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उम्मीद की किरण
उम्मीद की किरण
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© आकांक्षा पाण्डेय

Drama Inspirational

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सोना एक स्कूल में पढ़ाती थी। घर के कामों के लिए उसने पास की ही झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली कांता को रख लिया था। कांता का पति पास की ही फैक्ट्री में लेबर था जो पैसा मिलता उससे किशोर शराब पी जाता। कांता की 2 बेटियां थी, शोभा और सुंदरी । किशोर को सिवाय शराब के कुछ नहीं दिखता। कांता भले ही खुद अनपढ़ थी मगर वो अपनी बेटियों को पढ़ा - लिखाकर किसी लायक बनाना चाहती थी। दिन - रात मेहनत करके जो पैसे मिलते उनको एक - एक करके जोड़ती। ताकि उसकी बेटियां भी स्कूल जाकर पढ़ सके।

कांता जहाँ रहती थी वहाँ का माहौल बेहद ही गन्दा था, यूं कहें कि सिवाय गंदगी के वहाँ कुछ नहीं था और ऊपर से अशिक्षित लोग, जिनका जीवन सिर्फ मजदूरी करके पैसा कमाना और उस पैसे से शराब और खाने का ही प्रबंध कर पाते थे वो लोग, तो बस्ती के लोग अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए न भेजकर कुछ ऐसा काम करते थे जिसको सुनकर शर्म आती थी कि कोई अपनी बेटियों से भी ऐसा काम करवा सकता है। और वो भी सिर्फ चंद पैसों के लिये !

बस यही समाज था कांता का। जिससे वो बाहर निकलना चाहती थी। दोनों बेटियों के बारे में सोचकर न जाने क्यूँ कभी - कभी कांता कुछ ज़्यादा ही परेशान रहती। उस झुग्गी के पास जो फैक्ट्री थी वहाँ का जो ठेकेदार था जो इन मजदूरों को काम दिलाता, उसके बदले में उसको उन मजदूरों की लड़कियां या उनकी घरवालियों को उसका गुलाम बनकर रहना पड़ता। ये तो कांता की किस्मत अच्छी थी कि सर्व शिक्षा अभियान में झुग्गी के गरीब बच्चों को भी आगे आने के लिए प्रयासरत करने वाली सोना से मुलाकात हो गयी उसकी। और उसने उसपर भरोसा किया और उसको अपने घर मे काम पर रख लिया।

दोनों बच्चियों को स्कूल भेजने लगी थी कांता। किशोर ने विरोध भी किया मगर कहते हैं कि जब एक औरत कुछ करने की ठान ले तो वो कुछ भी कर सकती है। झुग्गी की औरतें भी जलती थी कांता से। क्योंकि कांता सबकुछ सह सकती थी मगर अपनी इज़्ज़त से खिलवाड़ नहीं करने दे सकती थी। ठेकेदार की नज़र बहुत दिन से थी कांता पर मगर कभी मौका ही नहीं मिलता उसको।

शाम हो गयी थी, मौसम भी कुछ ठीक नहीं था। तेज़ बादल घिर गये थे। सोना के घर से कांता भी सब काम निपटाकर घर की तरफ आ रही थी कि अचानक उसने देखा कि ठेकेदार किशोर से कुछ बातें कर रहा है। शायद कोई साज़िश जिसको भांप लिया था कांता ने। तेज़ कदमों से भागी वो ! अनजाने डर ने कांता को अंदर से झकझोर दिया था। जल्दी - जल्दी से कुछ ज़रूरी सामान इकठ्ठा किया और वो पैसे भी और दोनों बेटियों को जगाकर चुपचाप दूसरे रास्ते से निकल गयी। और सोना के घर गयी और सब हाल बताया। सोना गम्भीर सोच में थी कि अचानक एक रास्ता दिखा।

एक बचपन की दोस्त जिसकी माँ को एक घर में ही देखरेख करने वाली तलाश थी। वो दोस्त दूसरे शहर में रहती थी। रात में ही गाड़ी निकाल कर तीनों को बिठाकर, वो शिवानी के घर गई और सब हाल बताया। सरोज आंटी ने उनको अपने घर में रख लिया और सोना को निश्चिंत रहने को बोला।

सोना बहुत खुश थी क्योंकि उसने इंसान होने का फर्ज़ अदा किया। आज 15 साल बाद शोभा, डॉक्टर शोभा बन गयी थी और सुंदरी का नाम बदल कर शिप्रा रख दिया था कांता ने। शिप्रा एम. बीए. करके जॉब कर रही थी। उनकी ज़िंदगी बिलकुल बदल गयी थी। कांता बहुत खुश थी कि उसने अपनी बेटियों को उस भेड़िये ठेकेदार से बचा लिया था। सोना उनके लिए उम्मीद की एक किरण बनकर आयी और ज़िंदगी रोशन कर गई...।

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