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" ख़ामोश आँखों की ज़ुबानी "
" ख़ामोश आँखों की ज़ुबानी "
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© Sameer Khare Vishesh

Inspirational

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मैं हूँ छोटे से कस्बे में रहने वाला एक किशोर-चंद्रकांत। मैं एक छोटे से मध्यवर्गीय परिवार, जिसमें कि  कुल पाँच सदस्य हैं, का बड़ा बेटा हूँ। मेरे परिवार में माता-पिता के साथ मेरा छोटा भाई निर्मल और छोटी बहन मधु हैं। मेरे पिताजी एक सरकारी सेवा में पदासीन हैं और माताजी एक कुशल गृहणी हैं।

यह बात उस समय की हैं जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था। मेरी  छोटी बहन मधु आठवीं में और छोटा भाई निर्मल छठी  में पढ़ता था। पिताजी काफ़ी मितव्ययी, मितभाषी परन्तु सख्त थे।

एक बार वह जब अपने किसी सरकारी काम से  लखनऊ गऐ थे तो वहाँ से एक हस्तनिर्मित, नक्काशीदार, सुन्दर घोड़े की प्रतिमा ले आये। वह प्रतिमा बहुत ही खूबसूरत थी, दो टाँगो पर खड़ा एवं दो टाँगे हवा में लहराता हुआ काला घोड़ा काफ़ी आकर्षक लग रहा था। हम सबने पिताजी से उस अश्वप्रतिमा की क़ीमत जाननी चाही तो उन्होंने टालते हुए बस इतना कहा, "दुकान की सबसे महँगी मूर्ति है"- पिताजी ने उस प्रतिमा को बैठक में शान से रखवा दिया। सभी अतिथिगण आकर, प्रतिमा की प्रशंसा करना नहीँ भूलते थे।  कुछ दिन बाद की बात है, पिताजी कार्यालय गए थे और माँ पड़ोस की लता चाची के यहाँ गईं थीं। छोटा भाई छत पर खेल रहा था मधु विद्यालय गई थी। मैंने अपने दोस्तों को घर बुलाया और क्रिकेट खेलने का विचार बनाया। माँ ने घर से बाहर जाने से मना किया था, तो हम सब घर की बैठक में ही गेंद और बल्ला लेकर शुरु हो गए। आधे घंटे आराम से खेले ही थे कि जब बल्ला मेरे हाथ में था और एक दोस्त 'अर्जुन ' ने गेंद फेंकी.. मैंने तेजी से बल्ला घुमाकर गेंद मारी और अचानक गेंद सीधे जा कर उसी काले घोड़े की प्रतिमा में जा  लगी। गेंद के लगते ही अश्वप्रतिमा दो भागो में विभाजित हो गई। हम सब हतप्रभ रह गए और खेलना बंद कर के आनन-फानन में अश्व प्रतिमा को उठाकर यथावत जोड़कर वापस यथास्थान रख दिया। हम सब मित्र अंदर से डर गए थे। यह बात मैंने डाँट और मार की डर से किसी को नहीं बताई, और कुछ दिन बाद जब पिताजी उस प्रतिमा को साफ कर रहे थे तो उन्होने ये बात ज्ञात कर ली। वे बड़े गुस्से में थे और बारी-बारी से सबको बुलाकर उन्होंने पूछा। मधु  ने जानने से इंकार दिया, मुझसे पूछने पर, चूँकि मैं काफ़ी अधिक डरा हुआ था, मैंने पिताजी से झूठ बोलकर कह दिया, "पिताजी एक दिन निर्मल ने मूर्ति उठाने की कोशिश की थी और उसी से मूर्ति टूट गयी| निर्मल काफ़ी भोला-भाला, शांत स्वभाव का था और ऊपर से  उसकी तबियत अच्छी भी नहीं थी। वह कुछ बोल पाता इसके पहले ही पिताजी ने गुस्से में आव देखा न ताव और ज़ोर से एक तमाचा निर्मल के गाल पर रसीद कर दिया। निर्मल की ख़ामोश आँखे कुछ न बोल सकीं। निर्मल की आँखो में आँसू ज़रुर निकल पड़े और वह रोते हुए बस कहता रहा,  “पिताजी मैंने कुछ नहीं किया है, मूर्ति मैंने नहीं तोड़ी है।”  पिताजी का दिया हुआ कठोर तमाचा जाकर उसकी नाक के नीचे लगा और उनका एक नाखून शायद जाकर उसकी नाक के निचले हिस्से में चुभ गया, परिणाम स्वरुप वहाँ से ख़ून निकलने लगा। माँ ने फिर उसे चुप कराया.. चूँकि निर्मल पहले से ही बीमार था किन्तु अब और भी अधिक अस्वस्थ होने लगा। मुझे भी झूठ बोलकर बुरा लग रहा था पर ख़ुद पिताजी के क्रोध से बच जाने की संतुष्टि भी थी। कुछ दिनों तक निर्मल का इलाज आस-पास के डाक्टरों से कराया पर तब भी स्थाई राहत न मिलने से सब परेशान थे। उसकी तबियत में अब निरंतर गिरावट आ रही थी, वह और भी अधिक कमज़ोर और बीमार होता जा रहा था। उसकी नाक का घाव भी नहीं भर रहा था। अंततः पिताजी ने एक दिन शहर के लिए सामान बाँधा और हम सब छोटे भाई निर्मल के इलाज के लिए शहर के बड़े अस्पताल में गए। वहाँ पर जाँच होने पर डाक्टरों ने बताया कि निर्मल को अब कैंसर हो गया है और उसी की वजह से उसकी नाक का घाव ठीक नहीं हो रहा है। यह सुनकर हम सबके पैरों के तले की जमीन खिसक गई। मेरी आँखों से आँसू बह निकले और मैं अपने उस झूठ की सजा निर्मल को मिलने पर पछता रहा था। पिताजी को भी अपने उस दिन के क्रोध पर आत्मग्लानि हो रही थी, वह भी अत्यंत दुखी दिख रहे थे। निर्मल का वहाँ गहन इलाज चला, इस दौरान वह कुछ नहीं बोल सकता था, बस अपनी आँखों से सबको देखता रहता, ऐसा लगता था जैसे अपनी ख़ामोश आँखों की ज़ुबान से सबसे कहना चाहता हो कि मैंने कुछ नहीं किया पिताजी, मैंने मूर्ति नहीं तोड़ी...

 अंततः हम निर्मल को नहीं बचा पाए और कैंसर उसे निगल गया। मैंने मेरा छोटा भाई खो दिया। मैं दुःख और आत्मग्लानि के भाव में ख़ून के आँसू रो रहा था कि मेरी एक गलती ने मेरा निर्दोष, मासूम भाई मुझसे हमेशा के लिए छीन लिया।  मैं आज भी ख़ुद को माफ़ नहीं कर सका हूँ और जब भी यह सोचता हूँ तो निर्मल की ख़ामोश आँखों की ज़ुबाँ,मुझे यही कहती है "मैंने कुछ नहीं किया, मैंने मूर्ति नहीं तोड़ी है, भैया!"

और फिर मेरी आँखे नम हो जाती हैं ।.....

 

चंद्रकांत निर्मल खामोश आँखें जुबानी कैंसर अश्व प्रतिमा ग्लानि ...

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