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लक्ष्य भेदन
लक्ष्य भेदन
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© Harish Sharma

Children Stories Inspirational

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राहुल बहुत उदास था। वह हर बार की तरह फिर गुरु जी के पास गया।

गुरु जी उसे देखकर मुस्कुराये और बोले, "अपने हर पेटीशन को मेरे सामने खुल के कहो, अपने मन की हर पीड़ा को आज निश्चिंत होकर बोल दो, मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ, कि तुम हर प्रश्न का उत्तर पाओगे।"

"गुरु जी, हिम्मत, मेहनत, लगन और प्रयास किसी में कोई कमी नहीं फिर भी मैं लगातार असफल होता जा रहा हूँ। मेरे सभी मित्र सफल हो गए हैं, वे भी जो मुझसे कहीं कम योग्य थे। मेरा पूरा शरीर असफलता की आग में जल रहा है। ऐसा क्या है जो मुझे सफल नहीं होने दे रहा? ऐसी कौन-सी साधना है जो मैंने नहीं की, पर जीवन के रण-क्षेत्र में असफलता ही मिली। दिया बहुत, पर पाया बहुत कम, जो पाया वो ना पाने जैसा ही है।"

राहुल ने अपनी सारी वेदना प्रस्तुत की।

"अच्छा ये बताओ, सबसे ज्यादा किसके बारे में सोचते हो?" गुरु जी ने सहजता से प्रश्न किया।

"मैं किसके बारे में सोचता हूँ?...अम्म...हाँ ज्यादातर तो सफल लोगों के बारे में।"

"मसलन, कौन लोग?"

"अपने आस पास के सफल लोग।"

"क्या इसमें तुम्हारे मित्र भी शामिल हैं?"

"जी, ज्यादातर वही हैं।"

"पढ़ते लिखते, काम करते वक्त भी उनके बारे में ही सोचते होगे?"

"ज्यादातर, वे मेरे दिमाग में टस-टस करते हैं, जैसे मुझ पर हँस रहे हो कि अभी तक तुम क्या पा सके?"

"फिर तो तुम अपना काम पूरे मन से नहीं कर पाते होगे?"

"जी गुरु जी, सपने में भी मेरे दिमाग में बुरे सपने चलते रहते हैं।"

गुरु जी राहुल के कंधे पर हाथ रखकर बोले, "आओ जरा टहलते हुए बातें करते हैं।"

कौए की माँ ने एक बार कौए से कहा, "यदि किसी को पत्थर उठाते देखो तो झट से उड़ जाना।" कौए ने माँ से प्रश्न किया, "माँ यदि किसी के हाथ में पहले से ही पत्थर हो??" कौए की माँ ने कौए से कहा, "जा बेटा, तुझे कोई न मार पायेगा।"

राहुल ये प्रसंग सुनकर कुछ सोचने लगा। 'आखिर गुरु जी उसे क्या कहना चाहते हैं?...क्या वाकई मैं अपने प्रति असावधान हूँ।'

"अच्छा, यदि तुम सफल लोगों के बारे में या अपने सफल हो रहे दोस्तों के बारे में न सोचो, तो क्या तुम्हारे काम में या तुम्हारे लक्ष्य में कोई बाधा उतपन्न हो जाएगी।" गुरु जी ने उसे मुस्कुराते हुए पूछा।

"इसमें समस्या या बाधा का कोई प्रश्न ही नहीं, मुझे अपना काम करना है, इसमें उनकी कोई आवश्यकता नहीं।"

"फिर क्यूँ उनके बारे में सारा दिन सोचते हो?"

गुरु जी की बात सुनकर राहुल को कोई उत्तर नहीं सूझा।

"बेटा, तुम मेहनती हो, हिम्मत वाले हो, इसमें कोई संदेह नहीं। बस तुम्हें जरूरत है एक फोकस की। लक्ष्य का संधान करते वक्त जैसे अर्जुन को सिर्फ मछ्ली की आँख दिख रही थी और उसके दिमाग में कोई कौरव या पांडव नहीं था, न ही ये प्रश्न था कि उसके गुरु क्या कहेंगे, तभी वो अपना लक्ष्य साध सका और एक अच्छा धनुर्धर सिद्ध हुआ। बिल्कुल वैसे ही तुम अपनी तुलना किसी से न करो, अपने मित्रों की सफलता या असफलता तुम्हारा लक्ष्य नहीं। तुम्हारी सफलता तुम्हारा लक्ष्य है, इस पर फोकस करो। कोई भी मूर्तिकार पत्थर की शिला से मूर्ति बनाते समय अपनी कल्पना से फालतू के पत्थर हटा देता है और केवल अपनी कल्पना में छुपी मूर्ति पर ध्यान रखता है। तुम्हें बस यही करना है। सफल होना चाहते हो तो अपने उस गुण को पहचानो, जिसमें तुम सबसे अच्छे हो। दूसरे क्या करते हैं, क्या नहीं करते, इस पर अपना समय व्यर्थ करना तुम्हारा काम नहीं है।"

गुरु जी की बातें राहुल को जैसे गर्मी में शीतल झोंके की तरह तृप्त कर रही थी।

"गुरु जी, मैं आपकी बात समझ गया, आज मेरे मन का ताप मिट गया। सभी बातें सिर माथे। अगली बार आऊंगा तो अपनी विजय के साथ। मैं अबसे अपने आप को हर भटकाव से बचा कर केवल अपने गुणों को ही निखारूँगा।"

राहुल ने प्रसन्नचित्त होते हुए गुरु जी के पांव छुए।

"जाओ, बेटा तुम्हारी सफलता और तुम्हारे बीच कोई नहीं है, केवल तुम्हारे सिवा।" गुरु जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा।

मन सफलता हिम्मत संधान भटकाव

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