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सोशल नेटवर्क
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© Sahaj Lekhan

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आई फ़ोन की बैटरी का आखिरी सिग्नल राहुल को डिप्रेस कर रहा था, खत्म होती हुई बैटरी उसके आने वाले पलों के अकेलेपन की और उसे खींचते हुए ले जा रही थी | वह अपने दोस्तों के कमेंट्स का इंतज़ार कर रहा था, जो की उसके स्टेटस अपडेट पर आने वाले थे | तभी उसे एक स्टेटस अपडेट दिखा " हे !! टेक केयर राहुल, वी आर वरीड फॉर यू " -- कमल | इसके साथ ही उसका आई पेड बंद हो गया , वो कमल को उसके कोम्म्मेंट पर थैंक्स कहना चाहता था | वैसे कमल से राहुल की मुलाकात उस कंपनी में हुई थी जहाँ राहुल ने सिर्फ २ महीने काम किया था , उसके बाद भी वो लोग फेसबुक के थ्रू टच में थे | अभी राहुल कमल का चेहरा याद करने की कोशिश कर रहा था और सोच रहा था की उसकी लड़की है या लड़का, आखिर वो लोग पिछले ५ साल से नहीं मिले हैं ? खैर तभी उसे शम्भू की तरफ देखना पड़ा जो की उसे चाय देने आया था | 
अरे हाँ, शम्भू उस २५ साल के लड़के का नाम है जो की गेस्ट हाउस का केयर टेकर है | उसका गाँव यहाँ से २० किलो मीटर दूर है, पर इस बाढ़ के कारण वो भी अपने माँ बाप से बात कर नहीं पा रहा है | चंपा में वैसे तो हर साल बाढ़ आती है पर इस बार रायपुर से उसे जोड़ने वाला पुल भी टूट गया है, एक और छोटा पुल है पर वो अभी पूरी तरह पानी में डूबा हुआ है |
राहुल, नितेश, विक्रम, ऋचा और शिल्पी पिछले 6 घंटे से इस गेस्ट हाउस में बिना बिजली के फंसे हुए हैं, सब यहाँ से निकलने का इंतज़ार कर रहे हैं पर बारिश है थम ही नहीं रही | ये पांचो अपने ऑफिस की टैक्सी से रायपुर जा रहे थे, चंपा में इक एल्युमीनियम प्लांट की साईट के निरिक्षण के लिए आये थे, राहुल- टेक्निकल, नितेश- फाइनेंस, विक्रम- लोजिस्टिक्स, ऋचा- एच आर व शिल्पी एडमिन डिपार्टमेंट से थी इनके ऑफिस भी अलग अलग थे और पहली बार टूर पर इक साथ ये ८ घंटे पहले ही मिले थे, हांलाकि इसके पहले इनकी फ़ोन पर बात हो चुकी थी | राहुल की ही तरह बाकी चारों के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स भी दम तोड़ने की कगार पर थे, चलो अच्छा है सभी ने अपने परिवार को इस बाढ़ के बारे में बता दिया था.
कहाँ तो राहुल को दिन के चौबीस घंटे भी बहुत कम लगते थे और आज मानो समय चक्र रुक सा गया था. वैसे वो ऑफिस की जद्दो जेहद में भी तरह तरह के सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज़रिये अपने दोस्तों से जुड़ा रहता था या यो कहें की दोस्ती अब सिर्फ फेसबुक पर स्टेटस अपडेट और कमेंट्स करने तक ही सीमित रह गयी थी. उसे याद नहीं की कब उसने कोई वीकेंड या दो चार घंटे ही किसी दोस्त के साथ बेपरवाह गपशप या आलसी गुफ्तगू करने में बिताई हो, मीटिंग तो रोज़ होती थीं लेकिन वहां एक अनकही दौड़ होती थी खुद को बेहतर साबित करने की और महत्वाकांक्षा की उस दौड़ में राहुल ने कब अपने आप को व्यावसायिक बना दिया उसे पता भी नहीं चला | ऑफिस कुलीग की अनिवार्यता में दोस्ती कब का दम तोड़ चुकी थी |
इस बात का अफ़सोस राहुल को कभी हुआ भी नहीं. वो तो आज भी अपने को सभी से जुड़ा हुआ पाता था | अभी कल ही तो उसने एक दोस्त को पिता बन ने की बधाई फेसबुक पर अपडेट की थी पर साथ ही बड़ी चतुराई से उसके घर जाने का आमंत्रण ये कहते हुए टाल दिया था की स्कूल में बेटी का एनुअल फंक्शन है | दोस्तों के साथ बैठकर वक़्त बिताने की चाह और जरूरत दोनों ही उसे नहीं थी, नए इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स से वो सबसे जुड़ा भी था और उसके पास उसकी पर्सनल स्पेस भी थी | शायद कभी कोई बाज़ार या मॉल में अचानक मिल जाता तो थोड़ी सी बेचैनी जरूर होती थी की अब क्या बात करें और फिर खरीददारी या बच्चों का बहना बनाकर चल देना ज्यादा आसन लगता था, हाँ ये बात और है की घर पहुंचकर स्टेटस में जरूर अपडेट हो जाता था की आज अचानक ही रवि मिल गया बहुत अच्छा लगा काश समय थोडा और होता |
तभी शम्भू ने चाय ठंडी होने की बात कर उसे फिर अपनी बेचारगी का एहसास करा दिया था. कितने आसानी से शम्भू उन सभी से बातचीत कर रहा था जबकि वो आज से पहले उनसे कभी मिला भी नहीं था, और वो पांचो तो एक ही ऑफिस से थे और लगभग पिछले ३ महीनो से सभी इसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे| ये उनकी प्रोजेक्ट टीम थी जो हर 15 दिन में एक बार प्रोजेक्ट updates को लेकर मिलती थी लेकिन कभी भी किसी को बिज़नस के अलावा कोई और बात करने की जरूरत ही नहीं पड़ी या यूं कहे की बिज़नस मीटिंग ही इतनी लम्बी खिंच जाती थी की हर कोई निकलने के लिए घडी देखने लगता था | आज पहली बार शायद जब शम्भू ने निलेश को यूँ कहते हुए छेड़ा था की सर आप तो हृथिक रोशन की तरह किस्मत वाले होंगे तब राहुल ने गौर किया था की निलेश के दाहिने हाथ में छह उंगलियाँ हैं, वो सब बातें जो शंभू सभी से कर रहा था वो भी कर सकता था पर पता नहीं क्यों कर नहीं पा रहा था |
सहज बातचीत किये हुए अरसा बीत चुका था, आज जब समार्ट फ़ोन की बैटरी ख़त्म हो गयी है और रिचार्ज करने का कोई उपाय भी नज़र नहीं आ रहा तो ऐसा लग रहा है मानो खुदकी बैटरी ख़त्म हो रही हो | शायद ये असहजता उसके अलावा उन पांचो को भी हो रही थी तभी तो सभी शम्भू की तरफ आस लगाकर देख रहे थे, क्यूंकि एक वो ही था जो उन सभी को बिना बैटरी के कनेक्ट किये हुए था |

धीरे धीरे राहुल ने भी खुलना शुरू किया और शम्भू की बातचीत को आगे बढाने लगा, सामाजिक प्राणी होने की बेचारगी का एहसास उसे इस लगातार होती बारिश ने करा दिया था | पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, और उनकी बातचीत बहुत ही बोझिल होने लगी थी और आम दिनों की मीटिंग का स्वरुप लेती जा रही थी, तभी शम्भू सभी के लिए गरमा गरम पकौड़े बना कर ले आया और मीटिंग को ख़त्म करने की गुज़ारिश की | चाह तो सभी यही रहे थे पर कोई भी अपने आप को unprofessional नहीं बताना चाहता था | खैर मीटिंग ख़त्म हुई और उसकी जगह ले ली चुटकुलों और सुरीले मनमोहक गानों ने और आज पहली बार सबको पता पड़ा की शिल्पी और नितेश जादुई आवाज़ के मालिक भी है, यह सिलसिला कुछ यों चला की फिर बादल भी बरस कर कब रुक गए पता ही नहीं चला |
शम्भू ने चाय की एक और फरमाइश के साथ सभी को बारिश रुकने की बात बताई, पता नहीं ये बारिश का असर था या सुरीले गानों का जादू की कोई भी पिछले चार घंटो में अपनी जगह से नहीं हिला था | खैर बारिश रुकने से सभी के चेहरे पर एक ख़ुशी झलकने लगी थी.शम्भू ने बताया की पुल का पानी भी अगले आठ घंटो में उतर जायेगा और फिर वे सभी अपने शहर के लिए निकल सकेंगे | इस बात से सभी खुश थे. इस बारिश ने उन सभी को इक अनकहे रिश्ते में बाँध दिया था जहाँ स्टेटस अपडेट करने की जरूरत नहीं थी, मन के तार अपने आप ही बंध गए थे | आज राहुल को लग रहा था की सोशल नेटवर्किंग ज़रूरी भले ही हो लेकिन ये परोक्ष दोस्ती का पर्याय नहीं हो सकती | गैजेट्स की बैटरी जहाँ ख़त्म हो जाती है इंसानी जज़्बात वहां से शुरू होते है, इस सच्चाई का एहसास शम्भू ने उसे बहुत ही सहजता से करा दिया था |

A short story on social and real networking. Conflict between virtual and real network !

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