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बदलती राहें
बदलती राहें
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© Shashi Panday

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अनु माँ जी से लिपट कर रोती हुई अपने हर उस पल को करती जब वो सपनो का संसार लिए कभी इस घर की दहलीज़ पर आई थी...कैसे ज़िंंदगी ज़रुरतोंं के साथ बदलती है अभी -अभी तो रचित और अनु परिणय सूत्र में बँधे थे उन दोनों का प्यार देखते ही बनता था अनु ,रचित, माँ जी सभी कितने ख़ुश थे शादी के बाद जल्दी ही अनु और रचित को मम्मी -पापा बनने का सौभाग्य भी मिला उस बच्चे बच्चे का नाम बड़े ही प्यार से अंकुर रखा है जब से अंकुर आया है मानो घर का कोना -कोना खिल सा गया हो और माँ जी उनके तो जैसे सारे अरमान पूरे हो गए हो।

अनु याद करते हुए...रचित- अनु!! मेरा लंच जल्दी लाओ मै लेट हो रहा हूँ ऑफिस के लिए अनु रसोई से हाथ में लंच बॉक्स लाती हुई रचित, अनु को रोज़ाना की तरह छेड़ता है और लंच बॉक्स लेता है और ऑफिस निकल जाता है।

दिन यूँ ही गुज़र रहे थे कि एक दिन शाम का वक़्त था रचित के ऑफिस से आने का समय हो रहा था अनु बार -बार घड़ी निहारती हुई चाय -नाश्ता तैयार कर रही है इस बीच फोन की घंटी बजी माँ जी ने आवाज़ लगाई बहू देखो तो ज़रा किसका फोन है मै अंकुर को सुला रही हूँ अनु भाग कर फोन उठाती है हेलो उधर से आवाज़ आती है आप मिसेज़ रचित बोल रही हैं ...जी -जी कहिये ! देखिये रचित का एक्सिडेंट हो गया है आप तुरन्त सिटी हॉस्पिटल आ जाइये इतना सुनते ही मानो अनु के पैरो तले ज़मीन खिसक गयी हो वो ख़ुद को सम्भालते हुए किसी तरीके से ये बात माँ जी को बताती है और अंकुर को गोद में उठाकर माँ जी के साथ हॉस्पिटल के लिए निकल पड़ती है.

बदहवास सी अनु हॉस्पिटल पहुँचते ही रिशेप्सन में पता करती है तो पता चलता है रचित की हालत बहुत गंभीर है वह आईo सीo यूo में है अनु डॉक्टर से पूछती है रचित ठीक तो हो जाऐंगे न ?? क्या हुआ है उन्हें...... जाने कितने सवाल एक ही बार में पूछती है डॉक्टर बड़े अफ़सोस के साथ बताते हैं रचित का नर्वस सिस्टम ख़राब हो चुका है वह सिर्फ़ देख सकता है और वह कुछ नहीं कर सकता  अनु सुनते हुए माँ जी को और माँ जी अनु को हिम्मत देती हैंI रचित अब खतरे से बाहर आ चुका है माँ जी और अनु उसको घर ले जाती हैं रचित अब जीती जागती हुई लाश बन कर रह गया है।थोड़ा वक़्त बीता अनु ने घर चलाने के लिए नौकरी कर ली है माँ जी रचित , अंकुर और घर सम्भालती हैं तो अनु बाहर के काम, अनु के ऑफ़िस सहकर्मी अनुभव जो की अनु की परिस्थिति से वाकिफ़ है अनु के सामने शादी का प्रस्ताव रखा है अनु ने अनुभव डाँटकर मना कर दिया। अनुभव कुछ दिनों बाद वह अनु के घर माँ जी से मिलने गया और उनसे शादी की बात करता है ये सुनकर माँ जी परेशान हैं पर अनुभव उनको समझाता है कि क्या आप नहीं चाहती गुमसुम रहने वाली अनु के चेहरे पर भी मुस्कान हो, वह अपनी ज़िन्दगी नए सिरे से शुरू करे माँ जी ।

          बहुत सोचने के बाद अनुभव को हाँ कहती हैं और अनु को भी शादी के लिए राज़ी करती हैंI शादी के लिए राज़ी अनु ये सोच -सोच कर परेशान कि उसके बाद रचित, माँ जी और इस घर का क्या होगाI माँ जी अनु को समझाते हुए पेंशन और किरायेदारों से जो किराया मिलता है उससे घर आराम से चल जायेगा फिर उन्हें इससे ज्यादा की जरूरत भी तो नहीं है ।

शादी का दिन निश्चित हुआ घर में ही अनु के मायके से माँ -बाबू और माँ जी की उपस्थिति में शादी के फेरे लेती अनु किसी क्षण अपने को रचित से अलग नहीं सोच पाती है वही घर के दूसरे कमरे में रचित बिस्तर पर लेटा हुआ छत की तरफ निहारता मानो वह सब सुन रहा हो और महसूस भी....

अंकुर को माँ जी की गोद में लिए हुऐ हैं शादी हो चुकी है अनु -अनुभव अब पति-पत्नी बन गए हैं । रचित को तो ज़िंदगी भर बिस्तर ऐसे ही रहने है । पर पता नहीं माँ जी का यह सही निर्णय था या नहीं पर माँ जी अनु और अंकुर के उज्जवल भविष्य लिए आँसुओंं और सिसकियोंं को दिल में दबाकर अनु को ख़ुशी-ख़ुशी बिदा कर देती हैं।

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