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प्रिया, मेरी भावी सखी!
प्रिया, मेरी भावी सखी!
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© Arpan Kumar

Inspirational

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  निश्चय ‘शायद कोई ख़्वाहिश रोती रहती है

 मेरे अंदर बारिश होती रहती है’

 अहमद फ़राज़

 

प्रिया, मेरी अजन्मी पुत्री!

 तुम आज कहीं नहीं हो। हमने तुम्हें कोख की तरलता में मार दिया था। हमने तुम्हें उजाला नहीं देखने दिया। हमारे भीतर पूर्वाग्रहों का अंधकार इतना घना था कि हम तुम्हें उजाले में ला नहीं सके। हम तुम्हें अपने झूठे अंधविश्वासों के आगे ‘अफोर्ड’ नहीं कर सकते थे, मेरी बच्ची।

 

तुम आज से दो महीने पूर्व भी कहाँ थी। थी तो बस हमारी हसरतों में। सुनती और देखती आयी हूँ अब तक, धर्मों की अपनी अपनी पताकाएं होती हैं। रंगों के आधार पर नस्लों का विभाजन भी देखा है। उनके झगड़े भी हमें पता हैं। मगर हसरतों का भी अपना कोई लिंग होता है, यह तब जाना, जब तुम मेरी कोख में आई। मैं पारस से पूछती थी, हसरत सिर्फ हसरत क्यों नहीं रहती! संतान जनने की खुशी को हम क्यों नहीं महसूसते! उसके लिंग परीक्षण की हमें ज़रूरत क्यों पड़ती है! हम रहस्यों के रोमांच का आनंद क्यों नहीं ले पाते!"

 

पारस, तुम्हारे पिता। आदतन चुप और गुम्मा बने रहे। कई बार किसी की ख़ामोशी कितनी तकलीफ़ देती है! मुझे बहुत अखरा। जिस इंसान को मैं देवता मानती हूँ, वह क्या भीतर से इतना कमजोर है! जिस व्यक्ति को मैंने अपना तन मन दोनों सौंपा, क्या उसमें एक माँ की अकुलाहट को समझने की ज़रा सी संवेदनशीलता नहीं है! क्या उसके लिए मैं एक भोग्या मात्र हूँ! क्या एक तन से अधिक मैं कुछ नहीं! हमारे शास्त्रों में तो अर्धनारीश्वर के रूप की कल्पना की गई है। उनके अनुसार, हर स्त्री में एक पुरुष और हर पुरुष में एक स्त्री होती है। फिर यह कैसे हो जाता है कि पारस, मेरे भीतर के हाहाकार को सुन तक नहीं पाते! क्या मेरा पति, मेरे भीतर की कसमसाहट से इतना बेपरवाह रहेगा! क्या मेरे देह को भोगने वाला,  मेरे मन को नहीं पढ़ेगा! विवाह की वेदी पर वर-वधू कितने तरह के संकल्प लेते हैं! क्या वह सब दिखावा मात्र होता है। तो क्या विवाह के संस्कारों की अब कोई ज़रूरत नहीं रही! सोचती हूँ क्या कभी ज़रूरत थी! ख़ासकर ऐसे पुरुषों के लिए!

 

मैं अपने कमरे में ड्रेसिंग टेबल के आदमकद आईने के समक्ष खड़ी हो गई। सामने आईने में दिख रहा शख़्स मेरा प्रतिबिंब नहीं, बल्कि मेरे भीतर सदियों से सोई कोई स्त्री थी, जो आज जाग गई थी और मुझे भी जगाना चाह रही थी। वह मेरे भीतर के यक्ष-प्रश्नों  से वाकिफ़ थी। वह वास्तव में,  दुनिया की हर औरत के अंतर्द्वंद्व को जान रही थी। वह मुझसे कहने लगी, "प्रजनन तुम्हारा अधिकार है। जब माँ बनने का सारा दर्द तुम भोगोगी, तो तुम्हारा बच्चा कौन होगा और कौन नहीं, इसका फ़ैसला भी तुम ही करोगी,  कोई और नहीं"।

 

मेरे भीतर के पारंपरिक मन ने सवाल किया, " मगर उसका बीज तो मेरे पति का है। क्या उन्हें कोई हक़ नहीं!"

 

आईने के भीतर चमकती चेतना ने फ़ुफ़कार मारी "क्यों नहीं। वह तुम्हारे साथ सोने का सुख भोगता है। तुम उसे वह अतुल्य आनंद प्रदान करती हो। उसके पुरुषत्व को संतुष्ट करती हो। यहाँ तक न्यायोचित है। तुम्हें भी पूर्णता का अहसास होता है। तुम दोनों का यह संबंध साहचर्य पर निर्भर है। अगर इसमें कोई भी एक पक्ष दूसरे पर हुकूमत करने लगे या अपना निर्णय थोपने लगे, तो यह ग़लत है। अस्वीकार्य है। बीज-दाता, जब नवांकुरण को पाले-पोसे तो यह ठीक है। स्वाभाविक भी। मगर जब वह इससे आगे बढ़कर उसके विनाश की बात सोचने लगे, तो यह उसकी अनाधिकार चेष्टा है। तुम्हें उसकी इस चेष्टा को थामना होगा। रोकना होगा।”

 

 "मगर घर में सभी उनकी तरफ़ ही हो जाते हैं। मैं अकेली क्या कर पाऊँगी!" 

 

"तुम्हारा नाम क्या है?" आईने के भीतर से उसके प्रतिबिंब ने पूछा।

 

"यह कैसा सवाल हुआ...तुम जानती हो। ऐसा क्यों पूछ रही हो?"

 

 "माता पिता ने तुम्हारा नाम विजेता रखा था। कुछ सोचकर ही रखा होगा न! उसे सार्थक करो। क्या तुम हारकर बैठ जाओगी! लोगों का दिल जीतो, दिमाग जीतो, और जो न जीत सको यह सब, तो ख़ुद को मत हारो। नहीं सौंपो अपनी कोख को क़ातिल हाथों में। यह सुनिश्चित करो, तुम्हारी कोख की संतान, तुम्हारी गोद में आएगी। वह संतान, लड़का हो या लड़की, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।"

 

 मैं आईने के आगे से हट गई। मेरा प्रतिबिंब जो कुछ भी कह रहा था, मुझे मजबूत बनाने के लिए कह रहा था। कोई और नहीं, वह मेरे भीतर का ही कोई अबोला था। वह मुझे मजबूत देखना चाह रहा था। मुझमें शायद प्रतिरोध करने की इच्छा शक्ति का अभाव था। वह उसे जगाने आया था। वह दुनिया की हर स्त्री की दबी हुई आवाज़ था।

 ...............

 

 प्रिया, मेरी वंचित ख़ुशी!

 तुम्हारी सबसे पहली गुनहगार मैं हूँ। मेरा शरीर मेरा है। तुम मेरे शरीर में आई थी। तुम्हें मुझपर भरोसा था। मैंने तुम्हारे विश्वास को खंडित किया। मैं हतभागी! हिंसकों को मैंने अपनी देह दी, तभी तो वे उस देह से खेल सके और उस देह के अरमानों को जब चाहा, जैसे चाहा नष्ट करते रहे। आज मुझे तुम्हारे पिता के साए से भी उबकाई आती है। काश कि यह उबकाई तब आती। मैं उन्हें अपने पास फटकने ही नहीं देती। न तुम्हारा बीजारोपण होता और न ही मुझे उससे पनपने वाली पौध को यूँ असमय काल-कवलित होते देखना पड़ता। जो खेतों में बीज रोपता है, वह किसान कहलाता है। जो किसी की कोख में बीज बोता है, वह पिता कहलाता है। दोनों जनक हैं। एक अन्न के रूप में अपने सपनों को उगाता है, दूसरा संतान के रूप में अपने प्रतिबिंब को। अपने सूखे खेतों को देखकर जहाँ किसान विचलित होता है, वहीं अपनी पत्नी के गर्भ में पल रहे अपने ही बीज को स्वयं अपने ही हाथों नष्ट करने से फिर एक जीवनदाता को आत्मग्लानि क्यों नहीं होती! क्या यह एकमात्र पुरुष वर्चस्ववाद का मामला है!

 

 एक रात, पारस मुझे समझाने लगे और तुम्हारे लिए कहने लगे, “तुम भोर का दीया थी, जिसे जलते ही बुझ जाना था!”

 

 उन्होंने आगे अपना तर्क दिया, “जब अपने पास एक बेटी है ही, तो दूसरी किस लिए?”

 

मेरा दुःख कम नहीं हुआ। मेरी क्रोधाग्नि में मानो उन्होंने ढेर सा तेल डाल दिया हो। मैं भभक उठी। जो आज तक नहीं कहा, वह सब सुनाया उन्हें। उस रात जाने कैसे मुझमें इतनी शक्ति आ गई थी!

 

अगली सुबह जब आईने के सामने खड़ी हुई तो मेरा प्रतिबिंब मुस्करा रहा था। मानो मुझे शाबाशी दे रहा है। मैं साभार उसके समक्ष नतमस्तक हुई।

 ................

 

मेरी प्रिया, मेरी आत्मा!

 क्या ऐसा सचमुच है? मैं नहीं मानती। हर गुनहगार अपने पक्ष में शब्दों की आड़ लेता है। उस रात पारस भी यही कर रहे हैं। मगर मेरा मानना है, दुनिया के किसी भी नीति शास्त्र में ऐसा कोर्इ शब्द नहीं कहा गया है, जो किसी अजन्मे शिशु की हत्या का समर्थन करता हो।

 

प्रिया, मेरी भावी सखी!

आज तुम्हें एक बात और बताती हूँ। तुम्हारी एक बड़ी बहन भी है। यही कोई पाँच साल की। प्रभा नाम है उसका। उसके समय भी इन लोगों ने मेरे गर्भ का लिंग परीक्षण कराया था। उन दिनों, मैं इन चीज़ों के बारे में कुछ जानती भी कहाँ थी। घर लौटने पर तुम्हारी दादी ने मुझे टोहते हुए कहा, “देखो बहू! अब हम लोग तो बूढ़े हो चले हैं। वैसे भी पारस ने देर से शादी की है। वही इस घर का एकमात्र चिराग है। मैं और तुम्हारे ससुर जी आजीवन उसकी सुरक्षा और इस घर के वंश को लेकर आशंकित ही ज़्यादा रहे हैं। ख़ैर... अल्लाह की मेहर है कि सब ठीक चलता आया। बहू, मैं तो चाहती हूँ कि तुम हमें बस दो पोते दे दो”।

 

 मैं चुपचाप सुनती रही। कुछ नहीं बोली। मगर अभी उन्हें असली मुद्दे पर आना शेष था। तबतक पारस भी अपनी दुकान से घर लौट आए थे । तुम्हारी दादी कहने लगीं, "देख पारस, बेटी-फेटी के चक्कर में मत पड़। परिवार छोटा ही रख। अकेला क्या क्या करेगा! बस दो बेटे तुम्हें मिल जाएं...मैं मानूँगी, ईश्वर ने मेरे पूजा पाठ को व्यर्थ न जाने दिया। भगवान ने हमारी सुन ली।”

 

“लेकिन, परीक्षण में तो लड़की आई है”, पारस ने पहले मेरी ओर और फिर अपनी माँ की ओर देखते हुए कहा।

 

 जो बात पारस मुझसे खुलकर नहीं कर रहे थे, वह बात तुम्हारी दादी ने मुझसे स्पष्ट की, "देख बहू, इस घर में पहली संतान तो बेटा ही आना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दूसरे के वक़्त अपना जोखिम और बढ़ जाएगा!"

 

 

 

तुम्हारी दादी चतुराई से अपनी बात बढ़ाती हुई असली मुद्दे पर आ गईं थीं। प्रिया! जाने उस वक़्त मुझमें कहाँ से ताक़त आ गई, मैं चिल्लाती हुई बोली, 'देखिए माँ जी, ख़ुदा के लिए, ऐसे हिंसक ख़याल छोड़ दीजिए। यह ठीक नहीं है।'

 

उस वृद्धा की अनुभवी आँखों ने मेरे चेहरे की दृढ़ता को देख लिया था। अब वे अपने पुराने नाटक पर उतारू हो आईं और अपने बेटे को हथियार बनाने की कोशिश की, 'तुझे क्या इसी दिन के लिए पैदा किया था पारस कि अपनी लुगाई से मेरी बेइज्जती करा। ये कल की लौंडी, मुझसे अब मेरे ही घर में जुबान चलाएगी।'

 

पारस तो अपनी माँ और पत्नी के बीच मानो सैंडविच बन गए थे। फिर भी वे एक पढ़े लिखे इंसान थे। मैं तो यही सोच रही थी कि वे कोई पक्षपात न करते हुए, सही का पक्ष लेंगे। मगर यह क्या, वे तो मुझ पर ही बरसने लगे, “देखो विजेता, तुम हर बहस में क्यों कूदती हो? जैसा माँ कहती है, वैसा कर लो। आखिरकार वो जो कहती हैं, इस घर के भले के लिए ही तो कहती हैं।”

 

मुझे काटो तो खून नहीं। पहली बार पारस अपनी माँ की आड़ में मानो अपने दिल की बात कह रहे थे। मैं बिफर पड़ी, “आपको कुछ अंदाज़ा भी है, मुझे आप क्या करने के लिए कह रहे हैं?”

 

मेरी इस स्पष्ट प्रतिक्रिया से वे कुछ क्षण के लिए सकपका गए। उन्हें शायद मुझसे ऐसी किसी मुखरता की उम्मीद न थी। वे बचाव की मुद्रा अपनाते हुए बोले मानो एक दांव ग़लत जाने पर झुंझलाया हुआ खिलाड़ी तुरंत किसी दूसरे दाँव को चल देना चाहता हो, “विजेता, माँ भी तो हम दोनों के भविष्य के लिए ही कह रही है ना!"

 

रोकने की मेरी लाख कोशिशों के बावजूद मेरी आँखों से आँसू आ गए। मैं भर्राए गले से बोली, 'देखिए जी, हमें ऐसे किसी भविष्य की ज़रूरत नहीं है, जो खून के सने हाथों से हमें प्राप्त हो।"

 .............

 

 प्रिया, मेरी दुर्गा!

आज, जब शांति का कोना निरंतर सिमटता जा रहा है, मनुष्यता पर प्रहार किए जा रहे हैं, कोमलता नष्ट की जा रही है, हमें एकजुट होकर ऐसे संहारकों के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा। बेटी, मैं वादा करती हूँ, तुम्हारे इस बलिदान को मैं ज़ाया नहीं जाने दूँगी। टुकड़ों टुकड़ों में निकले तुम्हारे पिंड और क़तरा क़तरा बहे तुम्हारे रक्त की शपथ है मुझे, आज से मैं अपना पूरा जीवन कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ लोगों को एकत्रित करने में लगा दूँगी। अपराध करने वाले से कम गुनहगार अपराध सहने वाले भी नहीं होते। अतः हे मेरी प्रिया, मैं देश दुनिया के हर परिवार में जाऊँगी। छोटे बड़े, स्त्री पुरुष सभी से मिलूँगी। जिनकी आँखों पर महज़ पुत्र मोह की पट्टी है, उनकी आँखों से वह पट्टी हटाऊंगी। अनपढ़ों को पढ़ाना होगा। साक्षरों को सही मायने में शिक्षित बनाना होगा। उन्हें यह नारा जोर शोर से, हर्षोन्माद में गाना होगा -

 

‘गूँजी रही है धरती, गूँज रहा आसमान

 लड़का लड़की देखो सब हैं एक समान’।

 

 दुनिया में अब किसी कोख पर अत्याचार नहीं होगा। अब कोई प्रिया, धरती पर आने से रोकी नहीं जाएगी। अब किसी माँ को अपनी अजन्मी बेटी के नाम ऐसा ख़त नहीं लिखना पड़ेगा। अब कोई प्रिया, अपने दादा-दादी के पूर्वाग्रह का शिकार नहीं होगी। अब किसी पारस को अपने माता-पिता के समक्ष यूं लाचार और अंधभक्त नहीं बनना पड़ेगा।

 

प्रिया, मेरा अंतस्!

बेटी, मुझे माफ़ कर दे। मैं तुझसे नज़रें नहीं मिला पा रही हूँ। जिस तरह मैंने तुम्हारी बड़ी बहन प्रभा के समय अपने को आगे लाकर पूरे घर के आगे उसकी सुरक्षा में एक अभेद्य दीवार सी बन गई थी, तुम्हारी बारी में शायद मेरे अंदर भी आत्मविश्वास की कमी हो आई थी। कुछ देर के लिए मैं भी उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई थी। ठीक ही कहा जाता है, बुरों के साथ रहते हुए अच्छा आदमी भी बुरा बन जाता है। अच्छाई अपने आप में संक्रामक हो अथवा न हो, बुराई ही संक्रामक है। मुझ पर भी मानो किसी प्रेतात्मा का असर पड़ गया था। शायद मैं उनकी बातों में आ गई थी। मुझे माफ़ करना मेरी बच्ची। अब ऐसा नहीं होगा। बस तू एक बार फिर से आ जा मेरे भीतर। मेरे शरीर का रक्त तुम्हारा होगा। मेरी आत्मा तुझे आशीष देगी। मेरा रोम रोम ऋणी होगा। मेरी पुत्री, इस बार मैं तुम्हारे विरोध में किसी की नहीं सुनूँगी।

 

प्रिया, मेरी छाया!

 मैं गहरे अपराध बोध में जी रही हूँ। मुझे उबारो पुत्री। पारस मेरे पति हैं। पति ही रहें। इस बार अगर स्वयं परमेश्वर भी आकर मुझसे किसी विनाश की बात करेंगे, तो मैं उनका मुँह नोच लूँगी। आ जा प्रिया! तुम्हारी बड़ी बहन बहुत अकेली है। तुम्हारी माँ उदास है। इस बार हम तीनों मिलकर इस घर को एक नया संस्कार देंगे। अमृता शेरगिल की पेंटिंग की वो तीन स्त्रियाँ हम तीनों ही तो हैं पुत्री।

 

इस बार बीज पारस का होगा। पिछली बार की ही तरह उसमें जान तेरी होगी। और इस बार गर्भ से गोद तक की तुम्हारी यात्रा, मेरे निर्णय पर होगी। और हाँ, प्रिया! दुनिया की कोई माँ, अपने संतान को मारना नहीं चाहती। मातृत्व, अनिवार्यतः किसी विध्वंस का विरोधी है। बस आ जा पुत्री। मुझे तुम्हारी चोटी गूँथनी है। तुम्हारी तुतलाहट सुननी है और तुम्हें अपनी लोरियाँ सुनानी हैं। तुम्हारी तरल आँखों से दुनिया देखनी है। तुमसे ढेर सारी आमने-सामने बातें करनी हैं। खट्टी-मीठी हर तरह की बातें। तुम्हारे कानों में दुनिया के सबसे मीठे शब्दों की मिसरी घोलनी है। बस अब आ जा मेरी आत्मजा, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में हूँ।

.............

लोगों का दिल जीतो, दिमाग जीतो, और जो न जीत सको यह सब, तो ख़ुद को मत हारो। नहीं सौंपो अपनी कोख को क़ातिल हाथों में।  

 

 

 

 

कन्या भ्रूण-हत्या के सवालों से टकराती कहानी...

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