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आधा अंग
आधा अंग
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© Jyotsana Singh

Drama

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शारीरिक अक्षमता और व्यहवारिक दुर्बलता का ज्ञान उसे आज ही हुआ हो ऐसा नहीं है।

दिसम्बर की यह आख़री रात आज तीन सालों से लगातार यूँ ही बीत रही है।

आते और जाते हुए साल के इस मिलन को उसने इसी तरह व्हीलचेयर पर आधे लटके लकवाग्रस्थ शरीर के साथ ही बिताया हो ऐसा नहीं था।

उसके ही लॉन में आज जो रंग जमा हुआ है वह उसका ही सजाया साम्राज्य था।

तीन साल पहले तक वह स्वयं ही इन रंगिनियो का राजा हुआ करता था।

उसकी यही मित्रमंडली उसकी जय-जय कार सिर्फ़ इस लिये करती थी क्यूँकि उनका हींग लगे न फिटक़री रंग चोखा।

शराब की तीखी गंध और भूने आलू की महक उसके नथुनों को रह-रह कर फड़का रहे थे।

धन आज भी उसका ही इस अलाव में सुलग रहा था पर क़सीदे उसकी अर्धांगनी के कढ़े जा रहे थे।

उसकी लटकती हुई लार को अपने आँचल से पोंछ उसके मुँह में भूने आलू का टुकड़ा डालते हुए स्नेह का हाथ उसके सिर पर फेरते हुए वह आँगन में बनी उस दीवाल के पीछे दबे पाँव चली गई।

जाती हुई भाभी की परछाईं को देख पूर्व में बोले उसके अपने ही शब्द उसके कानो में शीशे की तरह घुलने लगे।

उसकी अर्धांगनी अभी भी ग़ैरों की बाँहों में झूल रही थी जैसे की उसका आधा अंग।

स्नेह का स्पर्श उसे अभी भी हौसला दे रहा था की हाँ, उसके आधे अंग में अभी भी जान बाक़ी है।

अंग लकवा बेबसी

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