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सेक्टर ७१ का खूनी चौराहा
सेक्टर ७१ का खूनी चौराहा
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© सुनील धनखड़

Crime Drama Tragedy

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सर्दियों की रात के करीब ११ बजे का वक्त था। कॉल सेंटर की ड्यूटी से कर्मा घर के लिए निकल पड़ा। फिल्मी गानों तक में दिल्ली की सर्दी का डंका है, यमुना पार कर यूपी की तरफ नोएडा पड़ता है, सो वहाँ की सर्दी दिल्ली से बढ़कर ही रहती है। उस पर मोटरसाइकिल की सवारी कर्मा को मुफ्त में बर्फीली हवाओं का एहसास करा रही थी।

कुछ दूर निकल जाने पर सड़क सुनसान हो चली। सड़क के बाईं तरफ़ धीमी रफ्तार से चलने वाले कर्मा को करीब १०० मीटर से सजी-धजी २ बालाएँ नजर आईं। वो समझ गया सड़क के दाईं तरफ ट्रक यूनियन वालों का अड्डा है। सर्दियों की धुंध और अंधेरी रात में ऐसे लैंडमार्क ही रास्ते का अंदाजा देते हैं। चेहरे पर क्रीम-पाउडर पोते नारीनुमा जंतुओं ने बड़े विश्वास से आधी सड़क पर आकर कर्मा के सामने हुस्न का जाल फेंका। लेकिन बाइक सवार का रोज उसी रास्ते से आना-जाना था, जैसी धीमी रफ्तार पहले थी, बनी रही और सुंदरियों को निराशा हाथ लगी।

सुनसान सड़क उस टी प्वॉइंट पर दम तोड़ती थी, जहाँ से मुख्य सड़क के ऊपर मेट्रो ट्रेन के लिए पुलनुमा रास्ता बनाने का काम जारी था। यहाँ से दो तरफा रास्ता कमरे पर पहुँचता था।

यूपी में सरकारी निर्माण के हालात घोषित युद्ध जैसे होते हैं, मानो आसमान से दुश्मन देश बम बरसाने आ रहा है। इसलिए काम पर लगे साहब लोग शाम के साथ ईंट-पत्थर-रेत-बजर, बीच सड़क छोड़ गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाते हैं। इसके बाद राहगीर वाहन के साथ जोखिम के जिम्मेदार खुद होते हैं।

कर्मा को पक्का भरोसा था मुख्य सड़क कभी भी पास में बने आलीशान फोर्टिस हॉस्पिटल की इमरजेंसी में ले जा सकती है, इसलिए मेन सड़क छोड़ आबादी के बीच वाला रास्ता पकड़ता था। आज भी सफर वहीं से जारी रहा।

सिर पर रोशनी आ जाए तो खुद की परछाई गायब-सी हो जाती है, लेकिन कॉल सेंटर की जॉब का फ्रस्ट्रेशन कर्मा के दिमाग में परमानेंट बस गया था। अंधेरी सर्द रात में भी वही भड़ास हमजोली थी। ठिकाने पर पहुँचकर २ लंपट दोस्तों संग दुनिया को गाली देते वक्त कुछ राहत महसूस होती थी।

सेकेंड हैंड बाइकसवार शॉर्ट कट से होता हुआ साईं मंदिर के पास फिर मुख्य सड़क पर जा चढ़ा। इस जगह पहुँचने पर ऑफिस वाली फीलिंग निकल जाती और अपने इलाके का एहसास बढ़ जाता।

बढ़ते हुए कर्मा को सेक्टर ७१ के खूनी चौराहे से पहले का मंजर कुछ अजीब लगा। नजदीक जाने पर आशंका सच हो गई। चंद पल पहले एक्सीडेंट हुआ था। जख्मी तड़प रहे थे। एक-दो गाड़ियाँ कर्मा की बाइक के आगे-आगे पहुँचकर रुकी थी। सड़क पर नया-नवेला, सजा-धजा थ्री व्हीलर औंधे मुँह घूमकर पलट गया था।

हादसा अजीब तरह हुआ था। जिस दिशा में कर्मा बाइक से जा रहा था, उसी दिशा में कुछ देर पहले ऑटो जा रहा होगा। लेकिन पलटकर ऑटो का मुँह अब ठीक विपरीत दिशा यानि कर्मा की बाइक की साइड हो गया था। ये वाला थ्री व्हीलर औसतन ऑटो से कुछ बड़ा था। ऐसे वाहन सेक्टर ६२ के चौराहे से ५-५ रुपये वाली सवारियाँ बैठाते थे, और सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन तक मनचाही जगह पर उतार देते थे।

कर्मा ने बाइक सड़क के बिलकुल बाएँ कोने में लगा दी। उसे अंदाजा था, कई बार हादसे की जगह पर पहुँच रही तेज रफ्तार गाड़ी एक और हादसा कर डालती हैं। तेज कदमों से पलटे थ्री व्हीलर के पास पहुँचा। करीब ६-७ लोग अंदर बैठे थे। जिनको चोट लगी थी। क्योंकि ऑटो हर तरफ से खुला होता है, इसलिए लोग करहाते हुए बाहर निकल चुके थे।

मौके पर एक नौजवान ने तेजी से घायलों की मदद का मोर्चा संभाल लिया था। कर्मा पहले बड़ी आशंका से भर गया, लेकिन धीरे-धीरे महसूस हुआ कि लगभग सभी लोगों को हल्की-फुल्की चोट आई हैं, कोई गंभीर नहीं है। लेकिन तभी मदद में लगे उस नौजवान को फोन पर बोलते हुए सुना। वो अपनी कंपनी की एंबुलेंस बुलाने की कोशिश कर रहा था।

फोन पर गंभीर स्वर सुन कर्मा ने नजरें फैलाई और ध्यान उस लड़के पर गया, जो शायद सीट पर किनारे बैठा होने की वजह से गंभीर जख्मी हो गया था। ऑटो की दूसरी साइड सड़क पर पड़े जख्मी के सिर की हालत देखकर कर्मा दहल उठा। जहाँ राहगीर पड़ा था, वहाँ की सड़क गहरे खून से लाल हो गई थी। दर्दनाक मंजर था। एक आदमी उसके सिर को कपड़े से लपेटने की कोशिश कर रहा था। कपड़ा भी खून से लाल हो चला था।

कर्मा ने नजरों से ३०-४० मीटर दूर मौजूद चौराहे के पार झाकने की कोशिश की। बाकी दिन उस जगह पुलिस पीसीआर गाड़ी लाल बत्ती चमकाती खड़ी रहती थी। लेकिन आज वो कार मौजूद नहीं थी। कर्मा ने फोन निकाल १०० नंबर डायल किया। घंटी बजती रही, किसी ने नहीं उठाया। कर्मा ने नंबर लगाने का सिलसिला नॉन स्टॉप शुरु कर दिया। काफी देर बाद जाकर दूसरी तरफ से महिला पुलिसकर्मी की आवाज सुनाई दी।

कर्मा ने जगह बताकर हादसे के बारे में बताया। लगभग चीखने की आवाज में ये भी कहा कि हर रोज खड़ी होने वाली पुलिस पीसीआर आज मौजूद नहीं है। हादसे में एक लड़के को गंभीर चोट लगी है। दूसरी तरफ से महिला पुलिसकर्मी ने कहा कि उन्हें इस हादसे की जानकारी मिल चुकी है। पीसीआर गाड़ी को इस एक्सीडेंट के बारे में सूचना दे दी गई है, वो कुछ पल में पहुँचती होगी।

जब कर्मा ये सब बोल रहा था, तभी एंबुलेंस को कॉल करने वाले लड़के ने पास आकर बताया कि वो १०० नंबर पर कॉल कर चुका है, उसे भी यही जानकारी दी गई है। कर्मा ने लड़के से हादसे की वजह जानना चाही। राहगीर ने बताया कि उसका नाम मोहन है, वो ऑटो के पीछे-पीछे बाइक से ड्यूटी कर लौट रहा था, तभी ऑटो में सवार रहा एक शख्स बीच में बोल पड़ा।

एक्सीडेंट में कोहनियों पर रगड़ की वजह से पैदा हुए दर्द से कराहते हुए उसने कहा कि १५-१६ साल का लड़का चला रहा था। स्पीड काफी तेज कर रखी थी। ऊँची आावाज में गाने बजाकर लौंडा सबको अनसुना कर थ्री व्हीलर दौड़ा रहा था। साथ चल रही कारों को भी पीछे छोड़ता हुआ ऑटो इस जगह पहुँचने पर लड़के के हाथ से बेकाबू हो गया। फिर सेकंड के भी हिस्से में घूमकर इस तरह पलटा कि जिस दिशा में जाना था उस तरफ अब गाड़ी का पिछवाड़ा था। बताने वाले को गंभीर चोट नहीं लगी थी, लेकिन हादसे की वजह से चेहरे पर सदमा झलक रहा था।

नाबालिग चालक के बारे में पूछने पर पता चला कि सबसे पहले ऑटो से वही निकला था, कहाँ गायब हो गया ? किसी को नहीं पता !

चिंता उस जख्मी के बारे में थी, जिसके सिर से खून का फव्वारा निकल रहा था। पुलिस पीसीआर-एंबुलेंस का इंतजार किए बगैर घायल को जल्दी नजदीकी अस्पताल पहुँचाने का फैसला लिया गया। मौके पर पहुँचे दूसरे सवारी ऑटो को रुकवाकर, उसकी सवारियों को नीचे उतरने के लिए कहा गया। हादसा देख सभी उतर गए। अचेत हो चुके घायल लड़के को उठाकर पिछली सीट पर लेटा दिया गया। जिस आदमी ने लड़के के सिर को कपड़े से ढक रखा था, वो वैसे ही चिपका रहा और जख्मी के साथ बैठ गया। पता चला कि वो भी बाकियों की तरह राहगीर है। सिर फटे लड़के का कोई भी जानकार वहाँ नहीं था।

अस्पताल के लिए निकलने वाले ऑटो ड्राइवर ने हादसे वाले थ्री व्हीलर को पहचान लिया था, बताया वो हरिओम यादव का ऑटो है। हरिओम के ८-१० ऑटो इस रूट पर चलते हैं। उसके सभी लड़के बड़े गलत चलाते हैं।

देर ना करते हुए मोहन भी अस्पताल जा रहे ऑटो में मदद के लिए बैठ गया। उसने भी बाइक कर्मा की तरह साइड में पार्क कर रखी थी। एक अस्पताल मुश्किल से १२००-१५०० मीटर आगे ही था। कर्मा ने भी सहायता के लिए साथ चलने के लिए कहा। लेकिन मोहन ने कर्मा को वहीं रुकने के लिए कहा। मोहन ने बताया कि उनकी कंपनी की एंबुलेंस आ रही होगी। उसका एक दोस्त भी आएगा। एंबुलेंस के वहाँ पहुँचने पर कर्मा उन्हें नजदीक वाले हॉस्पिटल के बारे में बता दे और उसकी बाइक का ध्यान रखे। दोनों ने तेजी में एक-दूसरे को फोन नंबर दिया और जख्मी को लेकर ऑटो निकल गया।

हल्की चोट खाए लोग इधर-उधर होने लगे। लेकिन पीछे से आ रही गाड़ियों और सड़क पर पलटे ऑटो की वजह से जाम बना हुआ था। फिर पुलिस की गाड़ी का सायरन बजा। तय जगह की बजाए कहीं और ड्यूटी बजा रही यूपी पुलिस की पीसीआर गाड़ी मौके पर पहुँची।

ड्राइवर के पास आगे बैठे पुलिस हवलदार ने लोगों को इस तरह खदेड़ना शुरू किया जैसे उन सबने मिलकर गाड़ी को पलटा दिया हो। उसका बर्ताव देखकर कर्मा को गुस्सा आ गया। तेज आवाज में कहा- इतने फोन किए गए, पुलिसवाले खुद ड्यूटी की जगह से नदारद थे और अब हुक्म झाड़ रहे हैं। साथ में भीड़ से भी आवाज आने लगी, बाकी दिन ये कौन सा काम करते हैं ? चालान का डर दिखाकर लोगों से पैसे ऐंठते हैं, इनको पैसे खिलाने की वजह से ऑटो वाले अंधाधुंध रफ्तार से भागते हैं। आगे-पीछे नहीं देखते। इसी वजह से एक्सीडेंट होते हैं।

माहौल गर्म होता देख दोनों पुलिसवाले धीमे स्वर में आ गए। इस बीच एक काले रंग की कार सड़क की रॉंग साइड से होते हुए हादसे की जगह पहुँची। तेजी से ३-४ आदमी उतरे। जमा लोगों में से एक ने कहा कि यही ऑटो का मालिक है। कार सवार शख्स ने पुलिसवाले से कहा कि ऑटो उसका ही है, उसका चचेरा भाई चला रहा था। उसी ने फोन कर हादसे की जानकारी दी है।

इक्का-दुक्का लग रहे लोग देखते ही देखते भीड़ में बदल गये। वो लोग फिर से नजर आने लगे जिनको हाथ-पैर में खरोंच आई थी। वो अब अकेले नहीं थे, शायद फोन से जान-पहचान वालों को खबर कर दी। पुलिस और ऑटो मालिक के खिलाफ निकल रही एक आवाज में चार आवाज मिलकर हंगामा खड़ा करने को आमादा लग रही थी। ऑटो वाले पूरी तरह डिफेंस मोड में थे। पुलिस वाला भी कार सवार लोगों पर गर्म होने लगा।

इस बीच कार से आए एक आदमी ने फोन का रुख पुलिसवाले की तरफ मोड़ दिया। भिनभिनाते हुए पुलिसवाले ने कहा, कौन है ? क्या बात करनी है ? कहकर फोन कान पर लगा लिया। हवलदार के मुँह से ' जी पहलवान साहब' ही सुनाई दिया। उसके बाद फोन लेकर खाकीधारी सड़क पार कर घास में अँधेरे की तरफ निकल गया। कुछ देर बात हुई, भीड़ फिर गुस्सा होने लगी।

पुलिसवाला लौटने पर बदला हुआ था। भीड़ के सामने तो नतमस्तक था, लेकिन ऑटोवालों पर अब नहीं भड़क रहा था। इस तरफ बहसबाजी, उलाहने चल रहे थे, दूसरी तरफ कार सवार तीन लोगों ने रिक्शा चलाने वालों को बुलाकर मरी भैंस की तरह पड़ी ऑटो को एक झटके में खड़ा कर दिया। एक अंदर घुसा और स्टार्ट कर निकलने की तैयारी करने लगा। पुलिसवाले उसे देखकर भी अंजान बन रहे थे।

माजरा समझते ही कर्मा का पारा जेठ के सूरज की तरह चढ़ गया। गले को पूरी तरह फाड़कर चिल्लाया- वहाँ लड़का मरने वाला है, तुम सरेआम लोगों को बेवकूफ बना रहे हो। उस लड़के को कुछ हो गया, तो तुम्हारा भरत मिलाप डंडा बन नीचे से घुसेगा। तब फोन-फोन खेल लेना। कर्मा को इतने गुस्से से दहाड़ते देख पुलिसवाला कांप गया, हादसे वाली ऑटो को कोने से निकाल रहे लोग वहीं खड़े हो गए। बाकी लोगों में भी हिम्मत आ गई। थ्री व्हीलर चालक को बाहर खींच लिया। पीसीआर को चलाने वाला ड्राइवर फोन घुमाने लगा।

हवलदार ने गिरगिट की तरह रंग बदला। जोर से बोला ऑटो को यहीं साइड में खड़ा करो। यहीं खड़ा करो। खुद को कार वालों से अलग कर लिया। पीसीआर ड्राइवर ने उसे पुलिवाला फोन थमा दिया।

इस बीच कार सवार लोग मिमियाते हुए कर्मा की तरफ आए। बोले भईया, कोई रास्ता निकालो। छह फुट का कर्मा गुस्से से भरकर बोला- मैं घंटा रास्ता निकालूं। हरामी लौंडों को सड़क पर कोहराम मचाने के लिए छोड़ देते हो। हॉस्पिटल में पड़ा लड़का मर गया, तो ये सारा चालूपना निकल जाएगा। फिर ना तेरा फोन काम आएगा, ना तेरा पहलवान।

४५-५० साल के पेटू आदमी ने कर्मा के सामने बेहद दबी आवाज में कहा कि उसका नाम हरिओम यादव है, पड़ोस के सर्फाबाद में रहता है। अभी मामले को सुलटवा दो। जो लोग कहेंगे वो कर देगा। कर्मा ने दिमाग शांत करते हुए कहा कि, भाई मैं क्या करूँ ? तुम जाकर उस लड़के का अच्छे से इलाज करवा दो, जिसको ज्यादा चोट लगी है।

कर्मा की बात को उसने पकड़ लिया, पुलिसवाले से कहा कि, ये भईया सही कह रहे हैं। ऑटो को यहीं खड़ा रहने देते हैं। जिसको भी चोट आई है उसका इलाज करा दिया जाएगा। हवलदार भी हूं...हूं करने लगा। पुलिसवाले ने बाकी लोगों को भरोसा दिलाया कि हादसे के जिम्मेदार को बख्शा नहीं जाएगा।

हरिओम यादव ने कर्मा को देखकर कहा कि भईया वो अभी अस्पताल जा रहे हैं, घायल का अच्छे से अच्छा इलाज कराएँगे। साथ ही पूछा कि कर्मा क्या करता है, कहाँ रहता है ? संयोग या विडंबना ये थी कि कर्मा भी उसी सर्फाबाद में दोस्तों के साथ रहता था। जैसे ही उसने ठिकाने का राज खोला। यादव ने नॉनस्टॉप बोलना शुरु कर दिया कि वो भी उसी जगह पर रहता है। कर्मा के मकान के करीब ही रात में उनके सारे ऑटो खड़े होते हैं। वैसे वो रहने वाले मैनपुरी के हैं। लेकिन कई साल से इस सड़क पर उनके दर्जनों ऑटो चलते हैं। उसके ऑटो चलाने वाले सारे लड़के मैनपुरी साइड के ही हैं। सर्रफाबाद यादव बाहुल्य गाँव है। इसलिए गाँव के ज्यादातर लोग उसे जानते हैं।

कुछ क्षण से शांत खड़े कर्मा ने फिर भारी गला खोलते हुए कहा कि ये रामायण मत सुनाओ, जाकर उस लड़के ही हालत संभालो। पूरे विश्वास से हरिओम ने पुलिसवाले को आवाज दी कि दारोगा साहब जल्दी से अस्पताल चलते हैं, साथ में ऊँची आवाज में लोगों से पूछा कि अगर किसी को चोट लगी है तो वो साथ चलें, उनका भी इलाज करवा दिया जाएगा। लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया।

इसके बाद पुलिस वाले पीसीआर में घुस गए, यादवों ने कार में सिर घुसा लिए। हादसे वाला ऑटो अब सड़क किनारे खड़ा था और दोनों गाड़ियाँ हॉस्पिटल की तरफ चल पड़ी। हाथ-कोहनी फुड़ाए लोग बस मंजर देखते रहे। सड़क साफ हो चुकी थी, टूटे हुए कांच के कुछ टुकड़े बिखरे थे।

कुछ देर लोगों में कानाफुसी होती रही। कर्मा वहीं किनारे बाइक पर जा बैठा। था तो लंबा चौड़ा लड़का। लेकिन दिमाग से संवेदनशील। वक्त बीतता गया, लोग चलते बने। मोहन की एंबुलेंस का अब तक कोई अता-पता नहीं था।

बीड़ी के कुछ कश भरे थे कि एक लड़का चाबी लेकर मोहन की बाइक के पास पहुँचा। कर्मा ने पूछा तो बताया कि वो मोहन का दोस्त है। अस्पताल से आ रहा है। प्राइवेट अस्पताल वालों ने इलाज शुरू कर दिया था, लेकिन पुलिस पहुँचने पर जख्मी लड़के को सिविल अस्पताल में ट्रांसफर कर दिया। मोहन भी उनके साथ गया है। इसलिए वो बाइक लेकर सीधे बड़े अस्पताल जा रहा है।

कर्मा ने मोहन को फोन मिलाया लेकिन कोई रिसीव नहीं कर रहा था। मोहन का दोस्त उसकी बाइक लेकर निकल गया। वक्त बीतता गया। जड़ हुआ कर्मा अब भी बाइक पर सड़क किनारे बैठा था। हालात बिलकुल बदल गए। अब सड़क पर गाड़िया सामान्य तरीके सा जा रही थी। हादसे के नाम पर बस चंद कांच के टुकड़े पड़े थे। कर्मा के अलावा किनारे खड़ा थ्री व्हीलर एक्सीडेंट का गवाह बचा था। वक्त रात के १ बजे का हो रहा था।

दो लड़के फिर उस जगह पर पहुँचे। ऑटो स्टार्ट करने लगे, एक बार तैश में आने को हुआ कर्मा खुद ही ठंडा पड़ गया। सोचा अब किसलिए ? पूछने पर लड़कों ने बताया कि वो भी हरिओम यादव के गाँव के रहने वाले हैं, हरिओम का फोन आया था कि ऑटो को लेकर घर चले जाएँ, पुलिस वालों से बात हो गई है। कर्मा को अब भी चैन नहीं था। लेकिन इन दो नमुनों पर गुस्सा निकालने का क्या मतलब था ? उसने भी किक मारी और बाइक पर सवार हो कमरे पर पहुँच गया।

पहुँचकर इंटरनेट से नंबर निकाल पहले वाले अस्पताल में फोन मिलाया, ताकि घायल लड़के की हालत के बारे में अंदाजा हो सके। लेकिन उसे हैरान कर देने वाला जवाब मिला। सामने से कहा गया कि ऐसा कोई एक्सीडेंट केस हॉस्पिटल नहीं लाया गया। कर्मा ने कहा, क्या बात कर रहे हो ! कुछ देर पहले ऑटो में डालकर एक लड़के को उनके अस्पताल में लाया गया था, पीछे-पीछे पुलिस भी पहुँची है। लेकिन सामने वाला साफ मुकर गया। कर्मा ने कहा अपने डॉक्टर से या किसी सीनियर से बात कराओ, हिचकिचाकर एक आदमी को फोन दिया। उसका भी वही जवाब कि यहाँ कोई ऐसा सीरियस केस नहीं लाया गया जिसके सिर से खून बह रहा हो।

जवाब सुनकर कर्मा बेचैन हो उठा। मन किया बाइक निकाले और उस अस्पताल में पहुँच जाए। कमरे के साथियों को ये किस्सा बता ही रहा था कि मोहन का फोन आ गया। उसने बताया कि घायल शख्स को सिविल अस्पताल में दाखिल कराया गया है। पुलिस भी पहुँची हुई है। डॉक्टर ने कहा है कि सही इलाज हो जाएगा, चिंता की कोई बात नहीं है। मोहन के मुँह से ये बात सुनकर कर्मा के कलेजे को राहत मिली।

कर्मा ने मोहन की तारीफ की। जिस तरह मोहन ने अंजान शख्स के लिए इंसानियत की मिसाल दी, उससे कर्मा बेहद प्रभावित था। मोहन ने कहा कि ये तो उसका फर्ज था। किसी को भी मदद की जरूरत पड़ सकती है। जिम्मेदारी निभा मोहन भी अस्पताल से निकल गया। दोनों के मन में किसी की जान बचाने का सुकून था।

अगले दिन फिर मक्कार कॉल सेंटर की जॉब पर जाना था, बिना कुछ खाए कर्मा बिस्तर पर पड़ गया।

सुबह जाते वक्त और रात को लौटते हुए कर्मा सर्फाबाद में मकान के पास खड़े होने वाली ऑटो की कतार पर नजर दौड़ाता था। नजरें हरिओम यादव को खोजती थी, लेकिन वो कभी दिखाई नहीं दिया।

छुट्टी वाले एक रोज कर्मा दुकान से कुछ खरीद रहा था, पीछे से आकर दुकानदार की तरफ एक आदमी ने हाथ आगे बढ़ा सिग्रेट माँगी। कर्मा ने बिना देखे नजरअंदाज किया, लेकिन धुंआ हवा में छोड़ते हुए आदमी ने कर्मा को पहचान लिया। भईया उस दिन आपने बड़ी मदद की। हम तो खोज रहे थे, आप कहाँ रहते हैं ? कर्मा ने ध्यान से देखा- वो हरिओम यादव ही था।

कर्मा कुछ बोलता उससे पहले धुंए से भरी यादव की चोंच लगातार चालू थी। कहा- कभी मैनपुरी से अकेला आया था, आज इतने ऑटो का मालिक है। अपने गाँव के लड़कों को ही काम पर रखता है। इलाके में खूब इज्जत है। बढ़िया काम चल रहा है। यहाँ सर्फाबाद में भी सब जानते हैं।

कर्मा ने पूछा वो यहाँ कहाँ रहता है ? हरिओम ने कहा यहाँ तो ऑटो खड़े होते हैं, वो कुछ दूर अपने बनाए मकान में रहता है। कर्मा से ठंडे-गर्म के लिए पूछा।

कर्मा शांत था, आराम से ऑटो चलाने की नसीहत देते हुए चलते कदमों के बीच कर्मा ने पूछा- वो लड़का कौन था जिसको चोट लगी थी ?

सिग्रेट का छल्ला उछाल रहे हरिओम यादव ने कहा- पहाड़ी था कोई उत्तराखंड का। बड़ी माड़ी किस्मत थी उसकी ! चलता हुआ कर्मा रुक गया, ठिठककर पूछा कि वो ठीक है ना ? कहाँ ठीक, वो तो मर लिया। सिग्रेट में बेफिक्र हरिओम बोलता जा रहा था। सरकारी अस्पताल वाले बिना जान-पहचान कहाँ इलाज करते हैं ? लेकिन हमारी किस्मत ने बड़ा साथ दिया। वहाँ से आपने निकलवा दिया। लेकिन साले पुलिसवाले लूट लेते, वो तो मैनपुरी से मंत्री जी का फोन घुमवाया। मंत्री जी का फोन आने पर सीधे हो गए साले। बस दवा-दारू करनी पड़ी।

सुन्न होकर सब सुने जा रहे कर्मा ने कहा कि सिविल अस्पताल में तो इलाज ठीक हो रहा था, फिर कैसे ?

हरिओम ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि सरकारी अस्पताल वाले डॉक्टर किसी के नहीं होते। जो डंडा दे दे उसका इलाज कर देते हैं, बाकी तो यू हीं पड़े मर जाते हैं। जब तक मंत्री जी का फोन नहीं आया था, उन्होंने इलाज की सिफारिश करवाई। लेकिन जब इतने बड़े आदमी का फोन आ गया, तब उन्हें टेंशन किस बात की थी ? ऑटो चला रहे छोटे भाई को रातों-रात मैनपुरी भिजवा दिया। सेटिंग होने पर पुलिस ने रोड क्रॉस करते हुए अज्ञात वाहन के टक्कर मारने का केस बना दिया। पीछा छूटने पर वो अस्पताल से निकल गए। बाद में ध्यान नहीं देने पर पहाड़ी की हालत बिगड़ गई तो सिविल अस्पताल वालों ने दिल्ली के एम्स फिंकवा दिया। एम्स भी लावारिस का कहाँ ध्यान रखे ? पड़ा-पड़ा मर गया। उसके घरवालों का भी कई रोज बाद पता चला। आए और डेड बॉडी उठा ले गए। यहीं कहीं कंपनी में मजदूर था बेचारा ! बेसहारा का दुनिया में कोई नहीं। बोलते-बोलते हरिओम ने सिग्रेट को आखिर तक चूस लिया और कर्मा को मिलते रहने को बोलकर आगे बढ़ चला।

झटके से जागे कर्मा के मन में आया कि हरिओम के मोटे पेट में दबाकर लात मारे। ऐसी लात कि मुँह से पेट की अंतड़ियाँ बाहर निकल जाएँ। लेकिन न मुँह से शब्द निकले और न शरीर हिला। बस जाते हरिओम को देखता रहा।

चंद रोज बाद कर्मा को पता चला कि सेक्टर ७१ के खूनी चौराहे पर एक कार पोल से जा टकराई। सुबह ३ बजे हुए एक्सीडेंट में पुलिस इंस्पेक्टर ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

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