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दादी का वो ख़त
दादी का वो ख़त
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© Jyotsana Pandey

Drama Inspirational

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"युद्ध से किसी का लाभ नही होता, बहुत गहरे घाव दे जाता है ये, ऐसे मर्ज़ जिनकी कोइ दवा नहीं होती......."

कॉलेज का दूसरा साल ख़त्म हुआ है। छुट्टियाँ चल रही हैं। हर साल की तरह, इस साल भी हम छुट्टियों में अपने गाँव आए हैं। मेरी दादी के घर। यहाँ मेरी दादी, चाचा और उनका पूरा परिवार रहता है। बड़ा ही शांत स्वभाव है दादी का। छोटा कद पर दिल बहुत बड़ा। बुढ़ापा ही है जो उन्हें कमज़ोर कर रहा है। कमर का झुकाव और घुटनों के दर्द के कारण अब पहले जैसा जोश और फुर्ती नहीं रही उन में। पापा की जब शहर मे नौकरी लगी थी तब दादी को भी अपने साथ शहर ले आए थे। सारी सुविधाएँ होने के बाद भी उन्हे शहर की आबो-हवा रास नहीं आई, वो फिर गाँव लौट आई। दादी की बहुत इज़्ज़त करती हूँ मैं, और उतना ही प्यार भी। कॉलेज मे आज भी छुट्टी होने पर इसी बात की सबसे ज़्यादा खुशी होती है कि अब दादी से मिलने जाने का मौका मिलेगा।

आज मैं दादी के साथ उनके कमरे में बैठी थी। दादी ने किसी काम से एक पुराना बक्सा खोला। वो कुछ ढूँढ रही थीं, चीजों को इधर-उधर टटोल रही थीं तभी मेरी नज़र अंदर रखी कुछ चिठ्ठियों पर पड़ी। मैंने उनसे उनके बारे मे पूछा। वो उनकी तरफ देखीं और कुछ समय के लिए कहीं खो सी गईं। कुछ समय के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया, फिर चुप्पी तोड़ते हुए बोलीं, “तेरे दादा के खत हैं ये।” मेरे उस एक सवाल ने कई पुरानी यादें ताज़ा कर दी होंगी। फिर वो थोड़ी देर बाद बोलीं, “सरहद पर से लिखा करते थे मुझे”। इतना कहकर उन्होंने बक्सा बंद कर दिया और कमरे से निकल गईं‌। दादा जी के लिखे हुए वो खत, बहुत ही अनमोल रहे होंगे दादी के लिए। खतों की बात करते हुए एक अलग चमक थी उनके चेहरे पर और शायद एक उदासी भी जो वर्षों से उनके सीने मे दबी हुई हैं।

दादाजी सन् 1971 की लड़ाई में शहीद हो गए थे। उनके बारे मे ज़्यादा कुछ पता नहीं है मुझे, कुछ बातें और कुछ बहादुरी के किस्से सुने हैं मैंने, और कुछ है मेरे पास तो वो है उनकी एक धुंधली सी तस्वीर। सेना के जवानों की ज़िंदगी आसान नहीं होती। देश की सुरक्षा के लिए सारे सुख त्यागने पड़ते हैं, पर इसका भी एक अलग ही सुख होता है। बहुत ही कम उम्र के थे पापा जब दादाजी का निधन हो गया। दादी ही थीं जिन्होने माँ और बाप दोनों का प्यार दिया। दो बच्चों को अकेले पालना इतना आसान नहीं रहा होगा। वो तो घर की एक दुकान थी जिससे कमाई हो जाती थी। अभी वही दुकान काफी बड़ी हो गई है जिसे अब चाचा सम्भालते हैं।

दोपहर के समय मैं अपने कमरे मे लेटी हुई थी। वो दादी का बक्सा तो काफी पहले ही बंद हो गया था पर वो चिठ्ठियाँ अभी भी मेरे दिमाग में घूम रही थीं, इसका कारण था उसी में रखा एक लिफाफा। वो सबसे अलग था, दिखने मे सबसे पुराना। अब लाज़्मी है कि चिठ्ठियाँ पुरानी तो होंगी ही क्योंकि सारी सन् 1971 के पहले की थीं, फिर भी वो कुछ अलग था। वो आधा फटा लिफाफा मुझे अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था। यही सब सोचते हुए कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। शाम को जब उठी तो दादी घर में नहीं थीं।कहीं बाहर गई थीं। वो सुनकर ये जानने की इच्छा नहीं हुई कि वो कहाँ गई होंगी, न ही मैंने किसी से पूछा पर ये सोचकर उत्साहित हो गई कि अब मै जाकर वो खत देख सकती हूँ। जानती थी कि ऐसे किसी और का खत पढ़ना सही नहीं है, पर मेरी जिज्ञासा मुझ पर हावी हो गई थी। मै फटाफट उनके कमरे में गई और दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। मैंने वो बक्सा फिर खोला। उन चिठ्ठियों को बाहर निकाला और देखने लगी। वो लिफाफा सबसे ऊपर रखा था। उस पे लिखी तारीख वो आखिरी तारीख थी जब दादी को उन्होने खत लिखा था, 30 नवम्बर 1971। मतलब वो खत सबसे पुराना नहीं था फिर भी शायद उसे कई बार खोला गया था इसलिए वो ऐसा लग रहा था। चिठ्ठी बाहर निकाली मैंने, उस खत के कागज़ पर कुछ निशान थे, थोड़ी सिकुड़न के साथ, ऐसे जैसे पेपर पर पानी गिरने से बनते हैं। वो देख कर पता चल रहा था कि कई बार उसे देख, उसे पढ़ते हुए रोयी होंगी वो।

मैंने चिठ्ठी पढ़ना शुरु किया। शुरु मे घर का हाल पूछा था, फिर अपना बताया। आगे लिखा था, ‘यहाँ हालात ठीक नहीं हैं। कभी भी लड़ाई छिड़ सकती है। यह कब तक चलेगा कुछ बता नहीं सकते पर भरोसा रखना हम हमारे देश का झंडा झुकने नहीं देंगे। जीत हमारी ही होगी।’ यह वो भावना थी जो उस समय वहाँ तैनात हर जवान के मन मे रही होगी।

सैनिक वो लोग होते हैं जो देश के लिए खुशी-खुशी अपनी जान दे देते हैं। खुद तो चले जाते हैं पर अपने पीछे अपने परिवार को दुःख मे छोड़ जाते हैं। वो माँ-बाप जिसका बेटा, वो पत्नी जिसका पति, वो बहन जिसका भाई, वो बच्चे जिनके पिता देश के लिए शहीद होते हैं, बड़े गर्व से उनके जाने का शोक मनाया करते हैं।

चिठ्ठी मे आगे लिखा था, ‘हो सकता है मै वापस ना लौटूं, तुम रोना मत। अपना और सबका ख्याल रखना। कमज़ोर मत पड़ना।’ उन्हे शायद नहीं पता होगा कि इन वाक्यों के साथ कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी वो दादी के कंधो पर दे गए थे।

युद्ध से किसी का लाभ नहीं होता, बहुत गहरे घाव दे जाता है ये, ऐसे मर्ज़ जिनकी कोइ दवा नहीं होती।

ये खत इसीलिए शायद इतना खास है दादी को, कई भावनाएं जुड़ी है इसके साथ।

युद्ध 17 दिसम्बर को ख़त्म हो गया था। एक और लिफाफा था बक्से में, ये सबसे नीचे रखा हुआ था, उस पर लिखी तारीख थी 21 दिसम्बर 1971। ये खत खोला भी नहीं गया था अभी तक। इसमे अलग ये था कि ये चिठ्ठी दादा जी ने नहीं लिखी थी। ये वो चिठ्ठी थी जो दादी ने उस खत के जवाब मे लिखा था। मैंने ये नहीं खोला। हिम्मत नहीं हुई। शायद दिलासा दिया होगा दादी ने, हिम्मत बढ़ाने की कोशिश की होगी, ये कहा होगा कि वो यहाँ कि चिंता ना करें, वो सब सम्भाल रही हैं। या कुछ और लिखा होगा। जो भी लिखा था, पढ़ने के लिए अब दादा जी नहीं थे। 17 दिसम्बर, लड़ाई ख़त्म होने के साथ ही इस घर का एक चिराग बुझ गाया था।

मैंने बक्सा बंद कर दिया और कमरे से निकल गई। बाहर आँगन में बैठी हुई थी, कुछ ही देर में दादी भी आ गईं। मुझे देखी और मुस्कुराईं फिर आ कर मेरे साथ बैठ गईं। कितनी अनमोल थी ये मुस्कान। ये वो मुस्कान थी जो अपने पीछे सारा दुःख दर्द, सारी कठीनाइयाँ बड़ी ही कुशलता से इतने सालों से छुपाती आई है। ये दुनिया और इसकी सच्चाई बहुत कड़वी होती है। हमारी कोई प्रिय वस्तु खो जाती है तो कितना बुरा लगता है ये हम ही जानते हैं, खाना नहीं खाते, किसी से बात नहीं करते, दूसरी लेने की ज़िद्द करने लगते हैं, पर दादी के पास तो उस समय ये विकल्प भी नहीं था। दोनो बच्चों की और एक बुढ़े पिता की ज़िम्मेदारी ने इन्हे कभी टूटने नहीं दिया। आज मेरे मन मे उनके लिए प्यार और इज़्ज़त और भी बढ़ गया। मैंने रोते हुए उन्हें गले लगा लिया। वो पूछती रही कि क्या बात है, पर मैं कुछ बोल नहीं पायी, और बोलती भी क्या, बस रोती रही।

देश बलिदान विरह

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