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न्यायालय
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© नवल पाल प्रभाकर दिनकर

Drama

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आज सभी ऑफिस के आदमी कोर्ट की तरफ दौड़े जा रहे हैं । आज यहां पर उनके चहेते पटवारी का फैसला होने वाला था । जो कि दस हजार रूपये की रिष्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था । कोर्ट लगभग दस बजे के आसपास शुरू हुआ । सभी कोर्ट में अपनी-अपनी सीटों पर जाकर अदब से बैठ गये । लगभग 10ः30 बजे करीब जज भी अपनी सीट पर आकर बैठ जाता है । उसके आते ही सभी अपनी-अपनी सीट छोड़कर उसके स्वागातार्थ खड़े होते हैं । कुछ देर सब जगह एक सन्नाटा-सा छा गया । उसके बाद जज ने बोलना शुरू किया -

जज - आज की कार्यावाही शुरू की जाये । आज का केस क्या है ?

रीडर - सर, आज ये केस पटवारी का है । जो अपने ऑफिस में पूरे दस हजार रूपये की रिष्वत लेते हुए पकड़ा गया है ।

जज - पटवारी को कठघरे में बुलाया जाये ।

पटवारी को कठघरे में बुलाया गया । पटवारी कठघरे में आता है, मगर उसके चेहरे पर जरा सा भी शर्म-लाज का भाव नही था । पटवारी के कठघरे में खड़े होते ही उसे गीता पर हाथ रखवा कर कसम आदि खिलाने वाली रस्म-रिवाज निभाई गई । उसके बाद वकील ने उससे पूछा -

वकील - सच-सच बताईये पटवारी, क्या आपने दस हजार रूपये की भारी रिष्वत लेने का अपराध किया है ?

पटवारी - हां जनबा । मैंने दस हजार रूपये लिये हैं ।

वकील - वो किसलिये ?

पटवारी - वो जनबा, इनका काम ही ऐसा था ।

वकील - ऐसा क्या काम था ?

पटवारी - अब आपको सब कुछ सच-सच बताने की गीता पर हाथ रखकर कसम जो खाई है, तो सब सच ही बताना होगा । सर, मैंने इन जनबा का इंतकाल इनके नाम चढ़वाने के लिए हैं ।

वकील - एक इंतकाल चढ़ाने की सरकारी फीस क्या है ?

पटवारी - जी ढाई सौ रूपये है ।

वकील - ढाई सौ रूपये है तो दस हजार रूपये लेकर तुमने भारी रकम रिष्वत ली है । मैं जज साहब से दरख्वास्त करूंगा कि वो अपनी सजा सुनाये, क्योंकि खुद पटवारी ने भी रिष्वत लेना स्वीकार कर लिया है ।

पटवारी - श्रीमान जी, सजा सुनाने से पहले मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं ।

जज - आपको कहने की इजाजत है ।

पटवारी - साहब, मैंने वो रूपये अकेले ही थोड़े खाये हैं । उनमें कुछ हिस्सा गिरदावर का था, जो उस इंतकाल को दुरूस्त करने की फीस है । और कुछ हिस्सा तहसीलदार साहब का, जो कि मंजूर करने की फीस थी । मेरे हिस्से में कुल मिलाकर दो हजार रूपये आये हैं । उनमें भी जनबा डी.सी महोदय को मासिक किस्त के रूप में कुछ-न-कुछ उपहार भेंट स्वरूप देना पड़ता है ।

वकील - तो फिर जज साहब, इनकी तो पूरी-की-पूरी तहसील ही भ्रष्ट हो चुकी है । इन सभी को सजा होनी चाहिए ।

पटवारी - जज साहब, आप किस-किस को सजा देंगे ?

जज - क्या मतलब है आपका ?

पटवारी - जब मुझे विजीलेंस वालो ने पकड़ा था तो उन्होंने मुझे छोड़ने के लिए एक लाख रूपये की मांग की थी । मेरे मना करने पर उन्होंने मुझे पुलिस वालों के हवाले कर दिया । पुलिस वाले आला-अधिकारी ने मुझे जेल से रिहा करने और मामला रफा-दफा करने के लिए पचास हजार रूपये की मांग की । वहीं पर थाने में मीडिया वालों ने अखबार और टीवी पर मेरे पकड़े जाने की सूर्खियां अखबार और टीवी पर ना दिखाने के लिए बीस-बीस हजार रूपये की मांग की । आज एक डीसी रेट पर काम करने वाले कर्मचारी से लेकर उच्च अधिकारी तक सभी लोग जिनको जहां पर रिष्वत लेने का अवसर मिलता है तो वे उस अवसर को हाथ से नही जाने देते । ओर तो ओर यह सरकारी वकील जो मेरे सामने मुझे सजा दिलाने की बात कर रहा है । इन्होनें भी मुझसे डेढ़ लाख रूपये की मांग की है ।

जज - वकील, मैं ये क्या सुन रहा हूं ।

वकील - अब मैं आपको क्या बताऊं ? मैंने तो इनसे ठीक ही मांग की है । पचास हजार आपके, पचास मेरे और बाकी के पचास हजार अन्य उच्च अधिकारियों के जो फिर से कोई कार्यावाही ना कर सकें ।

जज - (जज अपने मुंह से पसीना पौंछते हुए बोला) ये तुम क्या कह रहे हो ?

वकील - मैंने यह सब सही-सही कहा है । मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा । जब सारा देष ही भ्रष्ट है तो मैं भला पिछे क्यों रहूं । आज यदि हम इस देष से भ्रष्टाचार मिटाने की कोषिष करें तो भी इसे हम नही मिटा सकते, क्योंकि ये वो जहरीला पेड़ है जिसकी जड़े पूरी जमीन में हर जगह फैल गई हैं । इन्हीं जड़ों से पूरा वन गहराता जा रहा है । पेड़ कट जाने पर भी इसकी जड़ों से ओर पेड़ उग आते हैं । सो भ्रष्टाचार फैल चुका है ।

Corruption Justice Court

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