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मैं ओर मेरे पापड़
मैं ओर मेरे पापड़
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© Twinckle Adwani

Drama

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मेरा नाम कीर्ति है मगर मेरी कीर्ति को कोई समझ नहीं पाया शायद इसलिए मैं आज इतने सालों बाद अकेली हूँ, बेटी की शादी हो गई, बेटे ने लव मैरिज कर ली और बाहर ही रहने लगा पति जिन्होंने साथ जीने मरने की कसमें खाई है वह कभी-कभी घर को अपना समझ कर आ जाते हैं। उम्र के इस पड़ाव में हम अलग-अलग रहते हैं, कभी-कभी लगता है जीवन अकेले शुरू होता है और खत्म भी अकेले ही होगा। आज सुबह से फोन देख रही हूँ बार-बार मगर कोई आर्डर आया ही नहीं।

इस बड़े से घर में मैं अकेली हूँ। जब घर छोटा था तब लोग ज्यादा थे। जब मेरी शादी हुई तब हम चाल में रहते थे, मैं हैरान थी कि क्या सोचकर मेरे परिवार ने मेरी शादी ऐसे माहौल में की मैं उस जमाने की पढ़ी-लिखी लड़की मेरी इंग्लिश में बहुत अच्छी थी मेरी शादी जब तय हुई तुम्हें मैंने लड़के से कोई बात या मुलाकात नहीं हुई थी, वैसे उस जमाने में ऐसा होता भी नहीं था माँ-बाप लड़का देखते थे और बेटी को घूँघट से लादकर दहेज के साथ भेज देते एक विश्वास के साथ लड़की चली जाती थी, लेकिन अब कहाँ ऐसा बेटे ने शादी अपनी पसंद की लड़की से कर ली कभी-कभी मिलने आते हैं मगर मैं उन पर हक नहीं जमा पाती और ना वह मेरे साथ इतने कंफर्टेबल होते हैं और बेटी की शादी सबकी सहमति से हो गई।

जब मेरी शादी हुई तो मुझे कुछ दिनों तक अपने मम्मी-पापा के प्रति गुस्सा था फिर धीरे-धीरे मैंने किस्मत समझ कर स्वीकार कर लिया 20 घरों के बीच हमारा घर सब घर एक जैसे यहाँ सब सिंधी थे हर घर में 11, 12 लोग, हर वक्त आवाजें, कभी पानी नहीं, कभी बिजली नहीं, इतनी गर्मी।

मेरे साथ थी मेरी सासू माँ जिन्होंने मुझे बेटी की तरह प्यार किया मैं अक्सर उन्हें कहती मेरे मम्मी पापा ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया कि मुझे छोटे से घर में इस जगह भेजा वह हँसती थी मेरा बचपना समझ कर और कहती कुछ अच्छा सोच कर ही किया होगा फिर मुझे समझाती।

हमारे पास बहुत पैसे भी नहीं थे पति अक्सर बाहर रहते थे नौकरी के कारणघर के काम से फुर्सत होकर हम सब बाहर बैठते थे मगर मैं घर के अंदर अकेली सास कहती तुम कुछ करो तुम पापड़ अच्छे बनाती हो बनाओ, मुझे भी एक जोश आया मैंने पापड़ बनाए वह बहुत खुश हुई उस दिन हमारी चाल में पूजा थी। वह मेरे पापड़ लेकर सबको बता रही थी मेरी बहू ने बनाया अब खा कर देखो और सच में सब ने बहुत तारीफ की मैं ऑर्डर मिलने लगा हर सुबह पहला काम हमारा पापड़ बनाने का होता था। कुछ आमदनी भी होने लगी मगर बच्चों के लिए कुछ खर्च होते थे फिर भी बचत करके हमने एक प्यारा सा घर ले लिया उस चाल के माहौल मैं बहुत दूर रहने लगी मुझे बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार देने थे मैंने उनकी पढ़ाई का बहुत ध्यान दिया क्योंकि मुझे भी पढ़ने का बहुत शौक था बेटी पढ़ाई में अच्छी थी वह अपना हर काम खुद करती थी कभी उसने कोई डिमांड तकलीफ नहीं दी। बेटा भी होशियार था मगर बेटियां मां के ज्यादा करीब होती है उनका सुख दुख समझती है बेटी की शादी धूमधाम से हो गई वह एक बैंक में नौकरी करती है बेटा दिल्ली पढ़ने गया और वहीं का हो गया पति मिलने आते रहते हैं कभी सुख दुख छोटी-छोटी तकलीफ होती है तो मैं और मेरी सास मिलकर एक दूसरे का साथ देते हैं। मगर वह अक्सर बीमार रहने लगी उनकी सेवा में मेरा समय निकल जाता था ।वह हमेशा मेरी तारीफ करती है उन्होंने अंतिम सांसे भी मेरी गोद में ली वो एक ही थी जो मेरे पास, अंतिम सांस तक रही।

अब मैं फिर अकेली हो गई हूँ बच्चे जिनको अपनी दुनिया से ही फुर्सत नहीं मैं आज भी खुद ही कमाती हूँ और अपना हर काम अकेले करती हूँ।

शादी के बाद हर सुबह की शुरुआत पापड़ को बनाने से होती है मैं अभी भी पापड़ ही बना रही थी अकेले कुछ लोग मुझे अक्सर कहते रहते हैं क्यों साथ नहीं, क्यों पति साथ नहीं रहती मैं हमेशा कहती हूँ।उन्हें यहाँ मजा नहीं आता। लोग शक की नजर से कहते हैं देखते हैं कि अपने परिवार के साथ मजा नहीं आता उम्र के इस पड़ाव में तो हमें सच में एक दूसरे के साथ रहना चाहिए। कुछ दिन पहले आए थे दर्द था उनकी तकलीफ मुझसे देखी नहीं गई मैंने इलाज के लिए पैसे दिए मैंने अपनी सारी जमा-पूंजी दे दी मेरा कोई खास खर्च नहीं और अपनों को नहीं दूँगी तो किसको दूँगी ? लेकिन कई सवाल है जिनका जवाब मैं खुद नहीं जानती लोगों को तो मैं समझा देती हूँ कि पति की नौकरी के कारण मेरे साथ नहीं रहते मगर मैं खुद को कैसे समझाऊं कहीं कोई और घर तो नहीं बसा रखा हो भी सकता है ना जाने कितने रिश्तेदारों के यहाँ सगाई, कई बच्चे हुए, पार्टियाँ हुई, शादियाँ हुई और कभी कभी गमी।मगर वह नहीं आते सालों तक किसी से नहीं मिलते कोई कुछ नहीं कह पाता क्योंकि वह सामने ही नहीं आते। हर रिश्ता मैं और मेरे बच्चे ही निभाते आए हैं। आज भी एक गमी में गई थी वहां मेरे कजन ने सवालों भरी निगाहों से देखा तो मैं अंदर तक हिल गई।

विश्वास पर ही तो मैं इतने साल गुजारे फिर आज क्यों ? अरे तुम भोली हो तुम नहीं समझती दुनियादारी, भावना में बह रही हो जो साथ में ही नही रहते, जो सामने नहीं आते, हम सबसे मिले हमसे बातें करें तो हम उन्हें समझाएँ लेकिन नहीं वह तो सामने ही नहीं आते, तुम तो पागल हो की पूरी कमाई उसे देती हो, अरे कोई ओर नहीं पति है वो, वो भी तो कमाते है तो तुम तो उनसे लेती नहीं, पैसे बुढ़ापे के लिए तो कुछ पैसे अपने पास रख लो सुख दुख में काम आएँगे।

तुम्हारे पापड़ मैंने खाए बहुत अच्छे हैं उनमें कुछ लोगों को जोड़ो ताकि तुम्हारे बाद वह लोग इसे आगे बढ़ाएँ तुम्हारी कृति बढ़ाएँ।

इस उम्र में तुम अकेले इतना काम मत करो कुछ महिलाओं को अपने साथ जोड़ें ताकि उन्हें भी आमदनी मिल जाए तुम्हारा काम भी बढ़ जाए। जरूर अब कब मिलेगी ? जब तुम बुलाओ, तुम्हें नहीं अपने पति को क्या पता कोई और परिवार हो वह तो मैं बेवकूफ बना रहा हूँ अरे ऐसा मत कहो नहीं वह बहुत अच्छा है। मगर सच्चा तो नहीं तभी तो बस करो हाँ मत सुनो खुद जब विश्वास टूटेगा आँखों में चश्मा है काला हटेगा तब कुछ समझ में आएगा औरतें दिल से इतनी कोमल और सच्ची होती है कि सामने से देख कर भी कुछ सच्चाइयों को समझ नहीं पाती। प्यार और विश्वास के चलते हैं। स्वीकार नहीं कर पाती सच क्या है नहीं पता लेकिन कीर्ति का यूँ अकेले रहना 60 वर्ष की उम्र में मुझे समझ में नहीं आता यह विश्वास कहीं ना कहीं कोई तोड़ रहा है। मगर क्यों ?

आज कीर्ति ने चाल कि कई औरतों को अपने साथ जोड़कर एक रोजगार का अवसर दे दिया कई जिंदगियाँ संवारने की कोशिश कर रही है मगर उसकी अपनी जिंदगी सवालों के कटघरे में ही खड़ी है। मगर क्यों कीर्ति यूँही अकेले रहेगी पापड़ के साथ मगर क्यों ?

कहानी स्त्री पापड़ ज़िन्दगी परिवार संबल

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