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एक रात उसके साथ
एक रात उसके साथ
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© सुनील धनखड़

Drama Inspirational Tragedy

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अंबाला रेलवे जंक्शन पर देर रात की ट्रेन लेट होकर रात को और ज्याद लंबी कर रही थी। तेजा को स्टेशन का भीड़-भड़ाका कभी पसंद नहीं रहा। इसलिए ट्रेन गुजरने वाले रास्ते के ऊपर बने पुल पर बीड़ी सुलगाते हुए उसने आखिरी प्लेटफॉर्म की तरफ कदम बढ़ाए। सीढियों से उतरकर आखिरी प्लेटफॉर्म का भी वो बेंच पकड़ा, जिसके के बाद नशेड़ियों-चोर-उच्चकों का इलाका शुरु हो रहा था। थोड़ा बहुत जोखिम लेना तेजा के लिए नॉर्मल था।

लोहे के बेंच पर बैठने के बाद फिर बीड़ी सुलगा ली। कुछ दूर मैली-कुचैली चद्दरों में भिखारी पड़े सो रहे थे। चाय की दुकान पर एक-आध खरीददार पहुँच रहे थे। रेलवे जंक्शन के कोने में मौजूद दुकान पर चाय खरीद रहे लोगों की हालत भी टी स्टॉल की तरह उजड़ी हुई ही लग रही थी।

तेजा सुट्टे में मस्त हो गया। जिस मंजिल के लिए वो निकला था लगभग नामुमकिन थी, लेकिन सपनों का पीछा करना तेजा की लत बन चुकी थी। इस वजह से दिमाग में कभी चैन नहीं रहा। बेचैन को सुकून चाहिए, लेकिन सुकून तो सच्चे संतों के माथे में ही होता है। बाकी तो तेजा की तरह भटकते रहते हैं। बीड़ी के कश भरते तेजा को अचानक पीछे से आई एक हल्की आवाज ने चौंका दिया। 'भईया जी २ दिन से कुछ खाया नहीं है'।

कहने को तो तेजा तेज आवाज से भी डरने वालों में से नहीं था, लेकिन वो इतनी रात में आखिरी प्लेटफॉर्म का आखिरी कोना पकड़ते वक्त उसे नशेड़ियों की नौटंकी का अंदाजा था। सो अचानक पीछे से आकर बेंच पर साइड में बैठ जाने वाली ३४-३५ साल की औरत की धीमी आवाज ने भी सकते में डाल दिया।

आदर्श ख्यालात टाइप कॉलेज के छोरे तेजा की आदत थी, भिखारी को माँगता देख पहले ही झटके में भारी आवाज निकाल चलता कर देना। लेकिन यहाँ मसला उलझा हुआ था। साड़ी और शक्लो-सूरत से औरत रईस तो नहीं लग रही थी, लेकिन भिखारी भी दिखाई नहीं देती थी। हालांकि ये जरूर लगता था कि वो घर से निकलकर सीधे यहाँ नहीं आई है। कई दिन भटकने जैसा हुलिया बना हुआ था। सो हालात भांपकर तेजा ने चौकस आवाज में कहा कि वो पैसे नहीं देगा, हाँ अपने पैसे से दुकान वाले को बोलकर चाय के साथ बिस्कुट का पैकेट दिला सकता है। लेकिन औरत का अंदाज चाय-बिस्कुट पाने तक सिमट जाने वाला नहीं था।

दुखियारी बनकर औरत ने कहा कि वो बहुत मुश्किल में है, कुछ पैसे दे दो। तेजा का दिमाग चकरा गया, क्योंकि ये औरत उस टाइप की भी नहीं लग रही थी, जो अक्सर अंधेरी रातों में नौजवानों को इशारे कर बुलाती हैं। ना ही कपड़े और सूरत इसके भिखारी होने पर मुहर लगाते हैं। तेजा ने चेहरा थोड़ा नरम करने की कोशिश करते हुए उससे पूछा कि वो स्टेशन के इस अंधेरे कोने में क्या कर रही है ?

धीमी आवाज में और ज्यादा दर्द लाते हुए महिला ने कहा कि बस थोड़े से पैसे दे दीजिए। तेजा ने पहले तो नजर घुमाकर चारों तरफ देखा। नजरें ये तसल्ली कर लेना चाहती थी कि कम रोशनी वाले स्टेशन के इस कोने में एक औरत के साथ बैठने पर दूसरों की नजरें उसे किसी अलग नजर से तो नहीं देख रही हैं, लेकिन तेजा को ये जानकर हैरानी हुई कि जैसे पहले एक-आध आदमी पास से गुजर था, जैसे स्टेशन कुछ देर पहले था, अब भी ठीक वैसा ही है। कुछ दूर चाय वाला वैसे ही चाय बेच रहा था, प्लेटफॉर्म के फर्श पर भिखारी और भिखारीनुमा बाबा वैसे ही करवटें बदल रहे थे। कुछ भी ऐसा नहीं था जो तेजा पर किसी भी तरह की उंगली उठा सके !

नए हालात देख कॉलेज के फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट तेजा थोड़ा रोमांच से भर उठा। ये रोमांच इस उम्र के लड़कों में खास हालात बनने पर खुद ही पैदा हो जाते हैं। तेजा भी दूसरे ग्रह का प्राणी नहीं था, सो उसे भी ये एहसास हुआ। अब जब आसपास के हालात किसी भी तरह बेंच के माहौल में खलल डालने वाले नहीं लग रहे थे, तो तेजा का खोजी दिमाग सवाल उछालने लगा। तेजा ने कहा कि वो पैसे तो दे देगा, लेकिन पहले वो औरत बताए कि इस हालत में यहाँ क्या कर ही है ?

पैसे मिलने की बात सुनकर या शायद ज्यादातर दूसरे लोगों के बर्ताव से तेजा की सीरत अलग पाकर औरत भी सहज और मिलनसार होने लगी। बताया कि वो बिहार के किसी जिले की रहने वाली है, मर्द बहुत बुरा आदमी था, घर के खर्च के लिए पैसे नहीं देता था, दारू पीता था। बच्चे खाने-खिलौनों के लिए हमेशा माँ को ही कहते थे, लेकिन पति के बर्ताव और नशेड़ी होने की वजह से वो घुट रही थी। एक रोज जेठानी से उसका झगड़ा हो गया, जब पति घर आया तो उसने बाल धोने के लिए शैम्पू खरीदने के पैसे माँग लिए ! शायद पहले ही जेठानी के सिखाए हुए नशेड़ी पति ने उसकी जमकर कुटाई कर दी।

ये कुटाई नई नहीं थी, लेकिन लंबे अरसे से उसके मन में जो बगावती ज्वालामुखी दबा बैठा था, उस रात फट पड़ा। पति को जवाब देना तो उसके बूते से बाहर था, लेकिन घर में सबकुछ पीछे छोड़ फिल्मी हिरोइन की तरह सीधे स्टेशन पहुँच गई, रोने-आँसू पोंछने का दौर चलने के बाद दिल को पत्थर बना लिया और आखिर में अंजान ट्रेन में कदम रख ही दिया। और आज यहाँ है।

बीड़ी के कश का असर, मच्छरों का काटना, पड़ोसियों की शक्की नजर का डर ! सबकुछ तेजा के दिमाग से भाग चुका था और उस औरत की बातें सुनकर घनचक्कर दिमाग और ज्यादा घूम गया। तेजा ने पूछा कि शैम्पू की खातिर पति ने पीट दिया तो क्या वो अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर घर से भाग आई ? बैक टू बैक तेजा ने पूछा उसने कितने दिन पहले घर छोड़ा था, क्या वो ट्रेन से सीधे अंबाला स्टेशन पर उतरी है ? उसका नाम क्या है ?

अति ज्ञानियों ने कहा है कि पराई औरत से अकेले में ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए वर्ना वशीभूत हो जाने की आशंका रहती है। तेजा तो अभी किशोर अवस्था पार कर ही रहा था। वो भी आधी रात और स्टेशन का अंधेरा कोना। उस पर पहली बार किसी अजनबी औरत को खुद के सामने याचक बनने का सामना कर रहा था। हालांकि तेजा बुद्धू बनकर जल्दी किसी का यकीन करने वालों में से भी नहीं था।

लेकिन तेजा के ४ सवालों की बौछार का सामना करने के बाद जिस दर्द व रिक्वेसट वाले अंदाज में औरत ने लब खोलने शुरु किए, तो यंग लड़के को लगने लगा अति ज्ञानियों ने हवा में पराई औरत वाला ज्ञान नहीं फेंका था ! लंबे बालों को हल्के से खुजलाते हुए अर्ध मैडमनुमा औरत ने खुद का नाम रश्मि बताकर घर छोड़ने वाला दिन याद होने से इंकार कर दिया।

रश्मि ने कहा सही याद नहीं शायद १२,१५ दिन हुए हो गए। पहली ट्रेन छोड़ने के बाद वो भटकती रही और फिर देर शाम सड़क पर पास से गुजरते ट्रक वालों ने उसे आगे छोड़ने के लिए कहा। कोई रास्ता ना देख वो ट्रक वालों के साथ चढ़ गई। फिर चलते ट्रक में उसके साथ वो सब हुआ, बार-बार हुआ जिसका टीवी न्यूज वाले ढिंढोरा पीटते रहते हैं। जब एक बार वालों का मन भर जाता तो उसे सड़क किनारे फेंक देते, कुछ देर बाद उसे कोई दूसरे उठा लेते। उसे दबोच कर वही सिलसिला शुरु हो जाता। मन भर जाने पर फिर उसे सड़क किनारे फेंक दिया जाता। उसे खुद भी याद नहीं अब तक कितनों ने उसके साथ वैसा काम किया है। अब उसे सड़क से डर लगता है, रेलवे स्टेशन पर भीड़ रहती है, कोई उसे उठाकर नहीं ले जा सकता है, इसलिए अब वो स्टेशन पर है।

रश्मि के मुताबिक रास्ते में किसी औरत ने उसे बताया था कि वो कुरुक्षेत्र जाए, वहाँ बड़े दानी लोग रहते हैं। उसका भला होगा। किसी से पूछकर बिना टिकट वो कुरुक्षेत्र से गुजरने वाली ट्रेन में चढ़ गई, स्टेशन चूक गया, सो कुरुक्षेत्र की बजाए वो अंबाला पहुँच गई। और हालत खराब होने की वजह से इसी बड़े स्टेशन पर पड़ी है।

रश्मि के चुप होने पर अवाक होकर सबकुछ सुन रहे तेजा ने दिमाग को झकझोरा। ज्ञानियों वाला पराई औरत का आकर्षण खत्म हो चुका था, सख्त दिखने वाले तेजा ने कहा कि वो उसे खरीदकर बिहार में उसके जिले तक का ट्रेन का टिकट देगा। साथ में खाना-खाने लायक पैसे भी देगा, वो अपने घर लौट जाए, लेकिन औरत तैयार नहीं हुई। उसने कहा कि अब उसे घर पर और इलाके में कोई भी नहीं अपनाएगा।

तेजा औरत पर हक से बोलने लगा, कहा कि बेशक लोग उसे ताने मारें, पर वो अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए लौट जाए। क्योंकि उन मासूमों का इस दुनिया में कोई पराया ध्यान नहीं रखेगा। और उसका पति तो पहले से नशेड़ी है। औरत ने कहा कि वो ऐसी गलती कर चुकी है, जहाँ से वापसी नहीं हो सकती। तेजा ने कहा कि वो उसके साथ चले वो, पहले वो कुछ खाना खा ले, फिर किसी डॉक्टर से उसे दवाई दिलाता है ताकि उसके शरीर में कुछ जान आ सके।

तेजा की बात सुनकर अब तक मन की बात बताने वाली रश्मि का चेहरा और अंदाज बदल गया। उसने धीमी लेकिन फैसला साफ कर देने वाली बात कही। औरत ने कहा कि वो स्टेशन के बाहर नहीं जाएगी। चाहे तेजा उसे पैसे दे या नहीं। ये बात और ये बात कहने का अंदाज देखकर लड़का समझ गया कि इस औरत को बहुत से लोगों ने रौंदा है, अब उसका भरोसा सबसे उठ चुका है, जो दरिंदगी उसके साथ की गई है, उसने रश्मि के दिल में डर बैठा दिया है। इसलिए वो अब तेजा पर भी भरोसा नहीं करेगी।

तेजा ने कहा कि अगर वो कुछ और दिन स्टेशन पर इस तरह पड़ी रही तो शायद मर जाएगी। लेकिन औरत पर इसका कुछ खास असर नहीं हुआ। उसने मुर्दा से हो चुके चेहरे को और ढीला छोड़ते हुए कहा कि वो बेशक मर जाए, लेकिन स्टेशन से बाहर नहीं जाएगी। ना ही वापस घर जाएगी।

तेजा ने मन में सोचा कि वो बुरी तरह फंस गया है, इस हालत में औरत को छोड़कर गया तो ये फिर गलत लोगों के हाथ पड़ जाएगी या फिर कुछ दिनों बाद मरने की हालत में पहुँच जाएगी। लेकिन साथ ही उसे ये एहसास भी हुआ कि वो खुद कौन सा चीफ मिनिस्टर है ? जो अचानक से इस औरत की जिंदगी को वाकई जिंदा कर दे। अंदर एक कोने में ये आशंका भी थी कि कहीं उसे आधी रात को चूतिया तो नहीं बनाया जा रहा है ?

बैठे-बैठे एक दौर बीत चुका था, तेजा की ट्रेन का वक्त नजदीक आ रहा था, खड़ूस तेजा का दिमाग कन्फ्यूज होकर तेजी से घूम रहा था। मन में ये भी आ रहा था कि अगर औरत सच बोल रही है तो खुद की बर्बादी की जिम्मेदार वो खुद ही है। इस तरह घर छोड़कर भागेगी तो ऐसा ही अंजाम होगा। लेकिन उसे वो वक्त भी याद आया जब घर पर झगड़ाकर तेजा खुद घर छोड़कर दिल्ली के एक आश्रम में पड़ा रहा था, घर से सन्यासी बनने की ठान कर निकला था, लेकिन ४-५ दिन बाद सुबह ३ बजे चुपचाप आश्रम छोड़कर वापस घर का रास्ता पकड़ लिया। उसके लौटने पर घर और पड़ोसियों ने उसकी गर्दन नहीं पकड़ी। बल्कि राहत की सांस ली थी।

तेजा के मन में आया क्या दुनिया है ! घर से भागा एक लड़का वापस आ जाए तो सबको चैन, लेकिन एक औरत के लिए उसी हालात में मौत से बदत्तर हालात ! अचानक तेजा के मन में कुछ दिन पुरानी एक बात कौंधी। रश्मि को वहीं बैठे रहने को बोलकर वो स्टेशन के मुख्य हिस्से की तरफ गया। कुछ लोगों से बात की। फोन निकाला कुछ देखा, फिर बात की। वापस आकर तेजा ने रश्मि से कहा कि यहाँ से कुछ दूर उस जैसी औरतों के लिए एक सरकारी महिला आश्रम है। हालांकि उसने रश्मि को बता दिया कि आश्रम के असली हालात क्या होंगे, वो नहीं जानता। लेकिन वहाँ उसे अपने जैसी दूसरी औरतें मिल जाएँगी, खाना मिल जाएगा। शायद कुछ इलाज हो जाएगा। इसलिए वो दानियों के भरोसे कुरुक्षेत्र जाने की बजाए दिन निकलने पर आश्रम जाए। और वहाँ जाकर सच बता दे। रश्मि ने इसके लिए ना नहीं कहा।

तेजा ने जेब से कुछ पैसे निकाले। रश्मि को देते हुए कहा कि उसे अब जाना होगा, इसलिए वो सुबह आश्रम चली जाए। और हो सके तो अपने बच्चों को याद कर घरवालों से संपर्क करे, अगर उसका पति-परिवार उसे अपनाने को तैयार नहीं भी होंगे, तो कम से कम उसके बच्चों को तो ये पता रहेगा कि उनकी माँ कहाँ है।

पक्का तो नहीं लेकिन तेजा को लग रहा था कि उसके जाने के बाद शायद औरत यही करेगी। फिर तेजा ने कहा कि वो जा रहा है! पत्थर सी हो चुकी औरत में हरकत हुई और अचानक आँखों में आँसुओं के साथ रश्मि ने तेजा के पैर छूने की कोशिश की। वो कुछ बोलना चाहती थी, शायद शुक्रिया ! लेकिन बोल नहीं पाई। पैरों की तरफ रश्मि के हाथ बढ़ते देख तेजा भी असहज हो गया।

तेजा समझ गया इस औरत को घर से भागने पर जिस्म लूटने और दुतकारने वाले लोग ही मिले हैं, शायद पहली बार तेजा ने ही उससे आत्मीयता से बात की है। इसलिए उसकी आँखों से निकला पानी उसी भावना का अंजाम है।

रश्मि को अपना ध्यान रखने की नसीहत देकर तेजा आने वाली ट्रेन के प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ चला। बीच में मुड़कर पीछे देख रहा था, रश्मि की नजरें अब थोड़ी उम्मीद भरी लग रही थी। जाते हुए तेजा के दिमाग में अति ज्ञानियों का एक और डॉयलाग घूम रहा था।

"हर सफर एक मंजिल के लिए शुरु होता है। लेकिन मंजिल की बजाए सफर को जीना चाहिए, क्योंकि अंजाम अच्छा या बुरा हो सकता है, लेकिन अगर सफर को जीने का सलीका आ गया तो फिर मकाम चाहे आपके हक में हो या खिलाफ, आप मस्त रहेंगे। लेकिन मुद्दा ये है कि रास्ते को जीने की इस कला में कलाकार बनना वक्त और कीमत का खेल है।"

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