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थैंक यू फैसबुक
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© Rakesh Dhar Dwivedi

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सामने लाल वस्त्र पहने हुऐ  कुली महोदय दिखाई दिऐ । मैंने पूछा, भाई सेकंड एसी का ए-1 डिब्बा कितनी दूरी पर है? साहब 300 मीटर आगे बढ़ जाइऐ , ए-1 डिब्बा आ जाएगा। मैं आपका ब्रीफकेस लेकर डिब्बे में बैठा दूँ  क्या? अरे नहीं मैं चला जाऊँगा , मैंने जवाब दिया। अरे साहब, केवल 50 रुपए लूँगा । नहीं भाई, मैं चला जाऊँगा , मैंने अपनी बात कहीं। वह धीरे से भुनभुनाया- 'चलिहे एसी मा और कुली का देए खातिर 50 रुपए नाहीं  है', ऐसा कहकर वह आगे बढ़ गया। 

 

पाँच मिनट बाद एसी ए-1 डिब्बा सामने था। 9 नंबर की सीट मेरी थी। रिजर्वेशन चार्ट पर मेरा नाम लिखा था विकास मिश्रा। मन को बड़ा ही सुकून हुआ। लीजिए पहुँच  गऐ अपनी सीट पर। सीट भी नीचे की लोअर बर्थ की है, यात्रा का आनंद बढ़ गया।

 

कुछ आधुनिक शैली की अभिनेत्रीनुमा युवतियों ने डिब्बे में आधुनिक वस्त्रों में प्रवेश किया तो सुलभ जिज्ञासा उठी कि इन्हें हमारा सहयात्री होना चाहिए, लेकिन ये तो अपने सामान के साथ आगे बढ़ गईं और सामने की दोनों ऊपर की सीटें अभी भी खाली हैं।

 

तभी दो भीमकाय स्त्री-पुरुषों ने डिब्बे में प्रवेश किया। गाड़ी ने हल्की-सी प्लेटफॉर्म पर हरकत की फिर रुक गई। भ्रम यह हुआ कि गाड़ी इनके चढ़ने से रुकी या अपने आप। महोदय ने लंबी दाढ़ी बढ़ा रखी थी, जो इनकी शख्सियत को बिना बताए बता रही थी और साथ ही मोहतरमा ने काले रंग का बुरका पहन रखा था। दोनों सामने की सीट पर विराजमान हो गऐ। 

 

मैंने बड़ी ही विनम्रता से प्रश्न पूछा- क्या नाम है आपका? कहाँ  तक यात्रा करेंगे? जी नवाब अली, मुंबई तक जाऐंगे  जनाब। यह लखनऊ शहर है। यहाँ  पर कभी आप भूलभुलैया या इमामबाड़े के सामने खड़े तांगे/इक्के की सवारी की‍‍जिए और फिर बड़े ही अपनत्व से उस इक्के वाले के खानदान के बारे में पूछिऐ तो वह नवाब वाजिद अली शाह का वंशज या रिश्तेदार मिलेगा। 

 

खैर छोड़िए, मुझे तो अपने सारे यात्री प्रागैतिहासिक काल के ही मिलेंगे, यह सोचते मनहूसियत को कोस रहा था कि तभी सीट नंबर 8 को पूछती एक बेहद ही खूबसूरत नवयौवना ने गुलाबी रंग के सूट में प्रवेश किया। 'अरे ये तो बाजीराव की मस्तानी आ गई'। आँखें  जो देख रही थी, उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्होंने पूछा, सीट नंबर 8 कहाँ  है? जी, इसी में ऊपर वाली सीट है। मैंने इशारे से बताया। और उसने अपना सामान रखा और सामने की सीट पर बैठ गई। मैं बार-बार उसे देखता और बाजीराव मस्तानी को याद करता। 

 

लेकिन वो मेरी इन तमाम हरकतों से बेफिकर होकर अपने फोन में फेसबुक पर व्यस्त हो गई। विवश होकर मैंने भी अपना एंड्रॉयड फोन निकाला औरव्हॉट्सएप पर मैसेज करने लगा। सामने नवाब साहब और उनकी बीवी भी अपने मोबाइल पर व्यस्त हो गऐ और गाड़ी ने धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म को छोड़ दिया।

 

गाड़ी ने थोड़ी गति पकड़ ली थी। हम सब अपने-अपने मोबाइल फोन में व्यस्‍त थे कि तभी काले सूट में एक भद्र व्यक्ति आए तथा जिन्होंने हमारी व्यस्तता को यह कहकर भंग किया कि सीट नंबर 9 टिकट प्लीज। जी मैं विकास मिश्रा मुंबई तक जाऊँगा । सर ये है मेरा टिकट और ये आईडी। ठीक। 8 नंबर पर कौन है? जी मैं अभिव्यक्ति शर्मा। भोपाल तक जाऊँगी । ये मेरा आईडी है। ओके। टीटी महोदय ने अन्य के भी टिकट चेक किए और आगे बढ़ गऐ।

 

एक रहस्य से पर्दा उठा गया था कि सामने बैठी हुई मस्तानी-सी दिखने वाली ख़ूबसूरत नवयौवना अभिव्यक्ति शर्मा है और उसको भोपाल तक की यात्रा करनी है। गाड़ी लखनऊ से 20 किमी आगे आ गई थी। नेटवर्क ने धोखा दे दिया और सबके मोबाइल फोन के फेसबुक बंद हो गऐ थे। अब लोग विवशताभरी निगाहों से एक-दूसरे को देख रहे थे।

वाब साहब अपनी बीवी से बातचीत में मशगूल हो गऐ, तभी चाय वाले ने प्रवेश किया। चाय गरम, डिप टी। मैंने धीरे से बुलाया। जरा चाय का एक कप देना। फिर धीरे से अभिव्यक्तिजी की तरफ मुस्कुराकर कहा- मैडम आप भी चाय लेंगी क्या? अरे नहीं थैंक्स। अरे प्लीज लीजिए और वे चाय लेने को राजी हो गईं।

 

बातों का सिलसिला चल उठा। जी मेरा नाम विकास है। मैंने कम्प्यूटर्स में बीटेक किया है। इंफोसिस में 3 लाख के पैकेज में मेरा प्लेसमेंट हो गया। मुंबई पोस्टिंग मिल गई है। मैं लेखक और कवि भी हूँ । यदि आप कहें तो कुछ कविताऐं और कहानियाँ  आपको दिखाऊँ ? विकास बिना रुके बोले जा रहे थे, लेकिन अभिव्यक्ति एक शांत मुद्रा में बातों को सुन रही थी। बातों को सुनने के क्रम में उनकी आँखों की पलक ऊपर-नीचे हो रही थी और ऐसा लग रहा था कि पलकों का यह उठना-गिरना हमी को तौलने का क्रम है। 

 

चाय को खत्म करते हुऐ  उन्होंने कहा कि मैं हिन्दी में नहीं, इंग्लिश नॉवेल स्टोरी पढ़ती हूँ । अरे यह तो पूरी कहानी बिना उपसंहार के समाप्त हो गई। अब क्या इन्हें बताऐं? इन्होंने तो सारे किए-कराऐ पर पानी फेर दिया है, ऐसा विकास के मन में भाव उठ रहा था। 

 

उन्होंने अपनी असहजता को छुपाते हुऐ  कहा, जी बहुत अच्‍छा, आप अंग्रेजी नॉवेल पढ़ती हैं। आपके फेवरिट राइटर कौन हैं और उनके उपन्यास का क्या नाम है? अभिव्यक्ति ने बड़े शांत स्वर में जवाब दिया, जी विक्रम सेठ और उनका नॉवेल 'दि सूटेबल ब्वॉय' मुझे बहुत पसंद है। अरे ये तो बहुत बड़े राइटरों को पसंद करती है। विकास मन ही मन बुदबुदाऐ । लेकिन क्या इन्हें अभी तक सूटेबल ब्वॉय मिला? यह यक्षप्रश्न अभी तक जीव‍ित था। विकास बिना पलकों को गिराए हुऐ  अभिव्यक्ति के मुखारबिंदु पर आई हुई अभिव्यक्तियों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था और अभिव्यक्ति बिना इसकी परवाह किए हुऐ  किसी दूसरी दुनिया में लीन थी। 

 

जी सॉरी, टाइम काफी हो गया है। मैं सोना चाहती हूँ । अभिव्यक्ति ने बातचीत के क्रम को तोड़ते हुऐ  कहा। अरे, जरूर आप नीचे की सीट पर आ जाऐं । नहीं-नहीं, परेशान होने की जरूरत नहीं है। अरे, इसमें क्या परेशानी की बात। मैं आपकी सीट पर ऊपर चला जाता हूँ , आप नीचे आ जाऐ , आपको भोपाल उतरना है। 

और अंत में उन्होंने निवेदन को स्वीकार कर लिया और नीचे की मेरी बर्थ पर बेडिंग बिछाकर सो गई। मैं अब अभिव्यक्ति की सीट पर ऊपर आ गया था। नीचे देखने पर अभिव्यक्ति एक मौन शांत अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करते हुऐ  निद्रा में लीन दिखाई दे रही थी। मैं उनके शांत व सुंदर मुखड़े पर लिखी गई कहानी को पढ़ने का प्रयास कर रहा था।

 

गाड़ी ने काफी तेज रफ्तार पकड़ ली थी और गंतव्य की तरफ बढ़ रही थी। सामने के सहयात्री ने लाइट बुझा दी थी। अब सोना मेरी मजबूरी थी। अभिव्यक्ति की अनुभूतियाँ मानस पटल पर विद्यमान थीं। कुछ सोचते हुऐ  नींद आ गई।

 

नींद टूटी और जब गाड़ी विदिशा स्टेशन पर आई और सामने वाली खिड़की खोलकर नीले आकाश की तरफ नजर घुमाई तो बादलों और चाँद में लुकाछिपी का खेल चल रहा था। 'काले बादलों के बीच में चाँद कितना सुंदर लगता है', मन के कोने से आवाज आई। अरे ये बारिश होने लगी और चाँद बादलों में पूरा छिप गया। नजर अब बाहर निकले हुऐ  चाँद से हटकर नीचे की सीट पर आ गई तो यहाँ भी काले केसुओं के बीच चाँद मुस्कुरा रहा था। 

 

अरे, यहाँ भी चाँद निकला हुआ है। बिलकुल पूर्णिमा का। मन के एक कोने से आवाज आई। भोपाल आने वाला था। सतपुड़ा की बड़ी सुंदर पहाड़ियाँ, दूर-दूर तक फैले हुऐ  हरे-भरे खेत, पोखरें, चहकती हुई चिड़ियाऐं पेड़ों पर दिखाई दे रही थीं। कितने समय से ये सब चीजें हमसे दूर हो गई हैं। आज के महानगरों में स्मृतिप्राय-सा रह गया है ये पक्षियों का कलरव और शेष है महानगरों के रूप में केवल कांक्रीट के जंगल। 

 

चलो अभिव्यक्ति को उठा देते हैं। उन्हें भोपाल उतरना है। 'गुड मॉर्निंग, उठिऐ  अभिव्यक्तिजी, भोपाल आने वाला है', मैंने आवाज दी और 'गुड मॉर्निंग' कहते हुऐ  अभिव्यक्ति अपनी सीट से उठ खड़ी हुई। अच्छा किया विकासजी आपने उठा दिया और यह कह वे फ्रेश होने वॉशरूम की तरफ चल दी। थोड़ी देर में वे फ्रेश होकर वापस आ गईं। 

 

सूरज की गुनगुनाती हुई धुंध नई सुबह का आगाज कर रही थी, जो खिड़की से बाहर देखने पर बहुत सुंदर लग रही थी। लो भोपाल शुरू हो गया। अभिव्यक्ति अपने सूटकेस को सीट से बाहर निकालने लगी। मैं ऊपर आ गया और उनके सूटकेस को सीट से बाहर निकाल दिया। अरे काहे परेशान हो रहे हो? अरे इसमें परेशानी की क्या बात? मैंने धीरे से कहा। गाड़ी प्लेटफॉर्म पर खड़ी हो गई थी।

 

मैंने धीरे से अभिव्यक्ति से कहा, बुरा न मानें तो अपना पता दे दें। जी जरूर। उन्होंने लाल स्याही से लिखा- 'मिस अभिव्यक्ति शर्मा, भोपाल' और कागज मेरे हाथ में पकड़ा दिया। मैं उनको छोड़ने गेट तक आया। धीरे से 'बाय' कहा। उन्होंने हल्की-सी मुस्कराहट के साथ कहा- 'सी यू अगेन' और वह उतर गई। मैं चुपचाप उन्हें जाता हुआ देख रहा था, जब ‍तक कि वह नज़रों से ओझल नहीं हो गई। फिर आकर अपनी सीट पर बैठ गया।

 

मन के कोने में बार-बार विचार-मंथन हो रहा था कि माँ-बाप कितने दिनों से मेरे ‍वैवाहिक विज्ञापन अखबारों व पोर्टलों में दे रहे हैं। क्या बता दूँ  कि आज तलाश पूरी हो गई। अरे नहीं, सब हँसेंगे। चुपचाप मैं अपनी सीट पर बैठ गया। 

 

गाड़ी धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म छोड़ आगे बढ़ने लगी। नदी, पोखरे, लहलहाते हुऐ  खेत, सतपुड़ा की पहाड़ियाँ सब छूटने लगे, पर एक वस्तु संभालकर मैं अपने हाथों में पकड़े हुऐ  था। वह काग़ज का टुकड़ा था जिस पर लाल स्याही से लिखा था- 'मिस अभिव्यक्ति शर्मा, भोपाल'। चलो ईश्वर को इस बात के लिए शुक्रिया अदा करें कि अभिव्यक्ति अभी मिस है, मतलब सीधा था। स्कोप है।

 

अभिव्यक्ति के विचारों में खोया हुआ था और समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। और विचारों में भंग हुआ एक नया मैसेज बॉक्स में आ गया। मनचाही बात कीजिए, मनचाही फिमेल मित्रों से। सिर्फ 7 रु. प्रति मिनट के हिसाब से। अरे ये मैसेज कितने ही बार आ चुका है और ये दोस्ती तब तक बनी रहती है, जब तक क‍ि सैकड़ों का मोबाइल रिचार्ज खत्म नहीं हो जाता है। अभी सोच ही रहा था कि लीजिए मुंबई आ गया और मैं मुंबई स्टेशन पर उतकर ऑटो कर अपने फ्लैट पर पहुँच  गया। 

 

अभिव्यक्ति की अनुभूतियाँ अभी भी हृदय के कैनवस पर बिलकुल ताजा थीं। थोड़ा विश्राम करने के बाद फिर कागज का टुकड़ा हाथ में था। 'मिस अभिव्यक्ति शर्मा, भोपाल'। भोपाल बहुत बड़ा है। कैसे ढूँढेंगे इसे? फिर मन के कोने में आवाज आई- आओ चलो, फेसबुक पर सर्च करते हैं। और ये मिल गई अभिव्यक्ति शर्मा फेसबुक पर। ये सीनियर मैनेजर हैं आज तक में। व्यक्ति के साथ ही बायोडाटा भी बड़ा आकर्षक है। चलिऐ फेसबुक पर मित्रता का निवेदन भेज देते हैं। 

 

और मित्रता का निवेदन भेज दिया गया। लेकिन उधर से वॉर्निंग आ गई- 'हाऊ यू डेयर हू कॉन्टेक्ट' भी आगे से पोस्ट किया तो वूमन सेल में कम्प्लेंट करूँगी। बातें वूमन सेल में पहुँच  गई थी। कुछ खतरनाक संकेत लग रहे थे। चलो चुप रहते हैं।

 

अभ‍िव्यक्ति से मुलाकात हुऐ  एक हफ्ते से ज्यादा का समय बीत गया था, लेकिन यादें अभी भी ताजा थीं। उधर कुछ शुभ समाचार मुझे प्राप्त हो गऐ थे। मुझे मेरे द्वारा इंफोसिस में दिऐ  गऐ इंटरव्यू का परिणाम आ गया था और मैं इंफोसिस में मैनेजर के पद पर चयनित हो गया था। लेटर मेरे हाथ में था। दिल ने फिर कुलांचे भरी ‍कि चलो अभ‍िव्यक्ति को सूचित करते हैं, लेकिन ऐसे नहीं। कुछ कविता के साथ। सो एक कविता लिख डाली- इसे आप हटा सकती हैं। फेसबुक व व्हॉट्सएप से अपने नाम को, लेकिन कैसे हटाऐंगी इसे मेरे दिल से जिसके हर एक कोने पर आपका नाम लिखा हुआ है और नए अपॉइंटमेंट लेटर के साथ कविता अभिव्यक्ति के टाइम लाइन पर पोस्ट कर दी। 

 

मन में एक अव्यक्त डर था कि कहीं वूमन सेल वाले न आ जाऐं । अरे ये क्या? उधर से नई पोस्ट आ गई। यू आर वेलकम। अभि‍व्यक्ति ने मुझे फेसबुक फ्रेंड में एड कर लिया था। फेसबुक व व्हॉट्सएप मैसेंजर द्वारा हम रोज घंटों चैटिंग करते। लग ही नहीं रहा था कि अभिव्यक्ति और मैं 600 किमी की दूरी पर हैं। और ये बातचीत अब बढ़ते-बढ़ते मांगलिक संबंधों में तब्दील होने जा रही है। पिछले छ: महीनों में हम बहुत कुछ एक-दूसरे के विषय में जान गऐ थे। 

 

अभिव्यक्ति मेरे सामने बैठी है और हम दोनों अपनी मित्रता और आजीवन संबंधों के लिए किसी को 'थैंक यू' कहना चा‍हते थे। मैंने अभिव्यक्ति से कहा, सोचो अपनी इस आजीवन मित्रता के लिए किसे 'थैंक यू' कहेंगे?

 

अभिव्यक्ति ने कहा, जी आप भी सोचिऐ। फिर हम दोनों मुस्कुराऐ और जोर से चिल्लाए- 'थैंक यू फैसबुक'

 

(इस कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं और इसका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है।)

 

थैंक यू फैसबुक

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