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 मृगतृष्णा
मृगतृष्णा
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© Neha Agarwal neh

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" दिमाग़ खराब हो गया है इस लड़के का, यह क्या बात हुई जब देखो हर चार महीने में अस्पताल जा कर बैठ जाता है। कमज़ोर हो जाऐगा पर कोई मेरी बात समझे तब ना।"

बादाम का हलवा बनाती माँ बड़बड़ाऐ जा रही थी।

तभी किसी के ज़ोर-ज़ोर  से दरवाज़ा पीटने की आवाज़ पर वो नंगे पाँव दरवाज़ा  खोलने चली गई।

देखा तो सामने पड़ोस के शर्मा जी खड़े थे।

"भाभी जी जल्दी चलिये भाईसाहब का कालोनी के गेट के बाहर एक्सीडेंट हो गया है।और लोग उन्हें हॉस्पिटल लेकर गये हैं। "

काँपती सी शीला जी जब हॉस्पिटल पहुँची तो सामने से बेटे को आता देख वो अपने बेटे के गले लग कर रो दी।

"बस करों मम्मा अब पापा ख़तरे से बाहर है। जानती है आज ख़ून की कमी से पापा की जान भी जा सकती थी। "
बेटे की बात सुनकर शीला जी अपनी बहते हुए आँसुओं को परदा अपनी आँखों से हटाते हुऐ बोली।

"मुझे माफ़ कर दो बेटा मैं समझ गई हूँ कि,  रक्तदान महादान है आज के बाद मैं कभी तेरे अस्पताल जाने पर नाराज़ नहीं होगी। "

माँ की बात पर बेटा भी मन्द मन्द मुस्कुराते हुऐ बोला।

"सामने डाक्टर साहब से भी पूछ कर घर जाना आप कि , रक्त दान करने से कोई कमज़ोरी आती हैं क्या, हर बार मेरे लिऐ बस बादाम का हलवा बनाने लग जाती है।

 

मृगतृष्णा

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