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ताज़ा खबर और पसैया
ताज़ा खबर और पसैया
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© Yogesh Suhagwati Goyal

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ये बात सन १९६२ की है, उन दिनों मैं करीब ८ साल का था। भारत और चीन का युद्ध अपने चरम पर था। देश के हर कोने से प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए धन जमा किया जा रहा था। हमारे छोटे से गाँव खेरली में भी इसका प्रयास चल रहा था। सभी लोग अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग कर रहे थे।


एक दिन हमारे पिताजी बोले," क्या तुम इस राहत कोष के बारे में जानते हो ? युद्ध के समय, इसमें जमा पैसा, अपने देश के लिये लड़ने वाले जवानों की भलाई के लिये काम आता है और हाँ, जो लोग इसमें पैसा जमा कराते हैं, उन सभी का नाम रोज़ शाम ८ बजे की ख़बरों में रेडियो पर सुनाया जाता है। क्या तुम भी अपना नाम रेडियो पर सुनना चाहते हो ? ध्यान रहे, कम से कम १ रू. जमा कराना होगा। उस वक़्त हमारी जेब में कुल सवा रू. था जो हमने उसी सुबह ४००० ईंटों से भरा ट्रक खाली करके कमाया था। लेकिन रेडियो पर अपना नाम सुनने की लालसा इतनी प्रबल थी, हमने तुरंत ही हाँ कर दी और १ रू. राहत कोष में जमा कराने के लिए दे दिया।


उन दिनों रडियो किसी २ समृद्ध घर में ही होता था। हमारे घर में ये सुविधा नहीं थी, इसीलिये हम बाहरी संसाधनों पर निर्भर थे। हमारा घर म्युनिसिपल बोर्ड के दफ्तर के बहुत पास था। बोर्ड के दफ्तर की छत पर लाउड स्पीकर लगा हुआ था, जिससे रोज शाम ८ बजे वाली ख़बरें सुनाई जाती थी। उस दिन के बाद, हम प्रतिदिन शाम ८ बजे से सारी ख़बरें बड़े ध्यान से सुनने लगे। कौन जाने, कब किस खबर के बाद, हमारा नाम रडियो पर आ जाये। हमारे पिताजी ने ये भी बताया था कि हमें हर ख़बर बहुत ध्यान से सुननी चाहिये। कहीं ऐसा ना हो कि हमारा ध्यान कहीं और हो और हम नाम सुनने से वंचित रह जायें। इसमें कोई शक नहीं, हमारी दिलचस्पी सिर्फ हमारा नाम सुनने में थी, लेकिन ख़बरें भी बड़े ध्यान से सुननी पड़ती थी। कभी कभी हमारे पिताजी हमसे ताज़ा ख़बरों के बारे में पूछ लिया करते थे। जब कभी हम ख़बरें ठीक से नहीं बता पाते, तो वो नाराज़ भी हो जाते थे। ये सब चलते चलते करीब २ महीने बीत गये।


एक दिन हमने अपने पिताजी से कहा, बहुत दिन हो गये, हमारा नाम तो छोडो, रेडियो पर कोई भी नाम सुनाई नहीं दिया। पता नहीं क्या बात है, वो हल्के से मुस्कुराये और बोले, "तुम ठीक कह रहे हो, कोई नाम नहीं आया और ना ही आयेगा। ये सब मैंने तुम्हें ख़बरें सुनना, सिखाने के लिए किया था। आज से उम्र भर को ये बात गाँठ बांध लो, कुछ भी हो जाये, रोज की ख़बरें जरूर सुननी हैं। इससे तुम्हारा सामान्य ज्ञान बहुत बढ़ जायेगा। तुम्हारी इस कोशिश के लिये, पुरस्कार स्वरुप आज से तुम्हें एक आना (६ पैसे) प्रतिदिन का जेब खर्च मिलेगा। " हम बड़े खुश थे।


हमारे गाँव में एक शम्भू पंडितजी रहते थे। सारे गाँव के घरों में मांगलिक कार्यक्रम उन्हीं के हाथों संपन्न होते थे। कभी २ वो वक़्त गुजारने, हमारी जवाहर चौक वाली बर्तन की दुकान पर आ बैठते थे। यही वजह थी, कई बार उनकी उपस्थिति में ही हमको अपना जेब खर्च मांगना पड़ता था। हमारा अपने जेब खर्च के ६ पैसे से लगाव देखकर, पंडितजी ने हमारा नाम “पसैया” रख दिया था। वैसे यह भी सच है, पंडितजी हमको बहुत प्यार करते थे। हमारे दो चाचा थे और दोनों चाचा हमारे पिताजी को भैया के संबोधन से पुकारते थे। उनको देखते सुनते, हम भी अपने पिताजी को भैया कहकर ही बुलाते थे। एक दिन, सभी लोग दुकान पर बैठे थे। जब हमने अपने जेब खर्च का एक आना माँगा, तो पंडितजी ने टोक दिया और बोले, "अरे प्रह्लाद, जो हमारे पिताजी का नाम था, पसैया अभी भी तुझे भैया कहकर पुकारता है ? अब ये ८ साल का है, इसको सिखाओ, अब इसे भैया नहीं, पिताजी बोलना चाहिये।"


उस दिन घर पर पिताजी ने हमको समझाते हुए कहा "अब आगे से भैया मत बोला करो।अब तुम पिताजी कहकर संबोधन करोगे और हाँ, जब तक पिताजी बोलना शुरू नहीं करोगे, तुम्हारा जेब खर्च बंद रहेगा।" हमको पिताजी बोलने में अजीब सकुचाहट सी महसूस हो रही थी। लेकिन जेबखर्च की मार भी नहीं झेल पा रहे थे। ३-४ दिन गुजर गये। आखिर ५वें दिन जब हम दुकान पर पहुँचे, तो पंडितजी भी वहीँ बैठे थे बोले,"क्या हुआ, चेहरा क्यों उतरा हुआ है ? पसैये को पैसे नहीं मिले क्या ?" पिताजी ने उनको सारा किस्सा बताया। पंडितजी बोले, "इतनी सी बात। पसैया का उतरा चेहरा अच्छा नहीं लगता। देखो भाई प्रह्लाद, ये तुमको पिताजी बोलेगा और तुम आज इसको चार आने दोगे। ठीक है ?"


बहुत हिम्मत बटोर कर, नीची निगाह से, हम पहली बार बोले, “पिताजी” पैसे दे दो और पिताजी ने ख़ुशी ख़ुशी हमको चार आने दे दिये।

बचपन पिताजी शिक्षा पैसा यादें कहानी

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