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मेट्रो वाली लड़की
मेट्रो वाली लड़की
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© शुभेन्द्र सिंह SHUBHENDRA SINGH

Inspirational

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रोज की तरह आज भी मैं मेट्रो में अकेले सफर करने वाला हूँ , पहले मैं यह सफर अपने दोस्तों के साथ करता था तब यह 40 मिनट का सफर 4 मिनट जैसा लगता था लेकिन जब मैं अकेला होता हूँ तो यही सफर 4 घंटे का प्रतीत होता है, लेकिन इस सफर को फिर से 4 मिनट का बनाने में मेरा साथ देती है मेरी हमसफ़र मेरी किताबें, मेरी कहानियां।

आज का सफर भी मेरा कुछ ऐसा ही है, मैं हूँ और मेरे साथ में है मेरी नॉवेल मेरी एक और कहानी। मैं विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर हूँ यहाँ से मुझे अकसर मेट्रो में सीट मिल जाती है इसलिए क्योंकि यहाँ से कुछ मेट्रो रिटर्न होती हैं। स्टेशन पर मेट्रो आकर लगती है, दरवाजे खुलते हैं मैं मेट्रो में अंदर उस सीट पर जाकर बैठ जाता हूँ जो किसी के लिए आरक्षित नही होती। मैं अपनी सीट पर बैठ कर अपने बैग को पैरो के पास रखकर और अपनी कहानी शुरू करता हूं। मैं हिंदी नॉवेल पढ़ना पसंद करता हूं ये मैं इसलिए आपको बता रहा हूं क्योंकि आपको मेट्रो में सफर करते अक्सर कुछ तथाकथित 'एलीट क्लास' के लोग मिल जाएंगे जो आपको हिंदी की किताबें पढ़ते या हिंदी में कहानियां पढ़ते ऐसी नजर से देखेंगे जैसे कि हिंदी पढ़ने वाले गवार ही होते है और ऐसा मुंह बिचकाते है जैसे वो बड़े ज्ञानी हो और आप मुर्ख। खैर, ऐसा एक बार मैंने एक बड़े लेखक को यह कहते सुना है कि एक बार कानपुर आईआईटी में उनका वास्ता एक ऐसी लड़की से हुआ जो उनकी नॉवेल की 2 प्रतियां रखती थी एक हिंदी की और दूसरी इंग्लिश की। इंग्लिश वाली कॉलेज में पढ़ने के लिए या यह कहें दिखाने के लिए और हिंदी वाली प्रति घर पर पढ़ने के लिए या ये कहे कहानी को समझने के लिए।

मुझे हिंदी समझ में आती है और हिंदी को मैं, और हम दोनों को एक दूसरे का यह साथ अच्छा लगता है। खैर,अभी मैं अपने नॉवेल में सुधा और चंदर की कहानी में ऐसे खोया हूआ था कि मुझे वह रास्ते में पड़ने वाले 7 स्टेशन जो राजीव चौक तक पहुंचने में आते हैं जिनके बीच में लगने वाला दो-दो मिनट का समय मुझे 2 घंटे का लगता है वह आज मुझे पता नहीं चल रहा। 

सुधा और चंदर की मुलाकात एक रेस्टोरेंट में होने वाली है, सुधा चंदर को फोन करके रेस्टोरेंट का एड्रेस बताती है और वहाँ आने को कहती है ठीक 3:00 बजे। चंदर रेस्टोरेंट पहुंच चुका है लेकिन उसका फोन स्विच ऑफ है और वह सुधा को कॉल नही कर पा रहा है रेस्टोरेंट का नाम याद नहीं आ रहा है और वह उस जगह पर पहुंचकर वहां के सब रेस्टोरेंट में जाकर सुधा को ढूंढ रहा है तभी उसे पीछे से आवाज सुनाई देती है, "हेलो, मैं यहां हूँ "। पीछे मुड़कर देखता है सुधा बोल रही होती है । तभी मुझे मेट्रो की अनाउंसमेंट सुनाई देती है "अगला स्टेशन राजीव चौक है, दरवाजे दायीं तरफ खुलेंगे कृपया सावधानी से उतरे"। 

मैं एक हाथ में अपनी नावेल लिए दूसरे हाथ से बैग उठाता हूं और गेट पर जाकर खड़ा हो जाता हूं। राजीव चौक स्टेशन पर दरवाजे खुलते हैं, हमेशा की तरह आज भी यहां बहुत भीड़ है, मैं सीढ़ियों से ऊपर ब्लू लाइन पर नोएडा की मेट्रो के लिए ऊपर जाता हूँ और वहाँ जाकर आगे की लाइन में जहाँ करीब मेट्रो की दूसरी या तीसरी बोगी आकर लगती है, खड़ा हो जाता हूँ । वहाँ सीट तो नहीं मिलती लेकिन खड़े होने की जगह मिल जाती है मुझे पता है कि मुझे सीट नहीं मिलेगी इसलिए मैं ऐसी जगह चुनता हूं जहां खड़े होकर पढ़ते वक्त मुझे कोई डिस्टर्ब ना करें। मेट्रो के दरवाजे जिधर खुल रहे हैं उसके दूसरी तरफ के दरवाजे के पास मैं अपना बैग रखता हूं वहां बगल में लगे हैंडल और कांच से टिक कर खड़ा हो जाता हूं और अपनी कहानी पढ़ने लगता हूँ । 

भीड़ बहुत है, हमेशा की तरह। मैं अपनी कहानी में खोया हुआ हूँ कि तभी मुझे महसूस होता है कि कोई झूक के मेरी किताब का कवर पेज देखना चाह रहा है, मैं किताब को थोड़ा ऊपर उठाता हूं वह कवर पेज पर नाम पढ़ती है और बड़े अदब से कहती है "डार्क नाईट, हिंदी में, अच्छी है" कहकर मुझे एक स्माइल देकर कैरी ऑन कहती है। अच्छा लगता है मुझे ,इसलिए कि वह लड़की है ,और इसलिए भी कि शायद यह पहली है जिसने मुझे मेट्रो में हिंदी नावेल पढ़ते देख ऐसी प्रतिक्रिया दिया हो।

मुझे पता नहीँ क्यों ऐसा लगता है जैसे कि यह नजरें विश्वविद्यालय स्टेशन से मेरा पीछा कर रही है ,करीब साढ़े पाँच फीट लंबा शरीर ,दूधिया बदन ,बड़ी बड़ी आँखे ,लंबी नुकीली नाक ,चेहरे पर हल्की थकान लिए वो फॉर्मल ड्रेस में पैरो में काले जूते(ऑफिसियल) ,पीठ पर एक डैल का लैपटॉप बैग और हाथ में एक कोई नावेल 'हिंदी नॉवेल' लिए मेरे सामने खड़ी है ।अब मेरा ध्यान बट गया है थोड़ा सुधा और चंदर की कहानी में और थोड़ा अब शायद अपनी कहानी में, मैं हर एक पैराग्राफ पढ़ने के बाद ना चाहते हुए भी उसे देखता हूँ , वो भी मेरी तरफ देख रही है करीब उसी अंतराल पर जब मैं। अब थोड़ा आगे बढ़ने पर जब मेट्रो में सीट खाली होती है तो मैं खुद बैठने की जगह है उसे ऑफर करता हूं मगर वह एक स्माइल के साथ मना कर देती है और मुझे बैठने को कहती है, मैं बैठ जाता हूं। आगे चलकर मेरे सामने वाली सीट खाली होती है और वह भी बैठ जाती है। अब हमारी बातें हो रही हैं लेकिन सिर्फ आंखों से। मेरे बगल में एक कपल, हस्बैंड वाइफ और उनका एक करीब 4 साल बच्चा है ,वो बच्चा वहाँ बैठे सबको अपनी प्यारी बचकानी हरकतों से हँसा रहा है मुझे भी ,अच्छा लग रहा है, बच्चे पर प्यार आ रहा है लेकिन इससे ज्यादा अच्छा लग रहा है कि वह उस बच्चे को देख कर मुस्कुरा रही है, और कभी कभी मुस्कुराकर मेरी तरफ भी देख ले रही है ।

वह थोड़ा शर्मा रही है और मैं थोड़ा हिचक रहा हूँ ,वह भी चाहती है मुझसे बात करना और मैं भी। कहानी पढ़ते और उसे देखते देखते मेरा स्टेशन आ जाता है और जैसा कि हम करते हैं स्टेशन पर उतरने से पहले हम मेट्रो में अंदर ही अंदर बोगी चेंज कर लेते हैं, जिससे की उतर कर सीढ़ियों तक जाने के लिए हमें ज्यादा ना चलना पड़े , मैं भी ऐसा ही करता हूँ ,और वो भी मेरे आगे आगे चल रही है शायद उसे भी यही उतरना है। अब मेट्रो से उतर कर प्लेटफार्म पर हम दोनों धीरे-धीरे चल रहे है। अभी मैं आगे हूँ और वो मेरे पीछे शायद यह सोच के कि कुछ बातें हो वह मेरे पीछे पीछे आ रही है, मैं थोड़ा घबराया हुआ हूँ मैं चाहता हूं वह मुझे क्रॉस करें और आगे निकल जाये लेकिन वह भी बहुत धीरे चल रही है। हम दोनों सीढ़ियों पर होते हैं तभी पीछे से आवाज देती है, "तुम नर्वस हो क्या", 

"नहीं तो, क्यों क्या हुआ आईएम फाइन", 

"तो तुम उतरते वक्त बोगी चेंज करते करते मेरे पीछे-पीछे लेडीज बोगी तक क्यों आ गए थे" 

मैं हंसने लगता हूं और वह भी 

वो अपना हाथ आगे बढाती है "हाय, आईएम प्रिया" 

"अंकुर", 

"नाइस नेम"

"थैंक्स"

अभी मेरी दिल की धड़कन अपनी 'स्पीड लिमिट' के दोगुने गति से चल रही है। हम मेट्रो से एग्जिट करते हैं हमारा एक दूसरे से परिचय होता है, वह बताती है कि वह किसी मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जैसा कि उसके ड्रेस से भी लग रहा है , कि वह किसी कॉर्पोरेट कंपनी की एम्प्लॉयी है

"तुम क्या करते हो?" 

"मैं, मैं राइटर हूं, कहानियां लिखता हूं", 

"कैसी कहानियां" 

"वास्तविक कहानियां" 

"वास्तविक!"

"हां" 

"काल्पनिक क्यों नहीं ,तुम्हें कल्पना में विश्वास नहीं है" 

"नहीं, है लेकिन मैं वह लिखना पसंद करता हूं जिसे मैं जीता हूं या यूं कहें जिसे पाठक पढ़ते वक्त जीता हो" 

"अच्छा है, तो तुम एक राइटर हो मैंने सुना है राइटर दिल के बहुत अच्छे होते हैं" 

"हो सकता है, मैं अब अपने बारे में क्या कहूं" 

फिर हम बात करते करते ऑटो तक आ जाते हैं उसे भी सेक्टर 82 ही जाना है मुझे भी, 

रात के 9:30 बज रहे हैं सिर्फ एक ऑटो है वहाँ हम शेयर करके ऑटो से चलने को कहते है वो हमें बैठा कर चल देता है, हमारा एक दूसरे से परिचय चल रहा है बातें हो रही हैं करीब आधे रास्ते में हम पहुंच चुके हैं तभी ऑटो खराब हो जाती है, रात हो जाने की वजह से कोई और ऑटो दिख नहीं रहा और दूरी बहुत नहीं है, इसलिए हम पैदल चलने का सोचते हैं, वह कहती है "तुम अपनी कहानियां सुनाओ रास्ते कट जाएंगे" 

मैं उसे दो-तीन छोटी-छोटी कहानियां सुनाता हूं उसे अच्छा लगता है, वह कहानियों में खोई हुई है कि हम सेक्टर के गेट तक आ जाते हैं, उसे कहानियां सुनना अच्छा लग रहा है शायद इसलिए कि अभी वह अपने कॉरपोरेट लाइफ से थोड़ी दूर कहानियों के साथ कहानियों की दुनिया में है जो बेशक हमारी भागदौड़ भरी लाइफ से थोड़ी अलग है और सुकून भी दे रही हैं । 

उसे मेरी कहानियां अच्छी लगती हैं और शायद मैं भी। हमारा नंबर एक्सचेंज होता है, वो एक स्माइल के साथ "सी यू ऑन व्हाट्सएप्प, बॉय "कह कर वो अपने घर को चली जाती है और मैं परचून की दुकान से कुछ सामान लेने के लिए चला जाता हूं , घर जाता हूं खाना खाता हूं और फोन उठाकर व्हाट्सएप्प से उसे "हाय" मैसेज करता हूं , रिप्लाई तुरंत आता है "हेलो" जैसे वह मेरे मैसेज का इंतजार कर रही हो। खैर, हम दोनों की बातें होने लगती हैं काफी सारी बातें होती हैं, फिर वह कहती है 

"तुम कहानियां अच्छी लिखते हो और मैं तुम्हारी कहानियां पढ़ना नहीं तुम से सुनना ज्यादा पसंद करूँगी , खैर तुम वास्तविक कहानियां लिखते हो तो मुझ पर भी कोई कहानी लिखो" 

मैं कहता हूँ "लिखूंगा, पर अभी एक कहानी लिख रहा हूं वह पूरी होने के बाद" 

वह हंसने लगती है कहती है "सच में मेरे ऊपर भी कहानी लिखोगे" 

"तुम्हारे ऊपर नही ,'हमारे' ऊपर" 

वो हँसने लगती है , "सुनाओ क्या लिख रहे हो अभी" मैं उससे बताता हूं कि मैं एक ऐसी लड़की की कहानी लिख रहा हूँ जिसे मैं जानता नहीं, सिर्फ उसकी आवाज सुनी है मैंने, उसको देखा नहीं है" 

"हां! सच में? तो क्या लिख रहे हो जब जानते ही नही उसे तो , है कौन वो" थोड़ी उत्सुक है जानने को यह लड़की है कौन मैं उसे बताता हूँ कि वह मेरे सामने वाले फ्लैट में रहती है मैंने उसे कभी देखा नहीं है ,वह क्या करती है मैं जानता नहीं हूँ लेकिन मैंने उसकी आवाज सुनी है। हर रोज सुबह 6 बजे जब अखबार वाला अखबार फेककर जाता है तब वह सो रही होती है और मैं चुपके से रोज उसका अखबार चुरा लेता हूँ , और फिर आकर सो जाता हूँ, फिर करीब 8:00 बजे जब वह सो कर उठती है और आपना अख़बार नहीं पाती है तो चिल्लाती है और उसकी आवाज सुनकर मैं उठता हूँ। मेरे लिए वो अलार्म का काम करती है हाहाहाहा, मुझे अच्छा लगता है उसकी उसका यह चिल्लाना या यूं कहें उसकी आवाज। खैर, कहानी पूरी लिखकर मैं तुम्हें सुनाऊंगा। वह हंसने लगती है कहती है अब रात बहुत हो गई है तुम सो जाओ कल मिलते हैं। मैं सुबह 6:00 बजे का अलार्म लगा कर फिर सो जाता हूँ । रोज की तरह आज भी सुबह जब अलार्म बजता है , मैं उठता हूँ और आँखें मलता हुआ आधी नींद में जाकर दरवाजा खोलता हूँ और अख़बार उठाकर दरवाजा बंद कर रहा होता हूँ तभी मुझे ऐसा लगता है कि सामने वाले फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ है ,और कोई मुझे देख रहा है नजरें ऊपर उठाता हूँ तो सामने खड़ी होती है "प्रिया"

मैं पीछे मुड़कर भागता हूँ यह सोचकर कि आज मेरी चोरी पकड़ी गई, और वह हसकर दरवाजा बंद कर लेती है शायद यह सोचकर कि अगली कहानी उस पर ही लिखी जा रही है......

ऑटो अख़बार आवाज़

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