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टॉम बॉय रेणु
टॉम बॉय रेणु
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© Kalyan K Vishnoi

Inspirational

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सगाई के तीन महीने बाद रेणु पहली बार अंकुर से मिलने वाली है। सुश्री रेणु से टॉम बॉय रेणु सिंह और वापस टॉम बॉय रेणु सिंह से सुश्री रेणु बनने के लम्बे इतिहास वाली रेणु में जब से लड़की सी नज़ाकत आई है तब से वो उलझन में है। अंकुर जब भी अपने घर होता है तो उस से मिलने का कहता है पर वो किसी ना किसी बहाने से टाल देती है। आज मिलने का प्रस्ताव अंकुर ने नहीं रेणु ने रखा। वैसे तो शाम को पाँच बजे मिलना तय हुआ पर रेणु ना जाने किस उलझन में है कि तीन बजे से पहले ही रेस्टोरेंट की टेबल पर बैठी उसकी प्रतीक्षा कर रही है।

तीन बहनों में सब से बड़ी रेणु की ज़िंदगी में सब से विकट मोड़ तब आया जब वो बारह साल की थी और उसके पिताजी गुज़र गए। माँ प्राथमिक स्कूल में शिक्षिका थी और सारी ज़िम्मेदारी माँ पर ही आ गई। आने जाने वालों के मुँह से उसने जब बार बार एक ही बात सुनी कि घर में अब कोई मर्द नहीं है, कौन इनका ध्यान रखेगा तो उसी दिन रेणु बाइसा ने ख़ुद को रेणु सिंह की तरह बना लिया। अब घर के लिए बाज़ार से सामान लाना हो, जात बिरादरी के किसी कार्यक्रम में जाना हो, पापा की बुलेट चलानी हो या अपनी बहनों का ध्यान रखना हो ये सब रेणु के रोज़ के काम हो गए।

छोटे बाल, जींस और शर्ट उसका स्टाइल बन गया। स्कूल से कॉलेज तक उसकी फिर कोई सहेली नहीं रही, अब सिर्फ़ दोस्त थे उसके। माँ को डर था कि बेटी के साथ कुछ ग़लत ना हो जाए पर दबंग रेणु सिंह अपने साथ साथ सबका ख़याल रखने के लिए अकेली ही काफ़ी थी। हालाँकि सबका ध्यान रेणु रखती थी पर रेणु का ध्यान रखता था बलवीर सिंह। नाम तो बड़ा बलवीर था, दिखने में भी ठीक ठाक, नाक पर मोटा चश्मा लगाने वाला बलवीर कॉलेज में हमेशा रेणु सिंह के साथ रहता था और कभी रेणु को घर जाने में देर हो जाती तो उसके साथ घर तक जाता। वो रेणु सिंह का साया था जो पूरे दिन उसके साथ रहता। रेणु के सभी पंगे लड़कों की गैंग से ही हुए। दोस्त भी सब लड़के, दुश्मन भी सब लड़के।

बास्केट बॉल की स्टेट लैवल की खिलाड़ी रेणु कॉलेज के पहले ही साल में इतनी पोपुलर हो गई कि दूसरे साल बिना किसी प्रचार के उसको छात्र संघ के अध्यक्ष पद का टिकट मिल गया। उसने ख़ूब मना किया पर उसके दोस्तों ने उसकी एक नहीं चलने दी। चुनाव सम्पन्न हुए और कॉलेज के इतिहास में पहली बार एक लड़की अध्यक्ष बन गई। ये वो सपना था जिसको हर छात्र नेता देखता है और रेणु ने कभी नहीं देखा पर यूँ ही सच हो गया।

उदंड स्वभाव की गम्भीर लड़की ने अपनी पार्टी के सभी चुनावी वादे जैसे कॉलेज में सीटें बढ़वाना, कॉलेज कैम्पस में पुलिस चौकी बनवाना हो, कैम्पस को नशे से मुक्त करवाना हो, कैम्पस में ही ई- लाइब्रेरी बनवाना, नए खेल शुरू करवाना और पूरे कैम्पस में वाइफ़ाई लगवाना हो, ये सब मात्र पाँच महीनों में ही पूरे कर डाले।

दूसरे चुनाव में रेणु निर्विरोध अध्यक्ष बन गई। रेणु के सम्मान में निकल रही छात्रों की मौन रैली पर पुलिस ने लाठियाँ बरसा दी। सात दिन पहले ही एस पी बने श्याम शर्मा ने दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही करने से मना किया तो रेणु ने आंदोलन कर दिया। शहर में जाम सा लग गया। एस पी ऑफ़िस के बाहर उपद्रव जैसे हालात होते देख एस पी ने रेणु सिंह से बात करने का प्रस्ताव रखा।

स्टाइल से बेधड़क अंदर आ कर रेणु ने कहा:-"रेणु सिंह को अंदर आने की इजाज़त है?"

दो मिनट के मौन के बाद एस पी ने कहा:-"रेणु सिंह! मुझे लगा इस नाम का कोई बदमाश सा लड़का होगा जिसको मैं डाँट कर भगा दूँगा।"

"बदमाश तो मैं नहीं हूँ शर्मा जी, बस बदमाशी कर लेती हूँ। लड़के-लड़की का लिहाज़ आप ना ही रखो तो अच्छा है और मैं डाँट खा कर भागने वालों में से नहीं हूँ। आपके पुलिस वालों ने कल जो ग़लती की है उसकी माफ़ी माँग लो, समझदारी इसी में है।" रेणु के एक एक शब्द में दृढ़ निश्चय झलक रहा था।

"उन्होंने बिना इजाज़त के जुलूस निकाला जो की शहर की क़ानून व्यवस्था के ख़िलाफ़ था और......"

"कॉलेज का इतिहास उठा कर देख लो शर्मा जी, मैं एक मात्र अध्यक्ष हूँ जिसे दो बार इस पद के लिए चुना गया है। मैं शहर की व्यवस्था आपसे बेहतर समझ सकती हूँ। एक घंटे में माफ़ी माँग लो वरना मेरा एक इशारा इस शहर को आंदोलन की आग में झोंक देगा और उसके ज़िम्मेदार आप होंगे। मेरे रहते मेरी कॉलेज के एक भी छात्र को तकलीफ़ हो ये मुझे मंज़ूर नहीं।" शर्मा की बात को बीच में काट कर रेणु वहाँ से चली गई।

शर्मा ने एक घंटे में माफ़ी माँगी और डेढ़ घंटे में सस्पेंड हो गया। रेणु की जीत ने एक और इतिहास बना दिया। चार महीने से पढ़ाई में डूबी रेणु फ़ाइनल में भी अच्छे नम्बर लाने के संकल्प से सब परीक्षा दे चुकी थी। आख़िरी परीक्षा दे कर वो ख़ुशी ख़ुशी घर आई और आपने आप को आइने में देखा तभी माँ ने कहा:-"कुछ खा ले बेटा।"

"नहीं माँ भूख नहीं है, मुझे पहले ये बाल कटवाने है। चार महीनों में चुड़ैल दिखने लग गई हूँ।"

"अब बाल मत कटवा बेटी।" ये शायद पहली बार था जब उसकी माँ ने उसको बेटा नहीं बेटी कहा। "अब एक लड़की सी नज़ाकत सीख, बाल बनाना, श्रृंगार करना, खाना बनाना। अपने अंदर स्नेह और ममता पैदा कर, आवाज़ से अन्दाज़ सब कुछ कोमल बना। तेरे मामा ने एक लड़का देखा है तेरे लिए। अंकुर सिंह नाम है। इसी शहर में रहता है उसका परिवार। लड़का बड़ी कम्पनी में काम करता है। फ़ोटो देख कर उसने तुझे पसंद भी कर लिया पर आख़िरी फ़ैसला तेरा ही होगा।" माँ एक ही साँस में सब बोल गई।

रेणु सबको झुका सकती थी पर माँ को कभी मना नहीं कर पाई। ऐसा नहीं है कि लड़कों से उसका सम्पर्क नहीं रहा पर वो सब उसके दोस्त रहे जिनके साथ थड़ी पर चाय पीना, छुप कर सिगरेट के कश लगाना या शहर में उनके बराबर बुलेट दौड़ाना जैसे लड़कों वाले काम ही किए। चेहरे पर मेकअप की परत चढ़ते ही रेणु सिंह उसमें दफ़न हो गया और बच गई सिर्फ़ रेणु, रेणु बाइसा। तीन महीने में रेणु ने अपने आप को बिल्कुल बदल लिया। उसने ना ही अंकुर की फ़ोटो देखी और ना ही मिली उस से, बस माँ ने कहा और वो मान गई।

दो दिन से बलवीर रेणु के घर के हर काम में मदद कर रहा है। रेणु की सगाई को एक दिन बाक़ी था। बलवीर काफ़ी बदला बदला सा लग रहा था जो रेणु से सहा नहीं गया।

"ओए बल्लु, इधर आ।" रेणु ने उसको बुलाया। "तेरे तोते क्यूँ उड़े हुए है? इतना बदला बदला सा क्यूँ है?"

"बदल तो तू भी गई है रेणु। परीक्षा के बाद मिली भी नहीं, ना ही मेरा फ़ोन उठाया, सोचा था परीक्षा के बाद... और अब देख ये सब, चोटी बना ली और चेहरे पर ये सब क्या चुपड़ लिया। तीन साल से मैं तेरे साथ था, हर फ़ैसले में तूने मुझे शामिल किया और जब सगाई का फ़ैसला लेने का वक़्त आया तो मुझे किनारे कर दिया।" बलवीर असहज सा हो कर बोला। रेणु ने उसकी आँखों में अथाह दर्द देखा, वो कुछ कह पाती तब तक बलबीर सुबकने लग गया और वहाँ से चला गया।

रेणु अक्सर गुज़रे वक़्त के बारे में सोचते सोचते यहीं आ कर अटक जाती। आज भी वो सोच ही रही थी कि एक आवाज़ सुनी उसने "हेल्लो रेणु। मैं समय से पहले आया पर आप उस से भी पहले।" अंकुर की बात ने उसको जैसे नींद से जगा दिया।

"नहीं बस अभी कुछ देर पहले ही आई थी मैं, आप बैठिए।" फूलों का गुलदस्ता आगे बढ़ाते हुए रेणु ने कहा।

थोड़ी और औपचारिकताओं के बाद अंकुर ने कॉफ़ी पीते हुए अपनी बात शुरू की।

"मैं तुम्हें रेणु सिंह के ज़माने से जनता हूँ। दो साल ख़ूब चर्चा सुनी और जब तुम्हारी फ़ोटो मेरे सामने आई तो मैंने बिना एक पल गवाँए हाँ कह दी। मैं अपनी कॉलेज लाइफ़ में जो एडवेंचर चाहता था वो नहीं कर पाया क्योंकि अच्छी जॉब का सपना था मेरा पर तुम्हें देखता तो ख़ुश हो जाता।" अपनी जेब से दो टिकट निकालते हुए अंकुर ने बात आगे बड़ाई:- "मेरी कम्पनी में मेरा प्रमोशन हो गया और मैं अब उनकी जर्मनी ब्रांच में काम करूँगा। तुम वहाँ मेरे साथ फिर से टॉम बॉय बन कर रहना। लोंग ड्राइव पर जाएँ तो बाइक तुम चलाना। वैसे ये ख़बर मैं तुम्हें आज शाम को फ़ोन पर देने वाला था पर क़िस्मत देखो आज ही तुमने मिलने का फ़ैसला कर लिया। ये दो टिकट्स है, परसों तुम मेरे साथ चलो जर्मनी, हम पंद्रह दिन में वापस आ जाएँगे और तुम्हारे घर से मैं इजाज़त ले लूँगा।"

अंकुर की बात पूरी हो गई पर रेणु कुछ नहीं बोली। थोड़ी देर शांत रह कर अंकुर ने कहा:- "सब ठीक तो है ना?"

"अंकुर.......... म मं मैं ही शादी नहीं कर सकती।" रेणु ने हिचकिचाते हुए कहा। "मैंने अपनी ज़िंदगी में अब तक लड़कों में सिर्फ़ अपने दोस्त देखे है, किसी को जीवन साथी के तौर पर नहीं देखा। कभी किसी के लिए कोई संवेग, कोई इमोशन मन में आए ही नहीं और जिस दिन किसी लड़के के लिए मन में इमोशन आए, किसी लड़के में मुझे अपना जीवन साथी दिखा तो वो तुम नहीं थे। मैं सगाई से एक दिन पहले से ही उलझन में हूँ कि क्या करूँ, किसे समझाऊँ। अगर हो सके तो ही सगाई तोड़ दो अंकुर वरना तुम्हें ना ही रेणु सिंह मिलेगा और ना ही रेणु कँवर, पूरी ज़िंदगी बस एक रेणु को ढोते फिरोगे।"

इतना कह कर रेणु वहाँ से रवाना हो गई, ना पलट कर अंकुर का चेहरा देखा और ना उसने उसको अलविदा कहा। अपने घर पर पहुँची तो रेणु ने पाया कि लड़के वालों ने ये कहते हुए सगाई तोड़ दी कि लड़का जर्मनी शिफ़्ट हो रहा है और वहीं की किसी लड़की से शादी करेगा। थोड़ी देर में अंकुर का मैसेज आया "बी हैप्पी टॉम बॉय।"

थोड़े दिनों बाद रेणु ने बलवीर को अपना जीवन साथी चुन लिया।

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