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चार चिराग तेरे बलन हमेशा 
पांचवां मैं बालन आयीं ...
चार चिराग तेरे बलन हमेशा पांचवां मैं बालन आयीं ...
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© Asima Bhatt

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चांदनी से मेरी मुलाक़ात कोई पांच साल पहले मुम्बई में हुई थी.

मेरे एक पेंटर मित्र ने उससे परिचय कराते हुए बताया कि उसकी किडनी फ़ेल है. नौकरी छूट गयी है इसलिए वो कलकत्ता वापस जा रही है.

चांदनी से मिलने उसके किराए के घर बोरीवली गयी. जिस तरह से मिली लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. हमारे बीच बातचीत बहुत कॉमन थी. साहित्य, सिनेमा और संगीत पर खूब चर्चा हुई. हम दोनों की पसंद-नापसंद एक थी. घंटों बातें करती रही. बंगाल की खूबसूरती और संस्कृति अपने में समेटे वह एक बेहतरीन इंसान थी. आने लगी तो कहा - 'बहुत सामान और कपड़े हैं मेरे पास. तुम चाहो तो इनमें से कुछ ले लो. इतना सामान लेकर ट्रेवल करने में मुझे मुश्किल होगी.

मैं खुद किराए के मकान में रहती हूँ इसलिए सामान ज़्यादा रखना पसंद नहीं करती. हाँ, उसकी पुरानी साड़ी में से एक लाल चौड़े पाड़ वाली तांत की साड़ी ले ली.

वो बहुत खुश होकर बोली- साड़ी भी तुमको मेरी जैसी ही पसंद है.

 

कलकत्ता जाने के बाद कुछ दिनों हम फ़ोन पर बातें करते रहे. मैंने अपने क्लासमेट राजा जो कलकत्ता में रहता है उसका नम्बर भी उसे दे दिया. वो लोग अक्सर बातें करते. फिर उसने बताया वहाँ न उसका ठीक से इलाज़ हो पा रहा है न इलाज़ के खर्चे के पैसे हैं.

इंग्लिश की लेक्चरर थी. वापस मुम्बई आकर उसने नौकरी ढूंढी लेकिन इस बार लेक्चररशिप नहीं मिली. एक पब्लिक स्कूल में इंग्लिश टीचर की नौकरी मिली.

वह रोज़ डायलिसिस के लिए हास्पिटल भी जाती और स्कूल भी, इस बात से जहाँ स्कूल के बच्चे से लेकर प्रिंसिपल तक आश्चर्यचकित थे वहीं डाक्टर भी ... लेकिन चांदनी ने तो जैसे पांचवा चिराग जलाने की ठान ली थी.

जब भी मिलती हंसती रहती. खूब खुलकर बातें करती. कहती - 'तुम इतना काम कैसे कर लेती हो? हमेशा ट्रैवल करती हो? कितना अच्छा लगता है मुझे, सोचती हूँ कैसे मैनेज करती हो?

जैसे तुम रोज़ डायलिसिस और नौकरी करती हो.

वह हंसती - देखो न डायलिसिस से मेरा रंग काला हो गया.

मैंने एक बार उससे पूछा - कैसे हुआ यह सब?

उसने बताया वह पांच सालों से किसी के साथ प्रेम संबंध में थी. दोनों साथ रहते थे. वह पेंटर था. हम दोनों के बीच कभी किसी बात को लेकर झगड़ा भी नहीं हुआ. हमारा बैंक अकाउंट भी ज्वाइंट था. हम बहुत ख़ुश थे. एक बार वह यह बताकर गांव गया कि माँ बीमार है.

कई दिनों तक उसका फ़ोन नहीं आया. मैं उसे बार बार फ़ोन करती रही. एक दिन उसके छोटे भाई ने फ़ोन उठाया.

मैंने पूछा - रंजन कहाँ है?

उसके भाई ने बताया - बिज़ी है.

कहाँ बिज़ी है ?

अपनी शादी में.

इतना शॉक लगा कि ब्लडप्रेशर बहुत बढ़ गया जिससे दोनों किडनी पर असर पड़ा.

मैंने चाँदनी से पूछा - तुमने उसे कुछ नहीं कहा?

हँसते हुए बोली - क्या कहती? बच्चा थोड़े है? जो किया सोच समझ कर किया. बस एक बार मुझे बता देता. मैं मना थोड़े न करती. उसे दूसरी शादी करनी थी या जो भी करना था.

हद तो तब हुई कि जब वो शादी करके मुम्बई आया तो अपनी पत्नी से मिलवाते हुए बोला कि यह मेरी रिश्ते की बहन है. और मुझसे भी जब भी बात करता कहता कि मैं उसका भाई हूँ. मुझे ऐसा लगता जैसे उसकी कॉलर पकड़ कर उसे ज़ोर का दूं.

चांदनी से मिलने मैं अक्सर अस्पताल जाती. एक बार वह भी वहाँ था. हमारी और चाँदनी की आखरी तस्वीर उसी ने क्लिक की.

अब उसकी तीन साल की बेटी थी जिसे चाँदनी बहुत प्यार करती थी. अक्सर वो उसी की बात करती. मैंने पूछा कैसा लगता है तुम्हें यह अपनी पत्नी बच्ची के साथ ख़ुश है और तुम ...

जाने दो. अब क्या बोलूँ? बेचारा है? पर इसकी बेटी अपनी माँ से ज़्यादा मुझे प्यार करती है. उसकी बेटी मेरी भी तो बेटी हुई न ...

औरतों को भगवान इतना बड़ा दिल क्यों दिया है?

अपनी बीमारी के लिए जिस तरह गरिमा से लड़ रही थी किसी से मदद नहीं लेना चाहती थी लेकिन आखिर में हार कर जब उसे आपरेशन के लिए काफ़ी रुपयों की ज़रूरत पड़ी तब उसने मुझसे कहा ...

मैंने कुछ पैसे दिये ... दो तीन बार लेकिन हर बार कहती तुम ख़ुद बहुत मेहनत करती हो. कैसे तुमसे लूं? एक बार तो वो मुझे पैसे लौटा भी रही थी ...जबकि मेरे सामने उसके अस्पताल का बिल पचहत्तर हज़ार आया था और उसके अकाउंट में इतने पैसे नहीं थे. कुछ मिलाया...

बाद में मैंने फेसबुक पर लोगों से मदद की मांग की और लोगों ने मदद भी की उसके लिए सभी का शुक्रिया और मैं ताउम्र एहसानमन्द रहूंगी लेकिन उसके महंगे इलाज़ के सामने पैसे हमेशा कम पड़ जाता और वो लोगों से मदद लेने में बहुत शर्मिंदा होती.

पिछले महीने जब अस्पताल गयी तो कहने लगी - बहुत दिन हो गए मैंने कोई फ़िल्म नहीं देखी.

मैंने कहा - अभी तो मैं मुम्बई से बाहर जा रही हूँ आती हूँ तो फिर चलते हैं.

खुश होकर बोली - हाँ, बहुत मज़ा करेंगे....और तुम्हें एक नयी साड़ी भी देनी है तुमने मेरे लिए बहुत किया...

मैंने कहा - जरूर लूंगी और इस बार अपनी पसंद की लूंगी....

वह हंसकर बोली - बिल्कुल. तुमने मेरी पुरानी साड़ी लेकर भी इतनी ख़ुशी दिखायी थी.

 

बनारस में थी तो एक रात उसका फ़ोन आया. मैंने पूछा - क्या बात है?

तो बोली - मुझे लगा तुम लौट आयी इसलिए फ़ोन किया.

तीन दिन बाद आ रही हूँ.

उसने कहा - मिलना.

 

यहाँ आयी तो मुझे ठंड लग गयी थी इसलिए मिलने नहीं जा पायी जिसका जिंदगी भर अफ़सोस रहेगा लेकिन फ़ोन पर बातें होती रही और यही कहती रही - ठीक हूँ लेकिन इलाज़ का पैसा कम पड़ रहा है कहाँ से क्या करूं समझ नहीं आ रहा ...

चांदनी अकेली थी. उसके घर से कोई सहयोग करने वाला नहीं था.

कल रात जब मैं कुछ काम रही थी चाँदनी का व्हाट्स एप पर मैसेज आया - My sis no more.

मुझे लगा चांदनी किसी और की बात कर रही है. मैंने फ़ोन किया तो उसके दोस्त ने फ़ोन उठाया और बोला - चाँदनी चली गयी. मैंने ही मैसेज किया था.

मेरा दिमाग शून्य हो गया ... वह अब भी ख़ुद को भाई बता रहा था जबकि मैं सब जानती थी. यह बात जब एक बार मैंने चांदनी से कहा भी - मुझसे क्यों झूठ बोलता है?

उसने हंस कर कहा - जाने दो न, अपनी बीवी से डरता है.

 

इन्सान इतना बड़ा भी नहीं हुआ है कि वह सृष्टि को चुनौती दे...

उसके प्रेमी ने एक भगोड़े की भूमिका निभाई लेकिन चाँदनी का प्यार इतना पवित्र था कि उसे आग अपने प्रेमी के हाथों से ही नसीब हुई...

पांचवा चिराग़ वह जला कर ही मानी...

चार चिराग तेरे बलन हमेशा पांचवां मैं बालन आयीं ...

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