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अमीरों की इमारतें, गरीबों की नीव
अमीरों की इमारतें, गरीबों की नीव
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© Jyotsana Pandey

Abstract Crime Others

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“कैसी चाय है साहब?”

“चाय... हां हां अच्छी है‌‌।” खोया हुआ नीरव ये सवाल सुन फिर होश में आया।

“कहां खोये हुए हैं साहब? कुछ देर के लिये सब कुछ भूल कर सिर्फ चाय के मजे लीजिए।”

नीरव चुपचाप चाय पीने लगा।

अगले दिन वो फिर वहीं गया चाय पीने।

“ए छोटू, एक चाय ला।” वो वहीं बेंच पर बैठ गया।

“नाम क्या है तेरा?” नीरव ने उससे पुछा।

“राजू नाम है मेरा। आप चाय पीजिये, मैं बाकी जगह दे कर आता हूं।”

14-15 साल का ये लड़का सिर्फ दिखता ही छोटा था क्योंकि खुद का पेट पालने वाला इंसान कभी छोटा नहीं हो सकता। पैसा अक्सर इंसान को बेबस कर देता है।

“क्या हुआ साहब परेशान हो?”

“हां थोड़ा हूं।” नीरव ने धीरे से कहा। “नौकरी नहीं मिल रही, बस उसी की तलाश चल रही है अभी।”

नीरव ने अभी-अभी अपनी पढ़ाई पूरी की थी और अब नौकरी की तलाश में इधर-उधर के चक्कर काट रहा था। राजू एक चाय की दुकान में काम करता था।

“तू यहां कब से काम कर रहा है?” नीरव ने राजू से पूछा।

“दो साल हो गये साहब।”

 दोनों की बात हो रही थी इसी दौरान एक भिखारी बच्चा वहां आया। उसकी हालत बहुत खराब थी। दुकान का मालिक वहां नहीं था, राजू ने दाएं-बाएं देखा और एक जार खोल कर एक बिस्कुट निकाल कर उस बच्चे को देकर उसे वहां से भगा दिया। नीरव देखता रह गया। तभी राजू बोल, “ऐसे क्या देख रहे हैं साहब, मुझे पता है साहब आप मालिक को नहीं बताएंगे।” नीरव हँस पड़ा, कितने भरोसे के साथ उसने ये बात कह दी थी।

“तुझे कैसे पता मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगा, अगर मैंने बता दिया तो?” नीरव किसी को बताता नहीं फिर भी मस्ती में उसने राजू से पूछा।

“क्योंकि साहब मैंने एक अच्छा काम किया है, ये तो आपको भी पता है और इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हुआ फिर आप क्यों बोलेंगे किसी को।”

“हां, बात तो तेरी सही है।” नीरव हँस पड़ा।

“आज मैंने किसी की मदद की है, मेरी मां बहुत खुश हो जायेगी” राजू के चेहरे की खुशी साफ पढ़ सकता था नीरव।

नीरव का अब वहां रोज़ का आना-जाना हो गया था। उसे एक अच्छा दोस्त मिल गया था, उसके अकेलेपन को एक साथी मिल गया था, राजू।

जिस रोड पर उसकी दुकान थी उसी के सामने एक मॉल था, जब काम नहीं होता था तब अकसर नीरव ने राजू को चुपचाप बैठे उसकी तरफ देखते पाया था “क्या देख रहा है राजू, वहां जाने का मन है? चल मैं ले चलता हूं तुझे। उठ चल...” अभी नीरव की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि राजू चिल्ला पड़ा, “नहीं जाना है मुझे कहीं।” और वहां से उठ कर चला गया। नीरव को कुछ समझ नहीं आया कि उसने ऐसा क्यों किया। थोड़ी देर में नीरव भी वहां से चला गया। कुछ दिन बीत गये पर वो चाय पीने नहीं आया। राजू अपने साथी को याद कर रहा था, अब आदत जो हो गयी थी उसे उसकी।

तीन दिन बाद वो फिर मिले। “क्या साहब इतने दिन कहां थे, चाय पीनी कम कर दी क्या।”

“नहीं, बस थोड़ा व्यस्त था। अरे बहुत खुश हूं आज मैं, नौकरी लग गयी मेरी।”

“क्या बात कर रहे हो साहब, बधाई हो। अब तो आना बंद ही कर दोगे यहां, फिर मैं अकेला हो जाऊंगा।”

“अरे चिंता मत कर, तेरे से तो रोज़ मिलने आऊंगा मैं। ये जो मॉल है न, इसी में लगी है।”

ये सुनते ही राजू के चेहरे के भाव बदल गये, जहां पहले खुशी थी वहां अब गुस्सा और चिड़चिड़ाहट था। नीरव उसके इस भाव को साफ पढ़ सकता था।

“तू इस मॉल का नाम सुन कर गुस्सा क्यों हो जता है, कुछ बात है तो बता मुझे।” नीरव ने उसके ऐसे व्यवहार का कारण जानने की कोशिश की पर राजू ने बात टाल दी, “मैं कहां गुस्सा हूं साहब, मैं तो बहुत खुश हूं कि आपकी नौकरी लग गयी। अच्छा साहब आप चाय पीजिये मैं अपना काम कर के आता हूं।” ये कहकर वो वहां से चला गया। नीरव कुछ समझ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर में राजू लौटा, उसका मालिक भी वहां आया और राजू को डांटने लगा। बहुत गुस्से में था वो। अपनी भड़ास निकालने के बाद उसने राजू से एक चाय मांगी। गिलास में एक मक्खी थी, राजू ने वह देखा पर गुस्से में उसी में चाय डाल दी। नीरव ये देख कर हंस पड़ा, राजू को भी हँसी आ गयी, फिर वो बोला, “ मुझे पता है साहब आप किसी को कुछ नहीं बतायेंगे।” नीरव अभी भी हँस रहा था और राजू वही चाय मालिक को दे आया।

एक रोज़ उस मॉल में काफी सजावट हो रही थी, सब बहुत व्यस्त थे, नीरव जब उस दिन चाय पीने आया तो राजू ने उससे उस बारे में पुछा। “कल इसका मालिक आ रहा है, वो विदेश में रहता है और कल बहुत दिनों बाद यहां आ रहा है, बस उन्हीं के स्वागत की तैयारियां चल रही है” नीरव ने उसे बताया। ये सुन राजू का मानो खून खौल उठा। वो चुपचाप उस मॉल को देखता रहा। नीरव ये सब देख रहा था, पहले भी उसने राजू के इस व्यवहार को समझने की कोशिश की थी पर नाकाम रहा इसीलिए इस बार उसने उससे कोई सवाल नहीं किया। कभी-कभी राजू उसे एक पहेली सा लगता था, जिसे वो सुलझाने की बहुत कोशिश करता पर उतना ही उलझता चला जाता था।

राजू बाकी जगह चाय देने चला गया। जब वह लौटा तो उसके हाथ में पैसे थे।

 “आज मैंने अच्छा कमा लिया है, मां खुश हो जायेगी।” उसके चेहरे पर बहुत सुकून था, खुशी थी। ये सब देख नीरव को बहुत अच्छा लगा। राजू कई बार ऐसे अपने परिवार का जिक्र किया करता था।

“तू बहुत अच्छा है, बहुत मेहनती भी, तेरी मां तो वैसे भी तेरे से बहुत खुश होगी” नीरव बोला। राजू मुस्कुरा रहा था। “वैसे तू रहता कहां है? बता तो, कभी मैं भी तेरे परिवार से मिलने आऊंगा।”

एक व्यंग्य वाली मुस्कान के साथ राजू ने उसे देखा, उसकी वो निगाहें नीरव को चिढ़ा रही थीं। फिर वो बोला, “आप नहीं मिल सकते साहब।”

 “अरे! क्यों नहीं मिल सकता?”

“बस कहा ना नहीं मिल सकते” चिड़चिड़ाहट के साथ राजू बोला और वहां से जाने लगा।

“ठीक है नहीं मिलेंगे, गुस्सा क्यों होता है। पर मिल क्यों नहीं सकते, क्या वो मुझे देख कर खुश नहीं होंगी?”

“क्योंकि मरे हुए लोगों से कोई नहीं मिल सकता।”

राजू का वो जवाब सुन नीरव के पैरों तले मानो ज़मीन खिसक गई, उसे ऐसा झटका लगा की उसके मुंह से कोई आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। वो कभी सोच भी नहीं सकता था कि जिसके साथ वो इतने समय से था और जो अपने परिवार की अकसर बातें किया करता था उसका वो परिवार इस दुनिया में है ही नहीं। उसे समझ नहीं आ रहा था वो क्या बोले।

“तूने मुझे पहले कभी कुछ क्यों नहीं बताया?”

राजू खामोश था। उसकी सिर्फ जुबान खामोश थी, उसकी गहरी सांसें और आंखों की नमी काफी कुछ बयां कर रहे थे। गाड़ियों के शोर और बाज़ार के उस कोलाहल में भी बहुत खतरनाक सी शांति थी दोनों के बीच। ये चुप्पी राजू की सिसकियों के साथ टूटी।

“सब खतम कर दिया, दुनिया तबाह कर दी इन कातिलों ने मेरी। मेरे मां-बाप को मुझसे छिन लिया, मेरी छोटी सी बहन को भी नहीं छोड़ा, उसका क्या कसूर था।” इन शब्दों के साथ उसने मन का वो दर्द बयां करना शुरु किया जो इतने समय से उसके सीने में दबा हुआ था। उसकी आंखों से मानो खून के अश्क बह रहे थे। नीरव उसके पास गया और उसे गले से लगा लिया। नीरव बस कस कर उसे पकड़ा रहा, इससे उसकी कोई मुश्किल तो हल नहीं हो रही थी न ही जो हो चुका उसे बदलने की ताकत रखता था ये पर जब कोई इंसान टूटने लगता है ना तब प्यार, भरोसा और सुरक्षित होने भाव ही है जो उसके टुकड़ों को जोड़े रखता है। राजू उससे लिपटकर फूट-फूट कर रो रहा था। फिर धीरे-धीरे उसने अपने अतीत के सारे पन्ने बिखेर डाले नीरव के आगे।

“दो साल पहले यही पर मेरा घर था... नहीं... हमारा घर था, वो दिख रहा साहब, वहां जो मॉल की पार्किंग है, वहीं पर। बहुत सारा घर था यहां पर….” बहुत बेचैनी थी उसमें, एक पागलपन था।

“हम लोग सब मजदूरी करते थे। मैं पढ़ना चाहता था। कुछ बड़ा बनना चाहता था। बाबा का सब बहुत सम्मान करते थे। कोई भी परेशानी होती तो इन्हीं के पास आते थे सुलझाने के लिये। मेरी एक दो साल की बहन थी। बहुत प्यार करता था मैं उससे, हमेशा आई को बोलता था कि जब वो बड़ी हो जायेगी तो कभी उसकी शादी नहीं करेंगे, हमेशा अपने पास ही रखूंगा।” उसने अपने दोनों हाथ अपने सीने से लगा रखे थे, मानो वो अपनी उस छोटी सी बहन को गले लगा रहा हो। नीरव चुप-चाप उसकी बातें सुन रहा था।

“फिर एक दिन कुछ लोग आये, बोला की ज़मीन खाली कर दो, यहां पर एक मॉल बनेगा, बदले में पैसा देंगे। बोला कि काम भी देगा, वो मॉल बनाने की मजदूरी हमसे ही करायेगा। ऐसे कैसे हम लोग ज़मीन खाली कर देते। मना कर दिया सब ने। वो फिर आये, इस बार कोई बड़ा साहब था साथ में, पहले प्यार से बोला जब हम लोग माने नहीं तो धमकी दिया की जान से मार देंगे। बाबा निकल कर बोले कि नहीं खाली करेंगे हम ज़मीन, जो करना है कर लें। ये सुन कर वो और कुछ नहीं बोले... चले गये सब वहां से। उस शाम एक-दो घंटे तक सारा आदमी लोग इकट्ठा हो कर यही सब चर्चा कर रहे थे। फिर हम घर को जाने लगे। मैं, बाबा और काका एक साथ जा रहे थे। घर से थोड़ा दूर थे तभी दिखा घर के आगे भीड़ जमा हुई है। हम लोग भाग के वहां गये। बाबा घर के अंदर गये पर काका ने मेरा मुंह दबा के मुझे वहीं रोक लिया। अंदर... अंदर बिल्डर के आदमी थे...” राजू की आंखों में खौफ और गुस्सा एक साथ दिख रहा था। वो थोड़ी देर चुप रहा। उस खौफनाक मंज़र का वो दृश्य उसकी आंखों के सामने एक बार फिर जीवित हो उठा था।

 “फिर... फिर क्या हुआ राजू?”

 “मेरी बहन ज़मीन पर एक कोने में पड़ी रो रही थी, बहुत रो रही थी। आई को उस दानव ने बालों से पकड़ा हुआ था और उनका एक पैर अपने पैर के नीचे दबा रखा था। बहुत चीख रही थी वो पीड़ा से। बाबा जा कर उसके पैरों में गिर गये, माफी की भीख मांगने लगे। बिल्कुल लाचार हो गये थे वो, और वो सब साले हँस रहे थे, पूरी बस्ती तमाशा देख रही थी और मैं... मैं सब देख रहा था, बहुत हाथ-पैर मार रहा था, पर चीख भी नहीं पाया, मुझे भी ना पकड़ लें वो लोग इस डर से काका मेरा मुंह दबा के, उन सब की नज़रों से छिपाकर भीड़ में थोड़ा पीछे ले जा कर खड़े थे। तभी उनका एक आदमी बाहर आया, मेरी बहन के साथ। गर्दन के पीछे से पकड़ के टांगा हुआ था उसे। बहुत रो रही थी वो। फिर बोला‌ ‌- और किसी को चढ़ी है गरमी... सबका यही हाल होगा, दस दिन समय दे रहे हैं, पूरा बस्ती खाली कर दो नहीं तो... ये बोल कर वो चारों जाने को तैयार हो गये। आई-बाबा को छोड़ दिया...” ये बोल कर राजू फिर चुप हो गया। फिर कहीं खो गया वो।

 “फिर वो चले गये क्या?” नीरव ने राजू से सवाल किया।

“नहीं... नहीं गये। वो मुड़ा अंदर जाने के लिये, अचानक उसका पैर लड़खड़ाया और मेरी बहन हाथ से छूट गयी। ज़मीन पर लग के उसका सर फट गया। चुप हो गयी वो... उसका रोना बंद हो गया, हमेशा के लिये। आई अंदर से चिल्लाई, अपने हाथ फैलाये जैसे पकड़ना चहती हो उसे, पर नहीं पकड़ पाई। बाबा गुस्से में आकर इस आदमी का गर्दन पकड़ लिये, चिल्ला रहे थे- मार डालूंगा तुझे, तभी वो चाकू निकाला और तीन बार बाबा के पेट में मारा। अंदर उस आदमी ने आई का भी गला काट दिया। थोड़ी देर तक उनका शरीर बिना पानी की मछली की तरह तड़पता रहा, फिर वो शांत हो गयीं। बाबा ये सब देख रहे थे, दर्द से कराह रहे थे फिर उनकी भी आंखें बंद हो गयी। मैं सब देख रहा था पर कुछ नहीं कर पाया। वो लोग चले गये। मेरे सामने मेरा पूरा परिवार मर गया। पूरी रात मैं अपनी चौखट पर अपनी बहन को गोद में उठाये रोता रहा… ना पुलिस आयी ना कोई और मदद। कुछ दिन बाद सारे घर तोड़ दिये गये। हम छोटे लोगों को कोई नहीं पूछता। विकास के नाम पर हमारी दुनिया तबाह कर दी गयी।” राजू घुटनों पर बैठ कर रोने लगा। नीरव ने जा कर उसके सर पर हाथ फेरा और फिर गले लगा लिया। अकसर बड़े लोगों के विकास के नाम पर गरीबों की बली दे दी जाती है।

नीरव ने तय कर लिया कि वो राजू का सपना पूरा करेगा, उसे पढ़ाएगा। इस बारे में उस समय उसने उससे कुछ नहीं कहा। तभी नीरव को किसी का फोन आया, वो बात करने लगा और जब मुड़ा तो राजू वहां से जा चुका था। उसने बहुत देर इंतज़ार किया पर वो नहीं आया। नीरव भी घर लौट आया।

अगली सुबह जब वो काम पर गया तो बहुत लोग इकट्ठा थे मॉल के आगे। वो भीड़ को चिरता हुआ आगे गया तो पाया की मॉल के मालिक की किसी ने हत्या कर दी थी, उसी के मृत शरीर के आस-पास ये भीड़ इकट्ठा हुई थी। पुलिस तहकीकात कर रही थी। उसकी सफेद कोट-पैंट पर खून के वो धब्बे बहुत भयानक लग रहे थे। नीरव ने ध्यान से उसके शरीर को देखा। उसकी एक टांग टूटी हुई थी, घुटनों से थोड़ा ऊपर खून का छोटा सा निशान था, किसी भारी चीज़ से मारा था उसे जिसने उसकी वहां की हड्डी को चुर कर दिया था। बाल अजीब ढंग से बिखरे हुए थे,  जैसे किसी ने नोचे हों। सर पर भी चोट थी, बहुत खून बह चुका था। गले पर भी काटने का घाव और पेट में चाकू के वार। नीरव की मानो सांसें रुक गयी थी। घबराहट और डर के कारण उसका चेहरा पीला पड़ गया था। वो अचेत होकर वहीं खड़ा था तभी उसके बगल में राजू आ कर खड़ा हुआ। उसके हाथ में चाय के गिलास थे। वो नीरव की तरफ देखा, एक सुकून था उसके चेहरे पर, थोड़ी देर देखने के बाद मुस्कराया और बोला, “ऐसे क्या देख रहे हैं साहब? मुझे पता है आप किसी को कुछ नहीं बतायेंगे...”

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