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सन्नाटे की जुम्बिश
सन्नाटे की जुम्बिश
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© Arti Tiwari

Inspirational

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  शुक्ला जी बड़ी जानी-मानी हस्ती हैं। कस्बे की आलीशान बंगले के मालिक, आयकर विभाग के 

सेवानिवृत आला अधिकारी जो ठहरे!

   इन दिनों राजनीति में घुसने का जोड़-तंगोड लगा रहे हैं। आये दिन साहित्यिक गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में समाजसेवी का रुतबा लिए पहुँचते हैं।

 चंदे की महिमा ही न्यारी है!आख़िरकार दे- दे के साहित्य-जगत में एक विकट साहित्यकार की भांति अचानक प्रकट हुए।

   प्रबुद्ध वर्ग,जो उनके कार्यकाल के दौरान उनका सताया हुआ था, कौतुक से देखता रह गया।

      और लो जी आज.... उनके बंगले में एक विचार -गोष्ठी का आयोजन था। अन्यत्र किराया देने क्यों जाएँ,जब अपना इतना बड़ा बँगला पूरे का पूरा मौजूद है तो--'' क्यों हरीश बाबू, उनके होंठ बुदबुदाते' ''

 किसी ने ऐतराज न किया। गोष्ठी के मध्यान्तर में चाय-नाश्ते का प्रबन्ध व् समाप्ति पर रात्रि भोज का सुनहरा निमंत्रण पाकर साहित्यकार भी गदगद थे।

   अमूमन ऐसा होता कहाँ है कि कोई मेजबान खिलाये भी और खुली बहस का आमंत्रण भी दे। सोने पे सुहागा जान, न पहुँचने वाले भी और विशेष आमंत्रित महिला कवयित्रियां भी कि भोजन का झंझट नही करना पड़ेगा घर आके, ख़ुशी से दमकते चेहरे लिए समय पर पहुँच गए। 

   महिलाओं की दशा पर सदा व्यथित और चिंतित रहने वाले शुक्ला जी प्रायः अपना रोष व्यक्त करते रहते थे...कि आज़ादी के इतने वर्षों के पश्चात् भी हमारी महिलायें बेचारी दबी,सिमटी,सिकुड़ी ही रह गईं।'' गोया ऐसे जुमले तो उनके पेटेंट थे।

 अक्सर इन जुमलों को उछालने के बाद वे सभा में मौजूद महिलाओं को चीर-फाड़ डालने वाली नज़रों से निहारा करते! और इस प्रसंग से अनयमनस्क- सी हो आईं स्त्रियां विषय पे आने के लिए माहौल बनाया करतीं। 

     गुज़िश्ता नहीं, ये तो आजकल की बात है; जब महिलायें इस तरह की सभाओं में जाने लगी हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक इस कस्बे में ऐसे साहित्य के कार्यक्रमों में जाना फ़िज़ूल समझा जाता था। तब आर्द्रा शांडिल्य पुरुष समुदाय में एकमात्र महिला साहित्यकार हुआ करतीं थी। जो कि शुक्ला जी जैसे लोगों से बिना घबराये हर कार्यक्रम में निर्बाध रूप से जाती रही थीं। वो शुक्ला जी की इस बदनीयती को भली-भांति पहचान चुकी थी। अतः उनसे डरे बिना अपनी ठोस उपस्थिति दर्ज़ कराती थी।

   स्थानीय के अतिरिक्त प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी उस महिला ने साहित्य जगत में अपनी पहचान दर्ज़ करायी थी।

   शुक्ला जी को इस बात की भरपूर खुन्दक थी,जिसे वे गाहे-बगाहे --''आखिर तो आप स्त्री हैं ''-कहके अपनी कुण्ठा निकालने से बाज नहीं आते थे। सब सभ्य और भले लोग उनसे मन ही मन चिढ़ते थे, उनकी खोटी नियत की वजह से। पर चन्दा किसी को मुखालफ़त करने नहीं देता था। ... 

    आज की गोष्ठी का विषय स्त्रियोँ की आज़ादी पर केंद्रित था। थोड़ी देर से गोष्ठी की शुरुआत हो गई। विषय स्त्रियों की आज़ादी से सम्बंधित था,तो महिला साहित्यकारों की ओर से आग्रह आया कि शुक्ला परिवार की महिलायें भी इसमें शामिल हों। अपने परिवार की स्त्रियों की व्यस्तता का बहाना बना, शुक्ला जी बड़ी होशियारी से यह आग्रह टाल गए।

    सबने एक दूसरे को अर्थपूर्ण नज़रों से देखा। कार्यक्रम आगे बढ़ता गया... महफ़िल जमने लगी। 

   स्त्रियों की सामाजिक,आर्थिक सुरक्षा के अन्य मुद्दों को शुक्ला जी वक्ता को बीच में ही टोक बार -बार दैहिक स्वतन्त्रता पर ले आते थे।और घुमा-फिरा के स्त्री की यौनिकता का राग बार-बार छेड़ देते थे। इतने में ही चाय नाश्ता नौकरों से परोसवाने के लिये-- उनकी पीएच.डी. कर रही बहू ने जैसे ही अन्दर से झाँकते हुए पुकारा, "बाबूजी'' !

यह मधुर स्वर शुक्ला जी के कान में खौलते तेल की मानिंद महसूस हुआ... उनकी आँखें लाल हो गयी... जिससे उसे तुरन्त अन्दर जाने का संकेत मिला।

    उसके जाते ही वे दन्न से उठ के भीतर गए और दबे स्वर में अपनी पत्नी को कुछ सख्त हिदायतों की पोटली थमा लौटे।

   "परदे के पीछे का सन्नाटा सिसक रहा था, स्त्री की आज़ादी की मशाल उठाये"

  अभी किस्सा ख़त्म न हुआ था ! नाश्ते के बाद बोलने की अपनी बारी आते ही शुक्ला जी ने स्त्री की आज़ादी का खुला ऐलान करते हुए ,बात सीधे देह से आरम्भ की --"उसका मन जिससे चाहे रिश्ते बनाये, सम्बन्ध रखे अपनी मर्ज़ी से , उसकी देह उसकी मर्ज़ी का पुरुष होना चाहिए "। हमारे समय में इतनी आज़ादी नहीं थी ।साहब एक ही कक्ष हुआ करता था ,उसी में सब था,वही रसोई घर था,वही बैठक कक्ष था,वही मेहमान कक्ष था,वही......फिर महिलाओं पे लगातार लोलुप नज़रें गड़ाये बात को बीच में हल्केपन की पराकाष्ठा पे ले जाते हुए कहा,समझ रही हैं न आपलोग?

   माहौल एक बोझ सा महसूस कर रहा रहा था।पर कोई कुछ बोल नही रहा था।

   एकाएक आर्द्रा ने ख़ामोशी तोड़ी-- हो गई न आपकी बात पूरी ?  --सच कहा आपने स्त्री को अपनी देह और अपने विचारों पे पूरा हक़ है कि इसके दायरे में कौन आये --दिख रही है आज़ादी जो झाँक रही परदे के पीछे की दुनिया से,..घूँघट की ओट से बाहर आके कराह रही ..नंगी सच्चाई,तोड़ रही दम सिसक-सिसक के आज़ादी.. उन औरतों की जिनकी ज़ुबान तो है पर शब्द-रहित कितनी शर्मिनदगी झेल रही वो अज़ादी ...जो आपकी कामुक नज़रों को भेदते देख रही हमारे जिस्म..जमीन तलाश रही गड़ने को कि आप उनके सरपरस्त हैं, सरमाये हैं।इससे तो रास्ते चलता वो अनजाना मर्द भला है जो हमारा पल्लू बेध्यानी में ढलक जाने पे नज़रें हटा लेता है। वो अनजान ऑटो वाला जो हमें सुरक्षित घर छोड़ जाता है,पता गुम जाने पर हाँ हमें आज़ादी चाहिए। सुरक्षा चाहिए पर उनसे नहीं जो हमारे आसपास हैं। हमें आज़ादी चाहिए आप जैसे लोगों से ,जो हमारे बीच रह कर हमें छल रहे। हमें आज़ादी चाहिए आप जैसे ठगों से,आपकी काम-लोलुपताओं से,वो घूँघट वालियाँ घुटी आवाज़ में कह रही हैं, उन्हें आज़ादी चाहिए आपसे ताकि ये पर्दा हटे और वे यहाँ हमारे पास बैठ सकें।

उन्हें आज़ादी चाहिए आपके अंदर की इस घिनौनी भूख से --"ताकि वे बिना शर्मिंदगी के हमारी आँखों में आँखें डाल हमसे बात कर सकें " --उठ-बैठ सकें हमारे बीच ये जता सकें कि उनके इस बँगले में हमें किसी से कोई खतरा नही है।

     अगले दिन स्थानीय पेज पर अख़बारों की सुर्खियां "बँगले की भोज--सामग्री जानवरों को खिलाई गई।"सभी ने घर आके खिचड़ी बना ली या कुछ और पर भूखा कोई नहीं सोया। उस दिन के बाद से आज़ाद हैं कस्बे की औरतें,अपने विचारों की स्वतंत्रता के लिए अब नही सिसकता सन्नाटा परदे के पीछे घूँघट की ओट से........

  #POSITIVENDIA

औरत आज़ादी समानता कुत्सित सकारात्मक क्रांति

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