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एंटीक पीस
एंटीक पीस
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© dr vandna Sharma

Drama

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बड़े बुजुर्ग कहते हैं विद्यार्थी जीवन एक तपस्या होता है। मेरा विद्यार्थी जीवन भी एक तप एक साधना काल रहा है। पढ़ने का शौक बहुत था। बचपन में ही चाणक्य नीति ,योगनीति ,सत्यार्थ प्रकाश, सुख-सागर आदि पढ़ डाले।

घर पर धार्मिक माहौल था। आध्यात्मिक एवं धार्मिक किताबें बहुतायत में उपलब्ध थी।

'सादा जीवन उच्च विचार' यह वाक्य मन पर ऐसा छप गया मेरी सादगी दुनिया की नज़र में हास्य का पात्र बन जाती। जिस उम्र में लड़कियों को सजने-सँवरने का शौक होना चाहिए उस समय मुझ पर वैराग्य व योगनीति हावी थी।

लड़कियों वाले शौक कभी रहे ही नहीं। परिस्तिथियों ने मुझे अंदर से कठोर बना दिया। शुरू से ही मैत्रयी पुष्पा, ममता कालिया, रंजना जायसवाल के विचारों का प्रभाव पड़ा और कुछ सामाजिक कुरीतियों ने,आस-पास के माहौल ने, नारीवादी बना दिया। मैं पुरुषो के इस समाज में अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी वो भी अपने दम पर।

ज्वेलरी, मेकअप,सजना, सँवरना कभी अच्छा नहीं लगा। सब आज भी एंटीक पीस बोलते हैं मुझे। कहते हैं इसे तो संग्रहालय में होना चाहिए था। कहानी-कवितायेँ पढ़ने का शौक ऐसा था कि खेलने के स्थान पर कविताएँ गाकर याद किया करती थी। नवीं क्लास में एक कविता अक्सर गुनगुनाती थी, "जलाओ दीए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं रह ना जाए।"

एक बात और मेरे साथ रही, मुझे कोर्स से हटकर साहित्य पढ़ने का शौक था तो अपनी क्लास की कम, बड़े भैया की किताबें ज़्यादा पढ़ती। मुझे अच्छी तरह याद है जब चौथी क्लास में थी तो पाँचवीं के बच्चो को हिंदी व गणित पढ़ा देती थी। पापा को कबीर, रहीम के दोहे मुँहज़बानी याद थे। शाम को अक्सर हमें सुनाया करते तो मुझे भी कंठस्थ हो गए। अभी भी मुझे कबीर का दर्शन अधिक आकर्षित करता है या यूँ कहिये कबीर के दर्शन को फॉलो करती हूँ। मैं अपनी उम्र की लड़कियों से बहुत पीछे थी, समझ में।

किताबी ज्ञान तो बहुत था पर दुनियादारी की बातें कम समझ आती। इंटरवल में सब लड़कियाँ खेलती और मैं एक कोने में खड़ी छोटे बच्चो को खेलते देख मुस्कराती रहती। आपको आश्चर्य होगा दसवीं तक मेरी कोई दोस्त नहीं थी। बोलती सबसे थी पर दोस्ती किसी से नहीं। अकेला रहना अच्छा लगता। अंतर्मुखी थी। फ्री कालांश में टीचर के पास जाकर पढ़ती या उनका कोई काम करा देती। स्टेज पर जाने से इतना डरती कि छठी क्लास में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर इनाम लेने स्टेज पर बुलाया गया तो चली तो गयी पर नजरें उठाकर भीड़ को देखने की हिम्मत नहीं हुई। चुपचाप स्टेज के पीछे से निकल ली।

मैं अक्सर अपने सपनो की दुनिया में खोयी रहती। एक बार क्या हुआ नवीं क्लास में साइकिल से जाती थी, लेकिन विचारो में खोयी पैदल वाली लड़कियों के साथ स्कूल से कब बाहर आ गयी पता ही नहीं चला, जब साथ की लड़कियों को साइकिल से जाते देखा तब याद आया मैं भी तो साइकिल से आयी थी। सादगी की मिसाल कहा जाता मुझे, इतने लम्बे ढीले -ढीले सूट पहनती बालों में नारियल तेल लगा हुआ, बाल हमेशा बंधे हुए, कभी काजल भी नहीं लगाया, क्रीम -पॉउडर तो दूर की बात। बी. एससी तो सहशिक्षा कॉलेज से की लेकिन वहाँ भी डरपोक लड़की की तरह बस क्लास दी और सीधे घर।

टीचर सब बहुत प्यार करते थे क्यूंकि काम समय पर करती और उनके कार्य में सहयोग भी करा देती। केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल में लड़कियाँ वैज्ञानिक बोलती मुझे। मैं किताब पढ़कर उलटे-सीधे कारनामे जो करती। फिजिक्स में भी सब लड़कियाँ मेरी कॉपी लेती। मेरी गणना सटीक जो रहती और सबसे पहले चेक होती। स्टेज पर जाने का आत्मविश्वास आया जब पुनः मैं कन्या महाविद्यालय से पत्रकारिता का कोर्स करने गयी। पत्रकारिता में प्रवेश मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट रहा। मेरा व्यक्तित्व निखर कर आया। स्टेज पर अभिनय भी किया, भाषण भी दिए, रिपोर्टिंग भी की,कैमरा भी फेस किया।

उस वर्ष दैनिक जागरण पाठकनामा में रोज मेरे लेख छपते, आकशवाणी में काव्य पाठ भी किये। चाणक्य विचार में मेरी पहली कविता छपी थी। फिर तो छपने का ऐसा चस्का लगा, विभिन पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित हुई। बिजनौर के प्रसिद्ध समाचारपत्र 'चिंगारी ' में प्रूफरीडिंग भी की। मजे की बात कार्यस्थल पर सब मुझे बच्ची समझते जब तक उन्हें न बताया गया कि मैं प्रूफ रीडर हूँ। सादगी और भोलेपन का फायदा भी बहुत मिला। एक बार बिजली का बिल जमा करने लाइन में लगी। बहुत लम्बी लाइन थी। भीड़ ने बच्ची समझकर -" पहले इस बच्ची का जमा करा दो " मेरा करा दिया जबकि उस समय एम. ए. हिंदी से कर रही थी।

२००९ में अपने ही कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुई ,लेकिन समस्या वही मुझसे बड़ी मेरी स्टूडेंट थी। छात्राओं के बीच खड़ी हो जाऊँ तो कोई ना पहचाने। सौभाग्य से प्राचार्या ने उसी वर्ष छात्राओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया था और मेरे लिए साड़ी पहनना अनिवार्य। एक तो मैं दुबली पतली उस पर वो भोली सी सूरत।

बी. एड. की भी बहुत सुंदर यादें हैं। सहशिक्षा महाविद्यालय तह विवेक कॉलेज बिजनौर। अनुशासन व पढाई के लिए प्रसिद्ध। १०० विधार्थी थे हम बी. एड. क्लास में।

प्रचार्य महोदय बड़े सख्त थे। छुट्टी के लिए आवेदन हिंदी में करना ज़रूरी था वो भी एक दिन पहले। अब आजकल के बच्चे अंग्रेजी में लिखने के अभ्यस्त होते हैं। मेरी हिंदी अच्छी होने के कारन सब मुझसे ही आवेदन लिखवाते क्यूंकि प्राचार्य का सख्त आदेश था वर्तनी में गलती हुई तो छुट्टी कैंसिल। इसलिए मैं अपनी क्लास में लोकप्रिय थी और एक आदत से जानी जाती थी मैं वो थी सभी को नमस्ते करने की आदत। क्लास में सहपाठी एक दूजे को है, हेलो से विश करते और मुझे नमस्ते मैम बोलते। मनोविज्ञान के सर मेरे प्रश्नों से बहुत परेशान रहते। कभी-कभी मेरे सवाल उन्हें निरुत्तर कर देते। इसलिए व्याख्यान के अंत में मुझसे ज़रूर पूछते कोई संदेह /समस्या तो नहीं। सब समझ आया।

एक बार क्या हुआ सुबह प्रार्थना सभा में शास्त्रीय संगीत पर पाँच मिनट की मौन ध्यान होती थी, फिर राष्टगान। एक दिन तकनीकी खराबी आने से कैसेट नहीं चला, कठिन समस्या स्टाफ के सामने, प्राथना कैसे हो। प्राचार्य ने सभी को सम्बोधित किया कोई भी स्टेज पर आकर प्रार्थना कराए। कोई भी विद्यार्थी नहीं आया। सर का चेहरा गुस्से से लाल। बी. एड. विभाग की आन दाँव पर लगी। हिम्मत करके मैं स्टेज पर पहुँची और अकेले ही 'हे शारदे माँ... ' गाना शुरू किया। फिर राष्ट्रगान कराया।

सबने तालियाँ बजाई और प्रसंशा भी की लेकिन बाद जब भी कभी कैसेट ख़राब होता सर मुझे ही बुलाते प्रार्थना पूर्ण करने के लिए। बचपन की वो शर्मीली लड़की आज इतनी मुखर वक्ता है, इतना बोलती है सब टोकते हैं, 'उफ़ बहुत बोलती है '.. शर्त लगाई जाती है यह लड़की दो मिनट चुप नहीं रह सकती। कॉलेज के वो दिन बहुत याद आते हैं। परीक्षा के दिनों में वो रातों को जागना, सारे दिन पढ़ना, परीक्षा कक्ष में तीन घंटे लगतार लिखना, घर आकर पूछे जाने पर पेपर कैसा हुआ ? अच्छा हुआ ,बढ़िया कहना। पापा का चिढ़ाना 'ये तो रिजल्ट बताएगा।'

जुलाई में नयी क्लास में आने की ख़ुशी, बारिश में भीगते हुए टयूशन जाना। स्कूल की कैंटीन में २ रुपए का समोसा खाना और छुट्टी में स्कूल के बाहर पचास पैसे की आइसक्रीम खाकर शहेंशाह जैसा खुश होना। परीक्षा खत्म होने पर रातों को छत पर गप्पे लड़ाना। किताबों में छुपकर कॉमिक्स पढ़ना ,पकडे जाने पर मम्मी की डाँट खाना। कितना याद आता है वो गुजरा जमाना। क्लास में सबसे आगे की बेंच पर बैठने के लिए लड़ना, टीचर डे पर मैम के लिए खुद हाथ से कार्ड बनाना। नए साल पर एक ही शेर सभी बच्चों को लिखकर देना। साइकिल से गिरना और कोई देख ना ले इस डर से तुरंत खड़े हो जाना। कॉपी में वैरी गुड पाकर फुले न समाना। क्लास का मॉनिटर बनकर इतराना। कितना याद आता है वो गुजरा जमाना।

स्कूल पढ़ाई सादगी

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