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मज़हब
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© Prateek Tiwari (तलाश)

Abstract Drama Tragedy

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शहर में दंगे आग की तरह फैले चुके थे। पूरा शहर आग की चपेट में धूँ धूँ कर जल रहा था । जहाँ देखो जलती दुकानें, जलती मोटरें । चारों तरफ़ बस यही तबाही का मंज़र ही नज़र रहा था । समाचार में दिखा रहे थे कि सोशल मीडिया की एक पोस्ट के चलते धार्मिक भावनाएँ आहत हो गयी थीं और पूरा शहर उस वजह से दंगे की चपेट में आ चुका है । शायद मज़हब इतना कमज़ोर हो गया है कि एक सोशल मीडिया की पोस्ट भर से ख़तरे में आ जाता है या शायद असल में लोगों को अपने मज़हब पर ही विश्वास नहीं रहा । तभी तो लोग अपने अस्तित्व को लेकर इतने परेशान हो उठते हैं । सोचते सोचते आरती का ध्यान गया कि शहर के जिस हिस्से में दंगे फैल हुए हैं, वहाँ बेटी का कॉलेज भी है ।

आरती ने मन की तसल्ली के लिये फिर से ख़बर देखी और बुरी तरह से घबरा गई ।पति शहर से बाहर थे और बेटी अभी भी कॉलेज से वापस नहीं आयी थी। घबराहट के मारे पल भर में उसके मन में हज़ारों ख़याल आ गए। मन ही मन आरती ने कुछ फ़ैसला लिया और घर से निकल पड़ी । वो अब किसी भी तरह बस अपनी बेटी के पास पहुँच जाना चाहती थी । बेटी के आगे उसे कुछ नहीं सूझ रहा था । घर से निकलते ही वो सड़क में जाने की बजाए बग़ल की गली में घुस गई । इस उम्र में बीमार होने के बावजूद उसके क़दम तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे ।

जिन गलियों में जाने से कभी आरती कतराती थी, आज उन्हीं गलियों का सहारा लेकर आगे बढ़ती जा रही थी । जाने क्यों आज उसे वो गलियाँ महफ़ूज़ लग रही थीं । इंसान डर और आवेश में शायद इसी तरह के अपूर्व फ़ैसले लेता है। तभी अपनी बेटी के ख़यालों में तेज़ क़दमों में चली जा रही आरती का ध्यान एक शोर से टूटा । अचानक गली के आख़िर से मारो मारो का शोर सुनाई देने लगा था । भीड़ में किसी ने कहा, “मार दो इस लड़की को ये हमारे धर्म की नहीं हैं।” ये शब्द कानों में पड़ते ही न जाने क्या क्या ख़याल आरती के ज़हन में उतर गए और वो बेतहाशा उस भीड़ की तरफ़ भागने लगी । गली के अंत में पहुँचते ही अचानक एक अजनबी हाथ ने उसे एक घर के अंदर खींच लिया। वो चिल्लाती रही मुझे मेरी बेटी के पास जाने दो, पर उस हाथ ने बहुत मज़बूती से उसका हाथ पकड़ा था। घर के अंदर अंधेरा था। घर क्या एक छोटा सा कमरा था । ग़रीब को भगवान दिल ही बड़ा देता है, घर नहीं ।

इससे पहले की आरती कुछ समझ पाती हाथ पकड़ने वाली औरत बोली, “मेम साब क्यों अपनी जान गँवाना चाहती हैं, जानती नहीं शहर में दंगे फैले हुए हैं और आप दूसरे धर्म की होकर इन गलियों में क्या कर रहीं हैं।” ये कहते हुए वो इमरजेंसी बैटरी लाइट लेने चली गयी ।

"मेरी बेटी अभी कॉलेज से वापस नहीं आयी है । मैं उसे लेने जा रही हूँ ।"

"मेम साब इस समय बाहर निकलना ख़तरे से ख़ाली नहीं है । मेरा बेटा आता ही होगा, आप उसके साथ घर वापस चले जाना । और खुदा पर भरोसा रखें, आपकी बेटी भी वापस आती ही होगी।" एक जानी पहचानी आवाज़ ने आरती को समझाया ।

इमरजेंसी लाइट बल्ब से पूरे कमरे में रोशनी हो चुकी थी । वो अजनबी हाथ अब आरती को बिलकुल साफ़ दिखाई दे रहा था और शायद कुछ अपना भी ।अँधेरा छँटते ही अतीत के कुछ पन्ने भी साफ़ साफ़ दिखाई देने लगे थे ।

दोनों मोहतरमाएँ कुछ पल के लिए एक दूसरे को अवाक् ताकती रहीं !

शबनम तुम ! हे भगवान इतने दिन बाद ! और ये क्या हो गया तुम्हें ? तुम यहाँ कैसे ? आरती ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा । एक पल के लिए आरती, शबाना को देख कर अपनी सब परेशानी भूल चुकी थी ।

“शबनम क्या सोच रही हो ! कहाँ खो गयी हो मैडम ?” आरती ने अपने वर्षों पुराने अन्दाज़ में कहा । और ये तस्वीर किसकी है ? तुम्हारा बेटा है क्या ?

शबनम और आरती बचपन की पक्की सहेलियाँ थी । सहेलियाँ क्या ? सगी बहनें ही समझो । हमेशा साथ रहती थी । साथ खाती, पीती और शरारत करतीं । जिस समय सूरत में प्लेग फैला था, आरती गर्भ से थी । उसको एक प्यारा सा लड़का हुआ था, पर आरती को भी प्लेग ने जकड़ लिया था । ये देखकर आरती के पति ने शबनम को अपना बेटा देते हुए कहा था कि ये अब तुम्हारी ज़िम्मेवारी है । इसे लेकर शहर से दूर चले जाओ, मैं आरती को किसी तरह समझा दूँगा । आरती को उसके पति ने बताया था कि मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था । वक़्त के साथ आरती के ज़ख़्म कुछ भर गए थे । शबनम की भी कोई औलाद नहीं थी, इसलिए उसने आरती के बच्चे को अपने बच्चे की तरह पाला था और मुम्बई चली आयी थी । लेकिन बेरहम वक़्त ने उसके पति का सारा व्यापार ख़त्म कर दिया और साथ में उसके पति को भी लील लिया था ।

हाँ.... ये अज़हर है, मेरा बेटा । शबनम ख़यालों से बाहर आयी । शायद इस प्रश्न से वो कुछ असमंजस में आ गयी थी ।

इससे पहले की शबनम कुछ और बोलती, खोली का दरवाज़ा कोई ज़ोर ज़ोर से पीटने लगा। “ अम्मी, अम्मी कहाँ हो तुम ? दरवाज़ा खोलो ।“

शबनम दरवाज़ा खोलकर चिल्लाने लगी, “ क्या हो गया तुझे ? क्यों दरवाज़ा पीट रहा है ?”

“ अम्मी उन लोगों ने शहज़ाद को मेरे सामने मार डाला।” दर्द से नम और ग़ुस्से में लाल आँखें, अज़हर के अंदर के ज्वालामुखी को बयान कर रही थी ।

शबनम ने अज़हर को इस रूप में कभी नहीं देखा था । "तू अंदर आ पहले, पहले अंदर आ।" घबराहट से शबनम की आवाज़ बैठ गयी ।एक माँ का डर शबनम की आँखों में तैर गया । तू ठीक तो है बेटा ।

अम्मी के सवालों को अनसुना करते हुए अज़हर ने पूछा “ ये कौन है अम्मी , ये हिंदू औरत यहाँ क्या कर रही है ? “ इसको मैं यहीं क़त्ल कर दूँगा । इन लोगों ने मेरे दोस्त, मेरे भाई जैसे दोस्त को मार डाला। मैं इन लोगों को नहीं छोड़ूँगा । अज़हर ने दौड़ते हुए अलमारी से देसी कट्टा उठाया । अज़हर के अंदर का ज्वालामुखी फट चुका था ।

आरती का डर बढ़ गया , उसे अपनी बेटी की याद आने लगी और कानों में कुछ देर पहले गली में सुने हुए शब्द गूँजने लगे । वो बेतहाशा दरवाज़े की तरफ़ दौड़ी ।

अज़हर दरवाज़े पर ही कट्टा ताने खड़ा था । नहीं बेटा ऐसा मत कर, मेरी बात सुन। अज़हर मेरे प्यारे बच्चे, सुन मेरी बात सुन। शबनम बहला फुसला कर अज़हर से कट्टा छीनने की कोशिश करने लगी ।

अज़हर ने शबनम को धक्का दे कर हटा दिया, शबनम चिल्लायी, "अज़हर ये तेरी माँ है ।" लेकिन इस सब के लिए बहुत देर हो चुकी थी, अज़हर के क़ट्टे से गोली निकल कर आरती के सीने से पार हो गयी । आरती नीचे गिर गयी । बेटा ! बस यही शब्द निकल पाए थे आरती के मुँह से ।

शबनम आरती का सर गोद में लिए रो रही थी । अज़हर कभी अम्मी को देख रहा था, कभी माँ को । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आज वो जीता है या हारा। उसने अपने दोस्त की मौत का बदला लिया है या धर्म के नाम पर ख़ुद ही लुट गया था ।

धर्म आक्रोश बदला Religion मज़हब इंसानियत इंसान इन्सान

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