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पुख़्ता वृक्ष
पुख़्ता वृक्ष
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© Manju Saxena

Inspirational

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ब्याह की पचासवीं सालगिरह पर सत्तर वर्षीय शामली का रूप ही अनोखा था।

दुल्हन के वेश में उम्र के निशान भी जैसे शरमा कर छिप गये थे। उसके बच्चों ने भारी इंतज़ाम किया था पर अनु देख रही थी माँ की दृष्टि को...

वो जब भी पापा की दृष्टि से मिलती तो जैसे एक आभा निकल कर एक दूसरे के चेहरों पर पड़ती और दो चेहरे दीप्तिमान हो उठते, “माँ...तुम आज ज़्यादा खुश हो या उस वक्त ज़्यादा खुश थीं जब तुम पहली बार दुल्हन बनी थी।”

गले में हार बदलने की रस्म होते ही अनु ने आखिर पूछ ही लिया तो मुस्कुरा दी शामली- “अनु….खुश तो तब भी इतनी ही थी जितनी आज हूँ पर उस वक्त मैं सपनों के धरातल पर खड़ी थी...जिनके टूटने का मन मे एक भय था…क्योंकि तब प्रेम का बीज बस अंकुरित ही हुआ था.. पर आज मैं हक़ीक़त की ज़मीन पर हूँ..जहाँ कोई डर नहीं है...इसीलिए आज हमारे प्यार का पौधा भी मज़बूत वृक्ष हो गया।

गृहस्थी की गाड़ी….“आप अपनी पचासवीं मैरिज एनीवर्सरी पर अपने सफल विवाहित जीवन का राज़ बताएँगी ?”

वीरा के जेठ के बेटे ने स्टेज पर बैठी वीरा के मुँह के सामने माइक कर दिया तो एक पल को एक पुराना दृश्य उसकी आँखों मे कौंध गया...।

“माँ...तुम पापा से दबती हो या..पापा तुमसे डरते हैं जो हम बच्चों ने तुम लोगों को कभी लड़ते नहीं देखा...मेरी तो हर हफ़्ते ही प्रसून से किसी न किसी बात पर अनबन हो जाती है..और फिर हर बार एक दूसरे पर लांछन, आरोप और अपशब्द…..” एक दिन उसने माँ से पूछ ही लिया तो रीमा थोड़ा गम्भीर हो गई, “वीरा... हर रिश्ते मे कुछ दूरियाँ बना कर रखनी पड़ती हैं… तभी उन रिश्तों की गरिमा बरकरार रहती है।”

“मतलब….?

“जैसे गाड़ी के दो पहिये जब नियत दूरी पर रहते हैं तो गाड़ी ठीक चलती है पर सोचो….यदि दोनों पहिये बीच की दूरी ख़त्म कर दें तो….

“अरे….तो गाड़ी कैसे चलेगी…”

वीरा तेज़ी से बोल उठी तो रीमा मुस्कुरा दी..“ठीक ऐसी ही दूरी हमारे रिश्ते में रही… हमने एक दूसरे की भावनाओं का आदर किया… प्यार भी बहुत रहा परन्तु हमनें एक-दूसरे के सम्मान के लिए बीच में जगह रखी...कभी भी इतना नज़दीक नहीं हुए कि हमें एक दूसरे की गंदगी दिख जाए।”

“मतलब मैं और प्रसून….”,वीरा सोच में पड़ गई

“वीरा...परिवार भी एक गाड़ी की तरह है, पति-पत्नी जिसके दो पहिये हैं… दोनों पहियों का एक ही उद्देश्य है पर गाड़ी तो तभी चलेगी जब बीच मे एक गरिमामय दूरी बना कर रखें… बस यही मेरी सुखी गृहस्थी का राज़ है “पर दूरी कैसे….माँ ?”

“थोड़ा धैर्य व थोडा़ चुप से...क्योंकि जैसे ही तर्क वितर्क शुरू होता है तो शर्म के सारे परदे गिर जाते हैं… फिर शुरू होते हैं आरोप.. अपशब्द… जिनका कोई अंत नहीं होता।”

“बोलिए चाची…”,

माइक और नज़दीक आया तो एकदम से उसके मुँह से निकला, ”थोड़ा धैर्य… और.थोड़ा चुप…”, कहते ही उसकी नज़र प्रसून से मिली जहाँ प्रेम के साथ आदर का भाव स्पष्ट गोचर था।

गाड़ी पहिये धैर्य

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