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अमानुष
अमानुष
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© Priya Baranwal

Romance Tragedy

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कुछ ख़ास था उसमें, वह खूबसूरत नहीं थी पर उसके चेहरे पर एक चमक थी। उसकी आँखें बड़ी नहीं थी पर उनमें एक चंचलता थी। उसकी चाल हिरणी की तरह लुभावनी नहीं थी पर उसमे एक अदा थी, उसके होंठ गुलाबी नहीं थें पर उनपर एक शोर मचाती ख़ामोशी थी। उसके केश लंबे और घने नहीं थे पर उनमें एक नज़ाकत थी। पहली बार देखा था, तभी दिल के तार छेड़ गयी थी वो। हर सुबह और शाम एक ही बस की उसी खिड़कीवाली सीट पर बैठती थी। "रूपशी" नामक ब्यूटी पार्लर में काम करती थी। उसके बैग पर लगे बैच में तो यही नाम लिखा था। मैंने कभी उसका पीछा नहीं किया, डर था, कहीं वह मेरे बारे में कोई गलत धारणा न बना ले। हम दोनों एक ही बस स्टॉप से एक ही समय पर उसी बस से जाते थे और शाम को उसी बस से वापस लौटते थे, साथ में। सिर्फ उसका साथ पाने के लिए स्कूटर से ऑफिस जाने के प्रावधान को मैंने नज़र अंदाज़ कर रखा था। प्रतिदिन देर हो जाने के कारण सर से डाँट भी खाता था पर किसे परवाह थी। कई बार कोशिश की उससे बात करने की पर साहस नहीं जुटा पाया। उसके घर का पता भी ज्ञात हो गया था मुझे। साथ साथ चलकर तो नहीं, पर दूर से ही रास्तेभर मैं उसके साथ होता था। मेरा घर जो उसके घर के बाद आता था। पहले लगता था वो मुझपर ध्यान नहीं देती पर बाद में गौर किया तो अहसास हुआ, वह मेरे दिल के हाल से इतनी भी अनजान नहीं थी। कभी अगर मुझे कुछ सामान खरीदने या किसी परिचित से बात करने के लिए रास्ते में रुकना पड़ जाता था तो वो भी आगे कुछ दूरी पर जाकर किसी दुकान में या तो सामान देखने के बहाने रुक जाती थी या अपनी चलने की रफ़्तार मध्यम कर लेती थी।

मन से बहुत डरपोक थी वो। उस पतली सी सड़क को पार करने में दस मिनट लगा देती थी। सौ मीटर दूरी पर आती कार को देखकर बच्चे की तरह ठिठक जाती थी। मैं भी कोशिश करता था कि ऐसे सड़क पार करूँ कि मेरी आड़ में वो भी उस पार चली जाए। उसका यह अलहड़पन भी कातिल था। ये सिलसिला करीब छः महीने तक चलता रहा। अब तो वो मुझे देखकर मुस्कुराने भी लगी थी। इधर घर पर माँ ने भी विवाह की रट लगा दी थी। उन्होंने कई बार पूछा भी कि कोई लड़की पसंद हो तो बता दे पर मेरी स्थिति थोड़ी अजीब थी। लड़की होकर भी नहीं थी क्योंकि प्यार तो तब तक पूरा नहीं माना जा सकता जब तक दोनों ही पक्ष हामी ना भर दें। इन छः महिनों में जाने कितनी बार उसे अपनी पत्नी स्वीकार कर चुका था, कई बार कल्पनाओं में उसके साथ गृहस्थी बसा चुका था। किसी-किसी रात तो इतना बेचैन हो जाता था कि ठान लेता था, अगली सुबह उससे अपनी बात स्पष्ट रूप से कहकर ही रहूँगा। आखिर कमी क्या थी मुझमे ? और अगर ना करती है तो कर दे। लड़कियों की कौन सी कमी है ? कम से कम इस दुविधा से तो स्वतंत्र हो जाऊँ। पर यही 'अगर' डरा जाता था और उससे भी ज़्यादा डराती थी वो भीड़ जो बस स्टॉप पर हमारे साथ चढ़ती - उतरती थी और उसका कुछ हिस्सा हमारे साथ हमारे घर तक भी जाता था। डर लगता था कि कहीं मेरी बात सुनकर उसने शोर मचा दिया तो ये लोग मेरी भावनाओं को ही नहीं, मुझे भी कुचल डालेंगे, बदनामी होगी सो अलग।

इसी उधेड़-बुन में जी रहा था जब एक रात माँ ने हद कर दी। मेरे सामने कुछ लड़कियों की तसवीरें रखकर आदेश दे दिया कि उनमे से मैं एक को पसंद करके विवाह के लिए हामी भर दूँ अन्यथा वो स्वयं चुन लेंगी। मैंने रातभर सोचा और तय कर लिया कि एक बार तो अपनी किस्मत आज़माऊँगा। एक कोशिश उसके समक्ष जाने की तो करूँगा चाहे परिणाम जो भी हो। सुबह घर से थोड़ा जल्दी ही निकल गया ताकि उसके पहुँचने के पहले पहुंचकर थोड़ी हिम्मत जुटा लूँ और आसपास की भीड़ का जायज़ा भी ले लूँ, पर उसके आते ही मेरे हाथ पाँव फूल गए। मैंने तय किया, शाम को तसल्ली से बात करूँगा। वैसे भी सुबह सभी को काम पर पहुँचने की जल्दी रहती है। अगर उसने देर होने की बात कहकर टाल दिया तो पहला मौका आख़िरी मौका बनकर रह जायेगा। शाम को बस में २-३ सीटें खाली थी, उनमें से एक उसके बगलवाली भी, पर चाहकर भी बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। फिर से खुद को समझाया और आखिरी बार फिर से फैसला लिया कि बस स्टॉप से घर जाते वक्त बात कर ही लूँगा। पर उस दिन तो आधे घंटे का सफर जैसे आधे मिनट में तय हो गया। बस से उतरकर अपने घर का रास्ता लेने लगा पर ये क्या, मेरे तो पाँव ही ठिठक गए थे। जाने क्या हुआ, सड़क पार करने की जगह मैं पीछे मुड़कर अपने दोस्त के घर की तरफ बढ़ गया। मेरा दिल मनाने की कोशिश कर रहा कि ऐसे तो वो कभी मेरी नहीं हो पायेगी पर दिमाग मानने को तैयार ही नहीं था।

जब ये सारी बातें मैंने अपने दोस्त को बताई तो पहले तो वो हँसा पर फिर मुझे समझाया कि अपने मनोभाव किसी के प्रत्यक्ष रखना कतई गल़त नहीं है ख़ास तौर पर अगर उसके पीछे प्रयोजन सही हो और जब वो स्वयं भी संकेत दे रही है तो मुझे देर नहीं करनी चाहिए। मैंने अपने दोस्त से वादा किया कि कल या तो आर या पार करके ही दम लूंगा। अगली सुबह वो स्टॉप पर नहीं मिली। छः महीनों में पहली बार ऐसा हुआ था, सारा दिन मैं उसके नहीं आने का कारण तलाशता रहा। जब अगले दिन भी वो नहीं आयी तो तीसरे दिन मैंने ऑफिस से छुट्टी लेकर सुबह से शाम तक बस स्टॉप पर उसका इंतज़ार किया ये सोचकर कि कहीं उसके आने जाने का समय ना बदल गया हो। पर इससे भी उसकी कोई खबर नहीं मिल पायी। अंदर ही अंदर डर भी लग रहा था कि कहीं उसकी शादी तो नहीं हो गयी ? कहीं मेरा प्यार अधूरा ही तो नहीं दम तोड़ देगा पर फिर यह सोचकर दिमाग से बात निकाल दी कि ऐसा होता तो उसके घर के बाहर कोई तो सजावट और चहल पहल दिखती। एक दिन तो उसे देखने की इतनी तीव्र लालसा उठी कि उसके दरवाज़े के बाहर दस्तक देने पहुँच गया पर फिर कुछ सोचकर रुक गया।

करीब एक महीना गुज़र गया था उसकी एक झलक देखे हुए। एक दिन मैं सुबह बस लेने जा रहा था, दूर से मैंने उसके घर से किसी को निकलते देखा। मेरी धड़कन बढ़ गयी। मैं तेज़ क़दमों से से आगे बढ़कर उसके समीप पहुँचा तो हतप्रभ रह गया। यह तो वही थी पर आज, आज ना उसके चेहरे पर वो चमक थी ना ही आँखों में वो अदा, ना होठों पर वो बोलती ख़ामोशी और ना बालों में नज़ाकत। कुछ था उसके साथ तो उसके २ नए साथी - २ बैसाखियाँ। अचानक जैसे वो दिन मेरे मानसपटल पर चलचित्र की भाँती दौड़ने लगा जिस दिन मैंने इसे आखिरी बार देखा था। मैं जब दोस्त के घर से लौट रहा था तो पुलिस की गाड़ियाँ बस स्टॉप के पास खड़ी थी और लोग किसी दुर्घटना की बात कर रहे थे । पर मैं अपने मन की विडम्बनाओं से इतना घिरा था कि मैंने कुछ भी जानने समझने की कोशिश नहीं की थी।

उसने मुझे देखते ही एक छोटी - सी मुस्कान से मेरा स्वागत किया। उत्तर में मैं भी थोड़ा मुस्कुरा दिया पर मेरे पाँव थमे नहीं। मन में आया, कहीं मेरा हालचाल पूछना उसे मेरी दया ना लगे। बस में उसकी हमेशा वाली सीट आज भी खाली थी पर वो मेरी बगलवाली सीट पर आकर बैठी। उसे पहचानने वाले जो हर दिन उसके साथ सफ़र करते थें, उससे तरह तरह के सवाल पूछने लगें। उसके दिए जवाबों से मुझे ज्ञात हुआ कि उस शाम सड़क पार करते वक़्त एक तेज़ गति से आती हुई कार ने उसे टक्कर मार दी थी और उसकी टाँगे दूसरी तरफ से आती बस के पहियों के नीचे आ गयी थी। पूरे आधे घंटे के सफ़र में मैंने उससे कुछ नहीं कहा। शाम को भी मैं बिना रुके तेज़ रफ़्तार से घर चला गया शायद यह सोचकर कि जो अपने जीवन में इतनी बड़ी मुसीबत का सामना करके निकली हो उसके लिए अब सड़क पार करना कहाँ ही मुश्किल रह गया होगा। पश्चाताप से भरा था मैं। सारी रात सोचता रहा कि उस दिन मैंने अगर कायरता ना दिखाई होती तो आज ना सिर्फ़ उसके पाँव सलामत होते बल्कि आज वो मेरी होती। पर धीरे-धीरे यह पश्चाताप खुद ही कम होता चला गया। माँ की दिखाई तस्वीरों में मेरी रूचि बढ़ने लगी और मैंने स्कूटर से ऑफिस जाना शुरू कर दिया। कभी-कभी मन में आता कि इसमें उसकी क्या गलती है, आज भी इंसान तो वही है पर ये ख़याल भी मेरे पश्चाताप और ग्लानि की तरह बेवफा निकला। सच तो ये था कि दया भावना ने मेरे प्यार में मिलावट कर दी थी और पति पत्नी की के रिश्ते में दया की नहीं, प्यार और सम्मान की आवश्यकता होती है।

दो महीने बाद मैंने माँ की पसंद की लड़की से विवाह कर लिया। कभी कभार वो मुझे दिख जाती है, अपनी बैसाखियों के साथ। पर जब-जब वो मेरे समक्ष आती है, अपराध बोध महसूस होता है। मन धिक्कारता है ये कहकर कि उस दिन वो मुझे गुंडा-बदमाश समझकर शोर ना मचा दे, इस डर से मैंने अपनी राह बदल दी थी। पर आज, आज यह जानते हुए भी कि वो मुझसे घृणा करती होगी क्योंकि मैं भी औरों की तरह ही निकला, मेरा प्यार भी महज़ आकर्षण था, मुझपर कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा। कितना 'अमानुष' हूँ मैं।

अमानुष प्यार दर्द कहानी

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