे। माँ ने राम को खरी-खोटी सुनाई तो चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगा- "तुम्हीं ने सिर चढ़ा रखा है इसे।"

"अरे.. इसने कहा न कि इसे याद नहीं रहा, वरना जरूर ले आता।" माँ ने समझाने की कोशिश की।

"झूठ कहता है बदमाश ! खाना नहीं भूलता, खेलना नहीं भूलता... एक काम कह दो तो भूल जाता है।" राम की आँखे क्रोध से लाल हुई जा रही थी।

"चल ठीक है, कल ला देगा।" माँ लखन को लेकर अपने कमरे में चली गई और नाक से बह रहे खून को साफ कर उसे लिटा दिया। लखन सिसकते-सिसकते सो गया। तब जाकर माँ की आँखों पर का बाँध टूटा और अश्रु धारा बह निकली। वह रो-रो कर बस दीवार पर टंगी पति की तस्वीर ही देखती रही।

बात कुछ खास नहीं थी। भौजी ने स्कूल से लौटते वक्त दतुअन लाने को कहा था और एक रूपया भी दिया था। किंतु छुट्टी के समय ऐसा हुल्लड़ होता है और घर जाने की इतनी जल्दी रहती है...कि कुछ ध्यान ही नहीं रहा। यही कारण था कि लखन को दतुअन की बात याद न रही, वरना उसकी इतनी हिम्मत कहाँ कि जान-बूझ कर ऐसा कर पाता। वैसे, यह कौन सी बड़ी बात थी कि भौजी ने नमक-मिर्च मिला कर लखन की शिकायत राम से कर दी ? बड़े-बड़ों से भूल होती है, वह तो फिर भी बच्चा था। जरा भी मोह, माया, ममता नहीं ? लखन को पिटवा कर न जाने कौन सा सुख मिल जाता था भौजी को, यह तो वही जाने।

बेचारे लखन के साथ आये दिन ऐसा ही होता। मित्रों के सामने भी कई बार पिट चुका था वह। इसलिए.. यह बात मित्र सहित गाँव के सभी लोग जानते थे। लखन, भौजी के सारे हुक्म तो बजाता ही था, ऊपर से हर रोज राम भैया की साइकिल को चमकाने की ड्यूटी भी उसी की थी। साइकिल में जरा सी धूल नजर आई तो खैर नहीं। वह हर रात सोचता कि सुबह न हो और हर सुबह सोचता कि भौजी कोई हुक्म न बजा दे। पिता तो थे नहीं, माँ न होती तो शायद दो रोटी भी नसीब न होती। ऐसी भी भौजी होती है क्या ? लखन को भैया से ज्यादा भौजी से चिढ़ होती थी, उसे उस पर गुस्सा भी आता था। वह जानता था कि भौजी ही भैया से उसकी शिकायत करती है, वरना भैया क्या जानें ? हाँ, भैया से बस इतनी सी शिकायत थी कि वे सच्चाई जाने बिना बेरहमी से मारना ही शुरू कर देते थे। भौजी की हर बात उन्हें सच्ची लगती थी, माँ की बातों पर भी उन्हें विश्वास न होता था। लखन के बाल मन में घृणा और क्रोध के भाव पनपने लगे थे। किंतु भैया के डर से भौजी की हर बात मान लिया करता था। माँ भी विवश थी।

उस दिन लखन मुँह धो रहा था। परीक्षा शुरू हो गई थी, इसलिए जल्दी-जल्दी तैयार हो जाना चाहता था। तभी भौजी ने आवाज लगाई-

"लखन..।"

"आया भौजी।" लखन दौड़कर भौजी के पास पहुँचा।

"यह ले दो रुपये और एक कपड़े धोने वाली करंज की साबुन लेता आ।"

"भौजी.. आज मेरी परीक्षा है। देरी हो जाएगी। शाम को लेता आऊँगा।" लखन ने विनती की तो भौजी बोली-

"अरे दो मिनट लगेंगे, जा जल्दी ले आ।"

लखन ने पैसे ले लिये। साबुन लाकर वह आँगन में खड़ी भैया की साइकिल चमकाने में जुट गया। साइकिल चमकाते-चमकाते आठ बज गए। उसके चारों मित्र भी आ गए।

"क्या यार.. अभी तक तैयार नहीं हुए।" मोहन ने पूछा।

"अरे आ गए तुम सब.. बस हो गया, अभी आता हूँ।" लखन बोला और घर के अंदर प्रवेश कर गया। लखन ने किताब का थैला उठाया और माँ के पैर छूकर बाहर निकलने लगा तो माँ बोली-

"अरे.. अरे.. कुछ खाएगा भी या भूखे स्कूल जाएगा ?"

"नहीं माँ, देर हो रही है। साथी बाहर इंतजार कर रहे हैं और आज परीक्षा भी है।" लखन ने कहा।

"ओह.. ठीक है। ले..दो रोटी लेता जा, रास्ते में खा लेना।"

माँ ने दो रोटियों के बीच जरा सी चीनी भुरभुरा दी और उसे मोड़ कर रॉल बना दिया। लखन ने रोटी पकड़ी और दनदनाता हुआ बाहर निकलने लगा। तभी भौजी ने फिर पुकारा-

"लखन..।"

"हाँ भौजी।" लखन ने कहा।

"जरा भैया की कमीज-पैंट पर लोहा करवा आ।"

"भौजी देर हो जाएगी, आज परीक्षा है। शाम को करवा दूँगा।" लखन दौड़ कर बाहर निकल गया।

"और आज तेरे भैया पहनेंगे क्या ?" पर लखन तो जा चुका था। दाँत भींचते हुए, शब्दों को चबाते हुए भौजी भुनभुनाने लगी-"बड़ा ढीठ हो गया। लगता है पढ़-लिख कर कलेक्टर बनेगा । आ.. आज आ तू स्कूल से, बताती हूँ।"

आज परीक्षा अच्छी गई थी। यह बात लखन माँ को बताना चाहता था। उसे तो सुबह की बात याद भी नहीं थी। वह तो बहुत खुश था। घर में प्रवेश करते ही वह माँ के कमरे की ओर बढ़ा ही था... कि एक जोरदार चाँटा उसके कनपटी पर पड़ा। वह तिलमिला गया और चीख पड़ा-

"माँ..!"

माँ दौड़ कर वहाँ पहुँची और राम से उलझते हुए बोली-

"हाय.. क्यों मार रहे हो बच्चे को ? दिन भर का भूखा बैचारा, अभी स्कूल से लौटा ही है और यह बेरहमी ?"

राम ने बीच-बचाव करने आई माँ को भी झिड़क दिया और चिल्लाने लगा-

"यही सब सीख रहा स्कूल में ? बड़ों की बात नहीं मानना.. बड़ों का अनादर करना ? तेरे ही सह से बिगड़ा है यह।" इतना कह कर राम ने दूसरे गाल पर भी एक थप्पड़ जमा दी। फिर एक मुक्का पीठ पर भी जड़ दिया। लखन कराह उठा। जोर-जोर से रोने लगा। गिड़गिड़ाते हुए दया की भीख माँगने लगा, पर राम...! राम तो सिर्फ नाम का राम था। जरा भी दया नहीं आई उसे। उसने पैर से लखन के कमर पर इतना जोरदार प्रहार किया कि लखन औंधे मुँह जमीन पर गिर पड़ा। दर्द के मारे उसका बुरा हाल था। बहुत रो रहा था वह। माँ का हृदय कलप-कलप कर पिघल रहा था और आँखों के रास्ते बाहर निकल रहा था। माँ हाथ जोड़ कर बोली-

"बस कर राम.. इसकी जान ले लेगा क्या ? अरे भाई है तुम्हारा...!" माँ रोने लगी। राम ने साइकिल की चाभी उठाई और यह कहते हुए घर से निकल गया-

"अबकी बार गलती हुई तो जान ही ले लूँगा तेरी।"

माँ ने आँचल से अपने आँसू पोंछे और औंधे मुँह पड़े लखन को सहारा दिया। लखन उठने की कोशिश करने लगा। अभी सिर उठाया ही था कि उसकी नजर भैया के कमरे में पड़ी। सुंदर फिरोजी साड़ी के लहराते परदे से बार-बार उसे भौजी का मुस्कुराता मुखड़ा आईने में दिखाई दे रहा था। भौजी, दीवार पर टंगी बड़े आईने के सामने खड़े होकर अपने लंबे बाल संवार रही थी और मुस्कुरा भी रही थी। भौजी की मुस्कुराहट देखकर लखन के भीतर पनप रहे क्रोध का ज्वालामुखी फट पड़ा। भौजी का मुस्कुराना उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। आव देखा न ताव, आँगन में पड़ी एक छोटी पत्थर उठाई और जोर से दे मारा आईने पर। लखन को कतई इसका भान नहीं था कि उसके हाथों यह क्या अनर्थ हो गया !

चन.. चन.. चनाक... आईना टूट कर बिखर गया। सिर्फ लकड़ी का वह फ्रेम, पेन्डुलम की तरह हिल रहा था। भौजी का मुस्कुराता हुआ चेहरा अदृश्य हो गया था।

"हाय राम ! यह क्या किया तूने ?" माँ का विस्मित हृदय, बस यही सोच कर डर के मारे थर-थर काँप रहा था कि राम के लौटने पर लखन का क्या होगा ? अवाक् भौजी को चूर हुए शीशों में अपना लहुलूहान अहंकार नजर आ रहा था। वह अचंभित हो मूर्ति के समान खड़ी थी। उसे एक नन्हें बालक से ऐसे प्रतीकार की उम्मीद सपने में भी नहीं थी। यह तो अनहोनी हो गई ! न जाने क्यों, वह भी डरी हुई लग रही थी।

"अब कर देना शिकायत भैया से, खूब मार खिलवाना मुझे और खूब हँसना आईने में चेहरा देख-देख के।" क्रोधित लखन ने रोते-रोते बस इतना ही कहा और घर से बाहर निकलने लगा। माँ ने उसे रोकते हुए कहा-

"अरे बेटा भुखा-प्यासा है तू कुछ खा तो ले।"

"खा तो लिया माँ, अब रात को खाऊँगा।" इतना कह कर लखन तीर की तरह घर से बाहर निकल गया। माँ रोती रही। भौजी को तो जैसे साँप ही सूँघ गया था, अभी तक वैसे ही चुपचाप खड़ी थी। शायद उसे बालमन में उठे विद्रोह के चिंगारी का विकराल रूप नजर आने लगा था। एक ऐसा विद्रोह, जिसकी कल्पना भी न की थी उसने।

रात के आठ बज गए थे, पर लखन अभी तक घर नहीं आया था। माँ पूरे गाँव के चक्कर लगा आई थी। भौजी भी न जाने क्यों गुमसुम सी बैठी थी। आज उसे लखन पर क्रोध नहीं आ रहा था। भौजी अपने कमरे में थी और माँ ठीक कमरे के बाहर मोढ़ा में बैठी लखन का इंतजार कर रही थी। अभी तक खाना भी नहीं बना था। साइकिल की घंटी बजी, राम आ गया था। अपने कमरे में घुसते ही उसकी नजर आईने में पड़ी। बिना शीशे का फ्रेम बड़ा उदास लग रहा था। राम ने पूछा-

"कैसे टूट गया आईना ?"

"वो... लखन गेंद खेल रहा था, गलती से आईने में लग गया और शीशा टूट गया। उसकी गलती नहीं थी, पर बैचारा इतना डर गया कि शाम से ही जो बाहर गया है.. अब तक नहीं लौटा है।" भौजी में आए इस परिवर्तन से माँ आश्चर्यचकित थी। माँ ने तो कुछ और ही सोचा था, इसलिए दरवाजे के पास ही बैठी थी कि यदि बहू शिकायत करेगी तो आज राम के पैर पकड़ कर माफी माँग लेगी। वह दूसरा आईना खरीद कर ला देगी, पर लखन को और मार खाने नहीं देगी। किंतु.. यह बदलाव देख कर माँ प्रसन्न हुई।

"अभी तक नहीं लौटा ?" राम ने पूछा।

"आपके डर से कहीं छुपा बैठा होगा।" भौजी बोली।

"तुम सब ने ढूँढ़ा नहीं ?

"पूरा गाँव ढूँढ़ लिया हमने।" भौजी भी उदास लग रही थी।

"मैं देख कर आता हूँ।" राम ने साइकिल उठाई और फिर बाहर निकल गया। राम के जाने के बाद माँ ने भौजी से कहा-"बहू, घर-परिवार इसी प्रकार की समझदारियों से चलते हैं और तब घर में शांति व खुशी का माहौल बनता है।" भौजी ने कुछ कहा नहीं, बस ऊपर-नीचे हाँ में सिर भर हिलाया। वह डर रही थी कि लखन को कुछ हो न जाए। इतनी रात को गाँव में एक भी आदमी नजर नहीं आता, बल्कि कभी-कभी तो हाथियों के झुण्ड प्रवेश कर जाते हैं गाँव में। अगर लखन को कुछ हो गया तो एक कलंक ही लग जाएगा माथे पर। भय की गर्माहट से हृदय का कड़कपन पिघलने लगा था। वाकई.. जिन्हें आत्मसम्मान की जरा भी परवाह हो, उन्हें बदलते देर नहीं लगती।

आधे घंटे बाद राम भी लौट आया। लखन नहीं मिला। तीनों चिंतित नजर आ रहे थे। यह तो सभी जानते थे कि वह गाँव से बाहर जा नहीं सकता, पर रात के नौ बज चुके थे और गाँव में घुप्प अँधेरा छाया था। चिंता का विषय तो था।

"बहू, राम के लिए रोटियों सेंक दे.. मैं एक बार नीचे टोला से देख आती हूँ।" इतना कह कर माँ ने ताखे से टॉर्च उतारा और बाहर निकल गई। राम अपने कमरे में बैठा टूटे आईने को निहार रहा था। भौजी आंटा निकालने के लिए भंडार घर की ओर बढ़ गई। भंडार घर में प्रवेश कर..वह आंटे की बोरी की ओर बढ़ी ही थी कि उसे ठोकर लगी और वह लड़खड़ा गई, पर गिरते-गिरते बची। नीचे देखा तो दंग रह गई। मुँह खुले के खुले रह गए... लखन फर्श पर सोया पड़ा था। दोनों हाथ दोनों पांवों के बीच फँसे थे। उसके माथे के घाव का खून सूख चुका था। लंबी-लंबी साँसे ले रहा था वह। कितना मासूम लग रहा था लखन। भौजी समझ गई कि वह रात के अँधियारे में पिछवाड़े से छिप कर यहाँ आ बैठा होगा और उसे नींद आ गई होगी। वह उसे एकटक निहार रही थी। वात्सल्य जाग उठा। आज पहली बार उसके हृदय में लखन के प्रति स्नेह जगा। लखन को सकुशल पाकर उसकी जान में जान आई। निढाल पड़े मासूम चेहरे को देखकर भौजी की आँखें छलक पड़ीं। अचानक वह बैठ गई और लखन के सिर को उठा कर अपनी गोद में ले लिया। हलचल से शायद लखन की निद्रा कुछ भंग हुई। उसने दोनों हाथों से भौजी की हथेली पकड़ी और सिरहाने रख लिया। फिर उसके मुँह से पीड़ा से कराहते स्वर में बस एक ही शब्द निकला- "माँ..!" लखन फिर सो गया। भौजी फफक पड़ी, उसने लखन को कलेजे से लगा लिया।

नीचे टोला से माँ लौट आई थी। बहू को लखन से लिपट कर रोते देखा तो आश्चर्यचकित हो खुद से ही कहने लगी-

"हे भगवान! यह तो अनहोनी हो गई।"

फिर माँ मुस्कुराने लगी और उनकी आँखें खुशी से बरस पड़ीं। वह चुपचाप राम के कमरे की ओर बढ़ गई। माँ, यह खबर राम को सुनाना नहीं चाहती थी... दिखाना चाहती थी।

डर मार आईना भाभी

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